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बातें जो नहीं होने देतीं खुद से रूबरू

हम दिन-ब-दिन स्मार्ट हो रहे हैं। इसलिए स्मार्ट फोन की तरह हमारी बैटरी भी जल्दी खत्म हो जाती है। थोड़ा सा खुद को इस्तेमाल किया कि बैटरी खत्म। नतीजा आलस, थकान और बोरियत। यह जानते हुए भी कि ध्यान रूपी चार्जर से तन और मन की बैटरी चार्ज होती है,  कुछ भ्रांतिया हैं, जो हमें ध्यान करने से रोकती हैं। आइये जानें...

देर से होता है असर
यह सही है कि लंबे समय के अभ्यास के बाद ध्यान करने की कुशलता बढ़ जाती है, पर शरीर पर इसका सकारात्मक असर जल्द ही दिखाई देने लगता है। हार्वर्ड यूनिवर्सिटी और मेसाचुसेट्स जनरल हॉस्पिटल के एक संयुक्त अध्ययन में आठ सप्ताह तक ध्यान के नियमित अभ्यास से मरीजों में बेचैनी, अनिद्रा, इम्यून सिस्टम, तनाव और रक्तचाप के स्तर पर सुधार देखने को मिला। 

कठिन है ध्यान
अधिकतर लोग ध्यान को जटिल मानकर इसे ऋषि-मुनियों तक सीमित करके देखते हैं, जबकि किसी अनुभवी मार्गदर्शक से सीखने के बाद यह एक सहज और मनोरंजक क्रिया बन जाती है। ओशो कहते हैं, 'सहज मुद्रा में मौन बैठकर अपने विचारों को देखने से आसान काम कौन सा हो सकता है। अपने विचारों को रोकें नहीं, उन्हें देखें। सिर्फ देखें, अच्छे-बुरे का लेबल न लगाएं। यह किसी धर्म विशेष की नहीं, आंतरिक शांति को पाने की प्रक्रिया है। जब आप कहते हैं कि 'मैं दिमाग नहीं हूं, केवल दर्शक हूं, उस क्षण कई हैरान करने वाले  अनुभव होते हैं।'

दिमाग शांत नहीं होता
यदि कहा जाए कि आंखें बंद करके उछलते हुए किसी बंदर को छोड़कर किसी भी चीज पर सोचें, तो मन बार-बार बंदर की ओर ही भटकता है। विचार, ध्यान के दुश्मन नहीं हैं। आचार्य महाप्रज्ञ कहते हैं, 'विचारों को आने से रोका ही नहीं जा सकता। ध्यान के दौरान विचार आने और उससे मुक्त होने की प्रक्रिया चलती रहती है। धीरे-धीरे अभ्यास के बाद विचार से मुक्त होने का स्पेस बढ़ जाता है। भटकते हुए मन को आप श्वास, किसी छवि या मंत्र का स्मरण कर पकड़ने की कोशिश करते हैं। मन, वचन और काया की एकरूपता ध्यान है। यदि ध्यान में पूरे समय मन भटकता है, तो भी मौन और काया की स्थिरता का लाभ मिलता है। आप अपने उन विचारों को देख पाते हैं, जिनसे अनजान थे। अपने अहं, क्रोध, लोभ या करुणा के भावों को देख पाना भी कम बड़ी उपलब्धि नहीं है।

कोई चमत्कार तो हुआ नहीं!
आधुनिक गुरु दीपक चोपड़ा के अनुसार, 'अकसर लोग शिकायत करते हैं कि उन्हें कोई खास रंग या कोई मोहक छवि नहीं दिखी। कोई जादुई अनुभव नहीं हुआ। यह सही है कि ध्यान में कई तरह के अनुभव होते हैं, पर चमत्कारिक अनुभव करना ध्यान का उद्देश्य नहीं है। ध्यान आराम और सतर्कता का मेल है। ध्यान का असली अनुभव ध्यान के बाद होता है, जब रोज के तमाम कार्यों के बीच एक आंतरिक मौन, आनंद व स्थिरता हमारे साथ बने रहते हैं। ध्यान में इन बातों का ख्याल रखें-
- बिना किसी अपेक्षा के ध्यान करें।
- कई बार मन बेहद सक्रिय होता है, तो कई बार तुरंत शांत हो जाता है। कई बार अच्छा लगता है, तो कई बार कुछ अनुभव नहीं होता। खुद को सहज रखें।
- फोन बंद कर दें। शांत वातावरण में ध्यान करें।

समय नहीं है
प्रसिद्ध एंकर ओप्रा विन्फ्री कहती हैं, 'ध्यान के लिए समय से अधिक इच्छाशक्ति की जरूरत होती है। मैं हर रोज कम से कम एक बार 20 मिनट ट्रांसन्डेंटल मेडिटेशन करती हूं। हममें खुद को रीचार्ज करने की अद्भुत शक्ति है। ध्यान से मन शांत और एकाग्र होता है। हमारी कार्यकुशलता बढ़ती है और हम समय का बेहतर उपयोग कर पाते हैं।         

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