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एजुकेशनएडीएचडी ध्यान की कमी

लाइव हिन्दुस्तान टीम
Fri, 26 Jun 2015 12:40 AM
एडीएचडी ध्यान की कमी

लापरवाही, अस्थिरता, हर समय उछलकूद और आवेग बच्चों में होना सामान्य बात है। लेकिन यदि बच्चा अधिकतर समय ऐसा ही रहता है तो यह एडीएचडी का असर भी हो सकता है। अनुमान के अनुसार भारत में प्रत्येक 20 में से 1 बच्चे में एडीएचडी के लक्षण देखने को मिलते हैं। चूंकि लक्षण सामान्य हैं, ऐसे में समय पर जांच व उपचार की कमी समस्या को बढ़ा देती है, बता रहे हैं मो. आमिर खान

बच्चों में एडीएचडी के मामले तेजी से सामने आ रहे हैं। मानसिक व व्यवहार संबंधी समस्याओं के प्रति बढ़ती जानकारी का ही प्रभाव है कि माता-पिता अब बच्चों की समस्याओं को गंभीरता से ले रहे हैं। बावजूद बड़ी संख्या ऐसे लोगों की है, जो नहीं जानते कि उनके बच्चे या फिर वे खुद एडीएचडी के शिकार हैं। एडीएचडी यानी एटेंशन डेफिसिट हाइपरएक्टिविटी डिसॉर्डर। यूं बच्चों में लापरवाही, असावधानी, अति सक्रियता व आवेग का होना सामान्य है, लेकिन इन लक्षणों वाला हर बच्चा एडीएचडी का शिकार हो, यह जरूरी भी नहीं। इतना अवश्य है कि एडीएचडी से पीड़ित बच्चों में यह व्यवहार व विकास संबंधी डिसॉर्डर अधिक गंभीर और लंबे समय तक देखने को मिलता है। यही वजह है कि इसकी जांच के लिए बच्चे के व्यवहार का लंबे समय तक अध्ययन किया जाता है।
बच्चों में यह समस्या अकसर 3-4 वर्ष की आयु में प्रारंभ होती है। 12 वर्ष से छोटे बच्चों में कभी भी इसके लक्षण देखने को मिल सकते हैं। एडीएचडी बच्चों में पाया जाने वाला मस्तिष्क संबंधी डिसॉर्डर है, जिसके कारण वे अपने व्यवहार और आवेग पर काबू नहीं रख पाते हैं। एसोचैम के अनुसार वर्ष 2005 में इसके मामले 4% थे, जो वर्ष 2011 में बढ़कर 11% हो गये हैं। इन वर्षों में एडीएचडी से प्रभावित बच्चों की संख्या में  175% तक की वृद्धि देखने को मिली है। एक अनुमान के अनुसार बड़े शहरों में 20 में से 1 बच्चा एडीएचडी से पीड़ित है। दुनियाभर में लड़कियों की अपेक्षा लड़कों के इससे प्रभावित होने के मामले अधिक होते हैं।

एडीएचडी के कारण   
एडीएचडी क्यों होता है, इसके निश्चित कारणों के बारे में नहीं पता, पर कुछ संभावित कारण इस प्रकार हैं...
आनुवंशिकता: कुछ परिवारों में पीढ़ी दर पीढ़ी बच्चों में ऐसे जींस का ट्रांसफर होता है, जिससे मस्तिष्क के उन हिस्सों के ऊतक पतले हो जाते हैं, जो ध्यान से संबंधित होते हैं। कई बार समय के साथ ये ऊतक सामान्य हो जाते हैं, जिससे स्थिति में सुधार आता है।  
पर्यावरणीय कारक: गर्भावस्था में सिगरेट व शराब का सेवन करने वाली महिलाओं के बच्चों में एडीएचडी की आशंका अधिक होती है। छोटी उम्र में लगातार लेड की उच्च मात्रा के संपर्क में रहने से भी ये हो सकता है।

