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इंशा जी की बात निराली

आज विख्यात कवि और व्यंग्यकार इब्ने इंशा की जन्मतिथि है। इब्ने इंशा ने कविता, व्यंग्य और यात्रा संस्मरण के क्षेत्र में अपनी प्रतिभा व मौलिकता का रंग बिखेरा है। उनके लेखन में अपनी तरह की सरलता और गहराई है, जिससे वे पाठक के बहुत अपने लेखक बन जाते हैं। यहां प्रस्तुत हैं उनके काव्य, व्यंग्य और यात्रा संस्मरणों के कुछ अंश, जो पहली बार हिंदी पाठकों की नजर में आ रहे हैं..




चीन में आप कोई चीज गुम नहीं कर सकते

हमें जाती तौर इन आजादियों को बरतने का शौक वहां तो क्या होता, यहां भी कभी नहीं हुआ। बस एक-दो बेजरूरी रियायतें समाज से ले रखी हैं, जिन्हें दफा, दो दफा इस्तेमाल कर लेते हैं। इनमें से एक भूल जाने और अपनी चीजें खो बैठने या चोरी कराने की भी है। आदत से मजबूर चीन में भी हमने इससे परहेज न किया। पैकिंग से चलते वक्त हम अपना एक पायजामा गुसलखाने में लटका छोड़ आए थे। इसकी हमें जरूरत न थी। हमारे पास और पायजामे भी थे, लेकिन बहरहाल हमारी रवायती भूल से ऐसा हुआ। वहां से दाहोन पहुंच कर अभी हम दम भी न लेने पाए थे कि होटल वालों ने एक पैकेट दिया, जिसमें हमारा पायजामा धुला-धुला, इस्तरीशुदा और एक-एक चप्पल पॉलिश और मरम्मतशुदा नफासत से लिपटी हुई पाई गई। पायजामा हमारा था और चप्पल हमारे दोस्त डॉक्टर ईनामुल हक की। वो बोले, अरे इसे तो मैं खुद ही वहां छोड़ आया था कि कौन इसकी मरम्मत करवाता फिरे। दाहोन में हम चंद पुराने रिसाले (पत्रिका), सुने हुए न्यूज एजेंसी के बुलेटिन छोड़ आए थे, इसलिए कि हमारे काम के न थे, इनका पैकेट भी कैंटीन में आ मिला। कैंटीन से हांग्चू रेल में आते हुए हमने नाखून काटने के लिए एक बड़ा ब्लेड इस्तेमाल किया और इसे वहीं मेज पर पड़ा छोड़ आए। दूसरे दिन वो एक लिफाफे में रखा हमें मिला कि रेलवे का एक मुलाजिम दे गया है, देख लीजिए आप ही का है।

एक लीडर इब्राहिम खान एक रोज एक मिडल स्कूल देखने गए। वहां इनके फाउंटेन पेन का क्लिप या गिर गया या खुद फेंक आए थे। वो भी दूसरे रोज होटल के मैनेजर ने ला थमाया कि एक स्कूल के लड़के आए थे और ये दे गए हैं। शंघाई से चलते वक्त हम कुछ चीजें फेंक के आना चाहते थे, जिनमें से एक हेयर ऑयल की खाली शीशी थी। इन चीजों को हमने रद्दी की टोकरी में डाला और होटल के बैरे को बुला कर सफाई दी कि ये चीजें हम खुद छोड़ कर जा रहे हैं। पूरी तरह से इत्मीनान के लिए होटल के मैनेजर को समझाना पड़ा कि ये सामान हमने बिना किसी जोर-जबरदस्ती व नाखुशी के अपनी मर्जी से फेंका है। ये एहतियात इस डर से कि कभी ऐसा न हो- कि ये चीजें कभी दरियाफ्त हों और होटल वाले हवाईअड्डे को फोन करें कि इन लोगों का जहाज रोक लिया जाए और जब तक मुसाफिर अपनी हेयर ऑयल की शीशी को वसूल न कर लें, जहाज को पाकिस्तान जाने की इजाजत न दी जाए।

ताज्जुब है इन पाबंदियों में चीन के लोग कैसे जिंदगी बसर करते हैं। हमने तो उसी वक्त इत्मीनान का सांस लिया, जब ढाके के हवाई अड्डे पर हमारा हवाई सफर का बैग हमारे देखते-देखते हमारी नजरों से गायब हुआ और हम सबने मुसाफिरखाने की मेजों पर ऐशट्रे के बावजूद अपने-अपने सिगरेट फर्श पर फेंके और हमारे दोस्त ने गुसलखाने की दीवार पर पान की पिचकारी मारी।
(चलते हो तो चीन को चलिए का अंश)
(उर्दू से लिप्यांतरण: मज्कूर आलम)



