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शब-ए-बरात में होते हैं गुनाह माफ

इस्लामी पंचांग हिजरी के आठवें महीने शाबान की 14वीं तारीख को शब-ए-बरात के नाम से जाना जाता है। यह महीना बड़ी बरकत और महत्व का है।

शब-ए-बरात या लैलतुल बरात का शाब्दिक अर्थ छूटने, बरी होने या मुक्ति पाने की रात है। इस रात में इंसान एक साल की अवधि में किए गए अपने कार्यों का जायजा लेता है। पुनरावलोकन की इस रात में जाने-अनजाने में साल भर तक हुए गुनाहों का पश्चाताप करते हुए अपने रब से माफी मांगी जाती है। शेष जीवन को नबी-ए-पाक के बताए तरीके पर सादगी, परोपकार, सौहार्द्र, बंधुत्व व नेक राह पर चल कर गुजारने की अल्लाह से दुआ मांगी जाती है।

कुरआन पाक के मुताबिक अल्लाह ने दुनिया बनाने से पहले कयामत तक पैदा होने वाले सभी इंसानों की रूह को एक जगह जमा कर उनसे अपने रब और पालनहार होने का इकरार कराया था। शब-ए-बरात के अवसर पर अगले साल का बजट भी तैयार किया जाता है। बजट में एक साल तक पैदा होने वाले बच्चों एवं मरने वालों की सूची को अंतिम रूप दिया जाता है।  इसी रात में पूरे साल की रोजी-रोटी तथा घटित होने वाली वारदातों का निर्धारण किया जाता है। रात के किसी हिस्से में कब्रिस्तान में जाकर वहां दफन लोगों के लिए ईसाल-ए-सवाब पहुंचा कर मृतात्माओं की मुक्ति के लिए दुआ भी की जाती है।

दरअसल अरब मुल्कों से इतर हिंदुस्तान, पाकिस्तान व बांग्लादेश में रहने वाले मुसलमान शब-ए-बरात को लेकर दो वर्गो में बंटे नजर आते हैं। धार्मिक प्रवृत्ति के लोग शब-ए-बरात के अवसर पर मस्जिदों में पूरी रात इबादत में गुजारते हैं तथा अगले दिन रोजा रखते हैं। दूसरे वर्ग से ताल्लुक रखने वाले लोग शब-ए-बरात का मतलब छूटने या मुक्ति की रात के स्थान पर छोड़ने (आतिशबाजी छुड़ाने की रात) की रात बताते हुए इबादत की कीमती रात को पटाखे छोड़ने में गुजारते हैं।

इस रात में बताए गए तरीकों के अलावा जो रिवाज लोगों ने बना लिये हैं, वे सब गैरजरूरी हैं। इंसान चाहे तो इस रात में जारी कुरीतियों पर अंकुश लगाकर नई दिशा दे सकता है।

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