चीनी और फूड एडिटिव : कई विशेषज्ञ हाइपरएक्टिविटी को अधिक मात्रा में रिफाइंड शुगर व फूड एडिटिव का सेवन करने से जोड़ते हैं। हालांकि इस संबंध में मतभेद भी हैं और शोध कार्य चल रहे हैं।    

रासायनिक असंतुलन: मस्तिष्क के रसायनों में असंतुलन होने पर भी एडीएचडी के लक्षण उभरते हैं। मस्तिष्क में अटेंशन को नियंत्रित करने वाला हिस्सा एडीएचडी से पीड़ित बच्चों में कम सक्रिय होता है।

मस्तिष्क का चोटिल होना: कई बार चोट के कारण मस्तिष्क का अग्रभाग, जिसे फ्रंटल लोब कहते हैं, क्षतिग्रस्त हो जाता है, जिससे आवेगों और भावनाओं को नियंत्रित करने में समस्या आती है।

समय पूर्व जन्म होना: समय पूर्व जन्म लेने वाले बच्चे या जन्म के समय बेहद कम वजनी बच्चों में भी इसकी आशंका अधिक होती है। 

वयस्क भी हो सकते हैं शिकार 
कुछ बच्चों में बड़े होने पर भी एडीएचडी की समस्या बनी रहती है। कई वयस्क ये जानते भी नहीं कि वे इससे प्रभावित हैं। एडीएचडी से पीड़ित वयस्कों में सुबह उठना, काम के लिये घर से निकलना, समय पर ऑफिस पहुंचना और अपने रोजमर्रा के कार्यों को बेहतर व समय पर पूरा करना एक चुनौतीभरा कार्य होता है। इन वयस्कों का स्कूल में फेल होने का इतिहास होता है। ये अकसर संबंध ढंग से नहीं निभा पाते। बेचैनी के शिकार रहते हैं। बचपन में सही उपचार नहीं मिलने के कारण कुछ लोगों में अपने व्यवहार के लिए नकारात्मक भावनाएं भी घर कर लेती हैं। यही वजह है कि सही समय पर एडीएचडी की पहचान होने पर व्यक्ति को समस्या से प्रभावी ढंग से निपटने में मदद मिलती है। 

उपचार
इसका कोई स्थायी उपचार नहीं है। पीड़ित बच्चे को उसके व्यवहार पर काबू रखने का अभ्यास कराया जाता है, ताकि वह सामान्य जीवन जी सके। स्टीम्युलेंट मेडिकेशन के अलावा ये थेरेपी भी कारगर पायी गयी हैं-  

साइकोथेरेपी (काउंसलिंग): इससे पीड़ित बच्चों को अपनी भावनाओं और हताशाओं को बेहतर ढंग से संभालना सिखाया जाता है। बच्चों का आत्मविश्वास बढ़ाने का प्रयास भी किया जाता है। परिवार के सदस्यों को भी काउंसलिंग दी जाती है।

बिहेवियरल थेरेपी: बच्चे के व्यवहार में सुधार लाया जाता है। पीड़ित बच्चे को स्कूल का होमवर्क या दूसरे प्रेक्टिकल कार्यों के लिए सहायता उपलब्ध करायी जाती है। बच्चे को स्वयं पर नियंत्रण करना सिखाया जाता है। गुस्से को काबू रखना या कार्य को सोच-समझकर करना सिखाया जाता है। अपनी बारी की प्रतीक्षा करना, दूसरों की सहायता करना व उनसे सहायता मांगना, दूसरों के तंग करने पर सही प्रतिक्रिया देना आदि सिखाते हैं।  

डांस थेरेपी: दूसरे बच्चों के साथ घुलने-मिलने के अलावा डांस से बच्चों का शरीर पर नियंत्रण बढ़ता है। 

प्ले थेरेपी: इसमें पीड़ित बच्चे को दूसरे बच्चों के साथ खेलने के लिए बढ़ावा दिया जाता है। काउंसलर माता-पिता को बच्चे को आउटडोर व इनडोर गेम्स खेलने देने के लिए प्रेरित करते हैं, जिससे बच्चों की सेहत व नींद प्रक्रिया में सुधार आता है।
 
