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धारा को पुनर्जीवित करने की कोशिश

महान साहित्यकार व संपादक आचार्य महावीर प्रसाद द्विवेदी के कुशल निर्देशन में सरस्वती पत्रिका ने हिंदी साहित्य में एक नए युग का सूत्रपात किया था। सन 1900 में शुरू हुई यह पत्रिका उतार-चढ़ावों के साथ 70 के दशक तक प्रकाशित होती रही और उसके बाद इतिहास बन गई। एक ऐसे समय में, जब लुप्त सरस्वती नदी की धारा को पुन: जीवित किए जाने के प्रयास किए जा रहे हैं, उसी समय में सामयिक प्रकाशन ने लुप्त सरस्वती पत्रिका को पुनर्जीवित करने का बीड़ा उठाया है। 'सामयिक सरस्वती' के नाम से पत्रिका का प्रवेशांक (अप्रैल-जून, 15) प्रकाशित हो चुका है। सरस्वती की प्रासंगिकता पर सम्पादक शरद सिंह कहती हैं, 'असंवेदनशीलता के संकट की चुनौती को स्वीकार कर सामयिक सरस्वती लेखक, पुस्तक और पाठकों के बीच एक आत्मिक संवाद सेतु का निर्माण करने में प्रयत्नशील है।'
सामयिक सरस्वती (त्रैमासिक पत्रिका), कार्यकारी संपादक: शरद सिंह, सामयिक प्रकाशन, नई दिल्ली, मू. 50 रु.



कवि की थाती

वरिष्ठ कवि केदारनाथ सिंह की रचनाओं का यह संचयन लीलाधर मंडलोई ने तैयार किया है, जो स्वयं हिंदी कविता के एक महत्वपूर्ण हस्ताक्षर है। उन्होंने उचित ही रेखांकित किया है कि केदार जी गीत-नवगीत की वसुधा से आज की कविता में आए तो साथ में गीतात्मकता लेकर आए। उनकी कविता में गहन जीवन सौंदर्य और जनपक्षी राजनीतिक चेतना का मेल है। केदार ऐसे कवि हैं, जिनकी कविता में लोक काव्य की गीतात्मकता और नागर संवेदना की यथार्थपरकता एकमेव होकर उपस्थित है। मंडलोई के शब्दों में केदार का कवि 'पडरौना' (केदारजी का जन्म ग्राम) के सामान्य नागरिक की आंखों से इस महादेश के रास्ते दुनिया को देखता है। और अपनी चेतना, अपने विवेक, अपने प्यार से सृष्टि को कविता में अर्थवान आभा से आलोकित करता है- पूरी आस्था के साथ। संचयन में केदार जी की कविताओं के साथ-साथ उनके गद्य की बानगी भी प्रस्तुत की गई है। कुछ अनुवाद भी दिए गए हैं।
केदारनाथ सिंह संचयन, संपादक: लीलाधर मंडलोई, भारतीय ज्ञानपीठ, नई दिल्ली, मू. 540 रु.



संस्कृति समीक्षा

मराठी के प्रसिद्ध साहित्यकार भालचंद्र नेमाड़े के उपन्यास 'हिन्दू' का प्रकाशन ऐसे समय में हुआ है, जब भारतीय समाज धर्म व संप्रदाय आधारित राजनीति से उपजी समस्याओं से रूबरू है। समस्याएं यहीं तक सीमित नहीं हैं, बल्कि और भी हैं, लेकिन एक महत्वपूर्ण प्रश्न है अस्मिता का। ऐसे में यह उपन्यास भारत के जातीय 'स्व' का संधान करता नजर आता है। क्या यह किसी एक धर्म या जाति या समुदाय की देन है और सिर्फ उसी की थाती है? क्या देसी और विदेशी की टकराहट में हमने अपने लालच के कारण अपनी वास्तविक विरासत खो दी है? या अपनी कथित विरासत के दावे को लेकर हमने इस कदर आसन जमा लिया है कि संस्कृति-संपदा के नाम पर केवल कबाड़-कूड़ा जमा करते जा रहे हैं? ऐसे अनेक प्रश्नों के जवाब तलाशता यह उपन्यास सुदूर अतीत से बिल्कुल वर्तमान तक का अवलोकन करता है।
हिन्दू: जीने का समृद्ध कबाड़, भालचंद्र नेमाड़े, राजकमल प्रकाशन, नई दिल्ली, मू. 800 रु.

प्रकृति-प्रेम

'पाथेर पंचाली' जैसे विख्यात उपन्यास के रचयिता विभूतिभूषण बंद्योपाध्याय की सात डायरियों का संकलन है यह पुस्तक। बांग्ला भाषा के इस महत्वपूर्ण लेखक को प्रकृति से बेहद लगाव था, जिसका प्रमाण यह पुस्तक देती है। उनकी घुमक्कड़ी प्रकृति के नाना रूपों का उद्घाटन करती चलती है। इनमें विभूतिभूषण के जीवन के कई प्रसंग भी दर्ज हैं, लेकिन जो चीज सबसे अधिक ध्यान खींचती है, वह प्रकृति के साथ उनका अपूर्व आत्मीय मेल, जिसके मूल में एक व्यापक मानवीय भावना उपस्थित है।
विभूतिभूषण की अरण्यगाथा (दो खंडों में ), विभूतिभूषण बंद्योपाध्याय, अनुवाद: रामशंकर द्विवेदी, साहित्य अकादेमी, नई दिल्ली, मू. 500 रु.

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