DA Image

अगली स्टोरी

class="fa fa-bell">ब्रेकिंग:

आमार सोनार बांग्ला

भारत और बांग्लादेश का रिश्ता सिर्फ पड़ोसी का नहीं है। ये दोनों एक ही संस्कृति के साझेदार मुल्क हैं। इनके रिश्तों की जड़ें कितनी गहरी हैं, इसका सबसे बड़ा उदाहरण यह है कि दोनों देशों के राष्ट्रगान गुरुदेव रवींद्रनाथ टैगोर ने लिखे हैं। इस रिश्ते की पड़ताल कर रहे हैं आनंद बाजार पत्रिका के दिल्ली संपादक जयंत घोषाल

बांग्लादेश अपनी भौगोलिक सीमा की वजह से एक छोटा देश हो सकता है, किंतु उसकी भू-सामरिक स्थिति भारत के लिए बहुत महत्वपूर्ण है और इसलिए आपसी रिश्ते को प्रगाढ़ बनाने में सांस्कृतिक योगदान आवश्यक हो जाता है।  

साल 1971 में जब शेख मुजीबुर्रहमान के नेतृत्व में बांग्लादेश बना तो उसकी पहचान से जुड़े दो मसले थे: धर्म और भाषा। यह मुस्लिम बहुल देश तो है, मगर इस्लामिक देश नहीं। इसकी भाषा बांग्ला है, उर्दू नहीं। यहां ‘एथनिक आइडेंटिटी’ को महत्व दिया गया। बांग्ला में इसे ‘जातीय सत्ता’ कहते हैं। यानी धर्म से आगे भाषा रही। बांग्ला संस्कृति की जीत हुई। वैसे इस देश के बनने के साथ पहले मुस्लिम, बाद में बंगाली या पहले बंगाली, बाद में मुस्लिम, इस मुद्दे को लेकर टकराहट पैदा हुई और जो ‘तालिबान’ तत्व हैं (यहां तालिबान तमाम नॉन-स्टेट एक्टर, जमात और कट्टर संगठन के लिए इस्तेमाल किया गया है), वे बांग्लादेश का ‘तालिबानीकरण’ चाहते हैं। यह हमारे लिए घातक है। इसलिए जो हमारी धर्मनिरपेक्षता की संस्कृति है, उसका हस्तांतरण सांस्कृतिक आदान-प्रदान के जरिये किया जाना चाहिए। भारत इस दिशा में बखूबी काम कर रहा है। 

आम समझ यह थी कि प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी तीस्ता जल-विवाद के निपटारे के लिए पश्चिम बंगाल की मुख्यमंत्री ममता बनर्जी को ढाका ले जाना चाहते हैं, लेकिन वहां जो केमिस्ट्री बांग्लादेशी प्रधानमंत्री शेख हसीना और ममता बनर्जी के बीच दिखी, उससे यह साफ हो गया कि प्रधानमंत्री मोदी उसी बंगाली अस्मिता को उभारना चाहते थे, जिसे कट्टरपंथी खत्म करने पर आमादा हैं। प्रधानमंत्री के साथ दुभाषिया भी गया था। जब शेख हसीना बोल रही थीं, तब दुभाषिया प्रधानमंत्री के सामने बांग्ला से हिंदी अनुवाद कर रहा था। मैं नजदीक ही था, इसलिए प्रधानमंत्री का यह कहा सुन पाया, ‘मुझे बांग्ला भी सुनने में मजा आ रहा है। सब ट्रांस्लेट करने की जरूरत नहीं है।’ ढाका यूनिवर्सिटी में प्रधानमंत्री मोदी बांग्ला में बोलते भी नजर आए।

इसी तरह ममता बनर्जी ने शेख हसीना को दो साड़ियां भेंट कीं। एक- कांथा साड़ी और दूसरी बालू चेरी। सूती पर कान्था एक तरह की कसीदाकारी है, जो पश्चिम बंगाल के पारंपरिक परिधानों में से एक है। बालू चेरी साड़ी पश्चिम बंगाल के विष्णुपुर और मुर्शिदाबाद में बनती है। ये दोनों ही साड़ियां हमारी संस्कृति का प्रतिनिधित्व करती हैं। दूसरी तरफ, शेख हसीना ने भी ममता बनर्जी को ढाका की साड़ी दी। इस सांस्कृतिक आदान-प्रदान ने एहसास कराया कि हममें वाकई बहुत कुछ समान है।