केले दुकेले का ख़ुदा हाफिज ... का अंश
आपने कभी केला देखा है? खाया है? खाया नहीं तो कभी इस पर फिसले जरूर होंगे। फिसलता भी आदमी अच्छी चीज़ पर है। हमारी मिसाल लीजिए। जहां अच्छी सूरत देखी, बुरी तरह उस पर फिसल गए। जो अच्छी सूरत पर नहीं फिसलते, पैसे पर फिसल जाते हैं। ज़ाहिर है पैसा भी अच्छी चीज़ है। बल्कि इंसा़फ यह है कि अच्छी सूरत से ज़्यादा अच्छी चीज़ है, क्योंकि पैसा है तो अच्छी सूरत भी इससे हासिल कर सकते हैं, जबकि अच्छी सूरत बाज मौकों पर पैसे के नु़कसान की वजह बन जाती है। बहरहाल गुफ्तगू का म़कसद यह कि केले को किसी तऱफ से देखिए, किसी तऱफ से खाइए, किसी तऱफ से इस पर फिसलिए, अच्छी चीज़ है। और भी फल है ज़माने में ... केले के सिवा। लेकिन इन्हें महज़ देख सकते हैं या ज़्यादा से ज़्यादा खा सकते हैं। इन पर फिसल नहीं सकते।


किस्सा हमारे चेकअप का... का अंश
हमारे यहां जितने बड़े आदमी बाहर जाते हैं, अपना मेडिकल चेकअप जरूर कराते हैं। यहां तक कि अब किसी को उस व़क्त तक बड़ा आदमी समझा ही नहीं जाता, जब तक उसके बाहरी मुल्क में चेकअप कराने की ख़बर न आए। इसलिए हमने अपने दोस्तों से कहा कि हम भी जापान में अपना चेकअप कराएंगे और पाकिस्तान के अख़बारों में इसकी ख़बर छपवाएंगे। बोले, तुम्हारा चेकअप, क्या माने? तुम्हारा दिमाग़ ख़राब है क्या? हमने कहा, जिस्म में दिमाग के अलावा भी तो बहुत से अहम अंग हैं जो ख़राब हो सकते हैं। इनमें बाज़ तो दिमाग़ से ज़्यादा अहम होते हैं। दिमाग़ के बग़ैर तो काम चल जाता है, बल्कि ज़्यादा अच्छी तरह चलता है। दूसरे अंगों के बारे में आप यह नहीं कह सकते। इनमें से बाज़ तो बड़े काम के होते हैं।
(सफरनामा नगरी नगरी फिरा मुसाफिर से ...)



विद्यालय से रामनगर तक

विद्यालय से रामनगर तक
गर्द का कुहरा फैला फैला
तारों की लौ फीकी फीकी
चांद चेहरा मैला मैला
इंशा जी इस चांद रात में
करते हुए कश्ती की सवारी
फिर कब आओ, फिर कब आओ
काशी की हर बात न्यारी

दूर दूर के यात्रियों ने
घाट घाट पर डेरे डाले
पंडित पंडित नौका वाले
उमड़ पड़े आज इतने सवेरे
पापों की गठरी को डुबोने
हम भी पंचा देस से आए
जीवन का दुख कौन बटाए
जीवन का दुख सहा न जाए
हम लोगों पर कष्ट पड़ा है
हम लोगों पर व़क्त है भारी
लेकिन किस को कौन बताए
काशी की हर बात है न्यारी
(लम्बी कविता का अंश)


जपो सतनाम

जब दर्द का दिल पर पहरा हो
और याद का घाव गहरा हो
आ जाएगा आराम
जपो सतनाम
जपो सतनाम

यह बात तो ज़ाहिर है भाई
है इश्क का हासिल रुसवाई
पर सोचो क्यों अंजाम
जपो सतनाम
जपो सतनाम

जब इश्क का दम तुम भरते हो
क्यों हिज्र के शिकवे करते हो
यह इश्क का है इनाम

जपो सतनाम
जपो सतनाम

जहां मीर, स़फीर, वज़ीर भी है
उस भीड़ में एक फ़कीर भी है
और उसका है यह कलाम
जपो सतनाम
जपो सतनाम
(लंबी कविता का अंश)


सो जाओ!
सब बूझोगे सब जानोगे सब समझोगे
क्या हमने समझ कर पाया जो तुम अब समझोगे
बस नींद की चादर ओढ़ के गाफिल सो जाओ

सांझ समय की कोमल कलियां
सांझ समय की कोमल कलियां मुस्काएं मुरझाएं
नगरी नगरी घूमने वाले फिर वापस न आएं
हम बेलों पर ओस की मोती हम फूलों की ख़ुश्बू
पीपी पड़ा पपीहा बोले कोयल कू कू, कू कू
(उर्दू से लिप्यांतरण: नासिरुद्दीन हैदर)

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