माता-पिता की भूमिका
यह समझना जरूरी है कि एडीएचडी के कारण मस्तिष्क में रसायनों का असंतुलन हो जाता है, जिसके कारण बच्चा अपने आवेगों और व्यवहार पर काबू नहीं रख पाता। वह जानकर ऐसा नहीं कर रहा होता। माता-पिता के लिए बच्चे को प्रेम और सकारात्मक भावनाओं के साथ संभालना जरूरी है।
- बच्चे की दिनचर्या निर्धारित करें और उसका पालन करने के लिए प्रेरित करें।
- अच्छा काम करने पर प्रशंसा करें।
- टीवी व मोबाइल स्क्रीन के सामने अधिक देर न बैठने दें। आउडडोर खेल खेलने के लिये प्रेरित करें।
- बच्चों के खान-पान पर ध्यान दें। ऐसी चीजें, जिन्हें खाने पर वे हाइपरएक्टिव होते हैं, उन्हें न दें। 
- बच्चे पर स्कूल में अच्छे प्रदर्शन के लिए दबाव न बनाएं। तनाव की अधिकता से यह समस्या बढ़ती है। 
- स्कूल व प्रशासन से बच्चे के बारे में खुलकर बात करें। उनसे अनुरोध करें कि वे बच्चे को प्रथम पंक्ति में बिठाएं। खिड़की के पास न बिठाएं। सबके सामने न डांटकर अलग से समझाएं।
(हमारे विशेषज्ञ : डॉ. शंभवी सेठ, कंसल्टेंट, पीडियाट्रिक डेवलपमेंट, बीएलके सुपर स्पेशिएलिटी हॉस्पिटल, नई दिल्ली, डॉ. संदीप गोविल, मनोचिकित्सक, अटलांटा हॉस्पिटल)

लक्षण और संकेत  
एडीएचडी डिसॉर्डर में तीन लक्षण सबसे प्रमुख हैं- लापरवाही, अतिसक्रियता और आवेग। कुछ बच्चों में ये तीनों लक्षण होते हैं, तो कुछ बच्चों में अनमनापन व सावधानी की कमी होती है, पर वे अतिसक्रिय नहीं होते। कुछ अतिसक्रिय और आवेगी होते हैं, पर लापरवाह नहीं। कुछ में दोनों तरह के लक्षण होते हैं।

इनअटेंटिव बच्चों के लक्षण इस प्रकार हैं...
- आसानी से ध्यान भटकना, एक काम करते-करते दूसरा शुरू कर देना, एकाग्र नहीं हो पाना। रोजमर्रा के कामों को भूलना। कार्य को व्यवस्थित ढंग से न कर पाना।
- मनपसंद काम करते हुए भी कुछ मिनटों में बोर होना।
- होमवर्क व अन्य कार्यों को समय पर पूरा न कर पाना। अपने खिलौने, कॉपी, पेन, पैंसिल, रबर आदि खो देना।
- बात को ध्यान से न सुनना, अधिक दिमागी काम को देर तक न कर पाना।
अतिसक्रिय यानी हाइपरएक्टिव बच्चों के लक्षण हैं-
- अपनी सीट पर लगातार हिलना-डुलना।
- बिना रुके लगातार व अधिक बोलना।
- खाना खाते समय या स्कूल में बिना हिले-डुले बैठने में समस्या होना।  लगातार यहां-वहां घूमना।

अधिक आवेग में रहने वाले बच्चों के प्रमुख लक्षण हैं-
- बहुत अधीर होना। प्रश्न से पहले उत्तर बोलना। दूसरों की बातचीत को बीच में रोकना।
- अपनी भावनाएं खुलकर अभिव्यक्त करना।
- बिना सोचे-समझे कोई काम करना।
- खेल में अपनी बारी की प्रतीक्षा करने में समस्या होना।

 

 

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