इस एहसास को समझने के लिए हमें 1947 के समय में जाना चाहिए, जब बंटवारा हो चुका था और मोहम्मद अली जिन्ना पूरे पाकिस्तान में दौरा कर यह बता रहे थे कि राष्ट्रीय भाषा उर्दू होनी चाहिए, जबकि खुद जिन्ना को उर्दू नहीं आती थी और वह अंग्रेजी में भाषण दिया करते थे। जब वह पूर्वी पाकिस्तान (आज के बांग्लादेश) के ढाका में पहुंचे तो वहां उनकी इस दलील की काफी मुखालफत हुई। लोगों ने कहा कि हमारी भाषा बांग्ला ही रहेगी। पाकिस्तान से अलगाव का भाव उसी समय दिख गया था, क्योंकि तभी से पूर्वी पाकिस्तान में भाषा का आंदोलन शुरू हो गया। साल 1971 तक आते-आते यही आंदोलन मुक्ति संग्राम बना। इस लिहाज से दुनिया में बांग्लादेश एकमात्र देश है, जिसका निर्माण भाषा के आधार पर हुआ।

बीते दिनों बांग्लादेश की शीर्ष अदालत ने देश को धर्मनिरपेक्ष बनाने का आदेश दिया। वहां के मुल्ला (जो कट्टर हैं) इससे काफी खफा हैं, लेकिन शेख हसीना ने ‘सेक्यूलर बांग्लादेश’ को अपना लक्ष्य बनाया है। बांग्लादेश में धर्मनिरपेक्षता के सबसे बड़े प्रतीक गुरु रवींद्रनाथ टैगोर हैं। हमारे राष्ट्रगान जन, गण, मन... और बांग्लादेश ने जिसे अपना राष्ट्रगान बनाया है, उस आमार सोनार बांग्ला..., दोनों को रवींद्रनाथ टैगोर ने ही लिखा है। यह दुनिया में कहीं और देखने को नहीं मिलता कि दो देशों के राष्ट्रीय गान किसी एक व्यक्ति के लिखे हों। 1971 की लड़ाई के दौरान पाकिस्तानी सेना ने ऑल इंडिया रेडियो, ढाका में रवींद्रनाथ टैगोर के गानों पर पाबंदी लगा दी थी और इस प्रतिबंध ने ही आंदोलन की आग में घी का काम किया।

वैसे विश्वविद्यालय से विश्वविद्यालय स्तर पर इस दिशा में बहुत कुछ हो रहा है। जवाहरलाल नेहरू विश्वविद्यालय और ढाका विश्वविद्यालय के बीच छात्रों का आदान-प्रदान दिखता है। इसी तरह, जामिया मिल्लिया इस्लामिया में बांग्लादेश स्टडीज प्रोग्राम के लिए अलग से चेयर की व्यवस्था है। संगीत भी सांस्कृतिक आदान-प्रदान का बड़ा जरिया है। विश्व भारती, शांति निकेतन में बांग्लादेश से पढ़ने के लिए कई छात्र भारत आते हैं और आज के कई बांग्लादेशी गीतकार-संगीतकार इसी की उपज हैं।
नरेंद्र मोदी व ममता बनर्जी ने कोलकाता-ढाका-अगरतला और ढाका-शिलांग-गुवाहाटी बस सेवा को हरी झंडी दिखाई। कुछ समय बाद मालदा और सिलिगुड़ी से ढाका के लिए बस सेवा भी शुरू होगी। इतिहास गवाह है कि परिवहन सेवा का काम सिर्फ लोगों को लाने और ले जाने का नहीं होता, बल्कि यह सांस्कृतिक प्रसार व सांस्कृतिक मेल-मिलाप के काम भी आता है। अंग्रेजों ने जब भारत में रेल पटरियां बिछाईं तो उनका मकसद भारतीय खनिज संपदा को हड़पना था। लेकिन इसी रेल यातायात से ‘अखंड भारत’ की नींव पड़ी। 

बांग्लादेश का पुस्तक-मेला बहुत मशहूर है और यहां सबसे ज्यादा भारतीय किताबें बिकती हैं। बांग्लादेश के राष्ट्रकवि, लेखक और विद्रोही कवि काजी नजरुल इस्लाम बाद में मां काली के भक्त हो गए थे। वह भारत में, खास तौर पर पश्चिम बंगाल में भी लोकप्रिय रहे। विडंबना देखिए कि कट्टरपंथी जहां उनकी रचनाओं का विरोध करते हैं, वहीं वे उन्हें रवींद्रनाथ टैगोर से बड़ा कवि साबित करने में जुटे रहते हैं। अपने को ‘सेक्यूलर’ साबित करने के लिए जिस तरह भारत के नेता अजमेर जाते हैं, वैसे ही ढाका के नेता रामकृष्ण मिशन जाते हैं।

विश्व-कूटनीति में ‘सॉफ्ट पावर’ तेजी से प्रचलित हो रही है। संस्कृति यही सॉफ्ट पावर है। अगर हम किसी देश में पैसे के दम पर इन्फ्रास्ट्रक्चर खड़ा करते हैं तो वह ‘हार्ड पावर’ है। इसके आर्थिक मायने होते हैं, लेकिन अक्सर जन-संवेदनाओं को संस्कृति ही छूती है। ढाका के मामले में यही सांस्कृतिक आदान-प्रदान अधिक कारगर नजर आता है, क्योंकि भारत और बांग्लादेश में काफी कुछ समान है।

संबंधों के सूत्रधार

गुरुदेव रवींद्रनाथ टैगोर

हिन्दुस्तान और बांग्लादेश में समान रूप से आदरणीय गुरुदेव रवींद्रनाथ टैगोर दुनिया के एकमात्र ऐसे कवि हैं, जिनकी दो अलग-अलग रचनाएं दो अलग-अलग देशों की राष्ट्रगान हैं। उनके ‘जन गण मन...’  पर जहां भारत का सिर गर्व से ऊंचा हो जाता है, वहीं पड़ोसी मुल्क बांग्लादेश को ‘आमार सोनार बांग्ला...’ पर नाज है। हो भी क्यों न, गुरुदेव के नाम से विख्यात रवींद्रनाथ टैगोर एशिया के पहले साहित्यकार हैं, जिन्हें साहित्य के नोबेल से नवाजा गया। उनका दबदबा न सिर्फ बांग्ला साहित्य में, बल्कि विश्व साहित्य में भी है।

काजी नजरुल इस्लाम
विद्रोही कवि के नाम से विख्यात काजी नजरुल इस्लाम का जन्म भारत के चुरुलिया गांव (पश्चिम बंगाल) में हुआ था। काजी बांग्लादेश के राष्ट्रकवि हैं, जिन्हें वहां ‘जातीय कबि’ कहा जाता है। भारत और बांग्लादेश, दोनों देशों में समान रूप से लोकप्रिय काजी ने आखिरी सांस ढाका में ली और वहीं पर दफन किए गए। इनके नाम पर बांग्लादेश के मैमन सिंह में प्रतिष्ठित विश्वविद्यालय है। काजी ने सिर्फ बांग्ला में ही कविताएं नहीं लिखीं, बल्कि भोजपुरी में भी कलम चलाई है।

सत्यजीत राय
भारत रत्न और अकादमी मानद पुरस्कार विजेता सत्यजित राय विश्व भर के बंगाली समुदाय के लिए एक सांस्कृतिक प्रतीक हैं। भारत के ही समान वह बांग्लादेश में भी बेहद लोकप्रिय हैं। इसका कारण सिर्फ यह नहीं है कि उन्होंने अपनी फिल्म ‘अशनि संकेत’ में एक बांग्लादेशी नायिका को मौका दिया था, बल्कि इसलिए कि बांग्लादेश के लोगों को उन पर हमेशा से नाज रहा है। दरअसल बांग्ला फिल्मों का बहुत बड़ा बाजार है बांग्लादेश, जहां उनकी फिल्में बहुत सम्मान पाती रही हैं।

रूना लैला
यह बांग्लादेशी गायिका समूचे भारतीय उपमहाद्वीप में लोकप्रिय है। इन्होंने बांग्लादेश, भारत और पाकिस्तान की फिल्मों में कई मशहूर गाने गाए हैं। 1974 में हिन्दुस्तानी फिल्म ‘एक से बढ़कर एक’ में उनका गाया ‘दमादम मस्त कलंदर...’ तो आज भी भारत के घर-घर में सुना जाता है। इन्होंने अपने दौर के लगभग सारे बड़े भारतीय संगीत निर्देशकों, जैसे जयदेव, कल्याणजी-आनंदजी, लक्ष्मीकांत-प्यारेलाल, भप्पी लाहिड़ी आदि के लिए पार्श्वगायन किया है।

  • Hindi Newsसे जुडी अन्य ख़बरों की जानकारी के लिए हमें पर ज्वाइन करें और पर फॉलो करें
  • Web Title:आमार सोनार बांग्ला