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पथ नहीं लक्ष्य है भक्ति

एक बहुत बड़े ज्ञानी व्यक्ति थे शंकराचार्य। हालांकि वे एक ज्ञानी थे, फिर भी उन्होंने कहा था- 'मोक्ष कारणं समग्रयां भक्तिरेव गरियसि।' अर्थात तमाम पथ और पद्धति में भक्ति का स्थान सर्वोच्च है। इसलिए एक आदमी बुद्धिजीवी हो सकता है और नहीं भी हो सकता। और एक आदमी अपने कार्यक्षेत्र में प्रतिष्ठित नहीं भी है, तो भी वह मुक्ति को प्राप्त कर सकता है, यदि उसमें भक्ति है। सच कहा जाए तो ज्ञान अथवा बौद्धिक प्रयास एक पथ है। कर्म भी एक पथ है। लेकिन भक्ति एक पथ नहीं, लक्ष्य है। महान दार्शनिक शंकराचार्य ने कहा है- एक भक्त क्या करेगा? दुर्जन की संगत छोड़ देनी होगी। दुर्जन कौन है? एक मनुष्य, जिसका संग अन्य लोगों के लिए अध:पतन का कारण है, उसे दुर्जन कहा जाता है। मान लो, तुम्हारे भीतर 15 डिग्री पुण्य है और दूसरे मनुष्य के अंदर 20 डिग्री पाप है। तो इसका तुलनात्मक परिणाम क्या होगा? इसका तुलनात्मक परिणाम होगा 5 डिग्री पाप, जो तुम अर्जित करोगे। अत: वह व्यक्ति जिसका पाप 20 डिग्री है, वह तुम्हारे लिए दुर्जन है। तो क्या तुम दुर्जन का अर्थ समझ गए? यदि एक संत, जो 80 डिग्री पुण्य से युक्त है, उस बुरे आदमी के सम्पर्क में आता है, जिसमें 20 डिग्री पाप है तो वहां क्या होगा? तब वह बुरा आदमी, वह दुर्जन एक अच्छा आदमी बन जाएगा। लेकिन अगर तुम उस बुरे आदमी के सम्पर्क में आए तो तुम एक बुरे आदमी बन जाओगे, क्योंकि उसके दुर्गुणों की डिग्री तुम्हारे गुणों से बहुत अधिक है। इसलिए तुम्हें दुर्जनों को संगति से बचना होगा।

पहला बिन्दु- शंकराचार्य का पहला निर्देश था कि तुम उन व्यक्तियों के संसर्ग से दूर रहो, जो दुर्जन हैं। उनसे बचो, जिनके पाप की डिग्री तुम्हारे पुण्य की डिग्री से ज्यादा है। तुम्हें साधु के संसर्ग का प्रयत्न करना चाहिए। साधु कौन है? एक मनुष्य, जिसके साथ रहने से तुम्हारी नैतिकता, तुम्हारे पुण्यों का मान बढ़ता है और जो तुम्हें आध्यात्मिक पथ पर अग्रसर करता है। वह तुम्हारे लिए साधु है। तुम्हें हर समय साधु के संसर्ग का प्रयास करना चाहिए। साथ ही हमेशा पुण्य कार्य में व्यस्त रहो। पुण्य क्या है? आज से हजारों वर्ष पहले एक महान संत हुए थे महर्षि व्यास, जिन्होंने अठारह पुराणों की रचना की। पुण्य की व्याख्या करते हुए महर्षि व्यास ने कहा है- यदि तुम कुछ अच्छा करते हो, जब तुम किसी भी स्थिति में नि:स्वार्थ भाव से समाज सेवा करते हो तो वहां तुम्हें कुछ प्रतिकर्म मिलता है।

प्रत्येक कार्य का एक समान और विपरीत प्रतिकर्म मिलता है, बशर्ते कि तीन आपेक्षिक तत्व अर्थात देश, काल और पात्र अपरिवर्तित रहें। यही नियम है। यदि तुम अच्छा करते हो तो स्वाभाविक रूप से वहां एक अच्छा प्रतिकर्म प्राप्त होगा। जब तुम किसी मनुष्य की सेवा करते हो, विशेषकर नि:स्वार्थ सेवा तो उसके प्रतिकर्म स्वरूप तुम कुछ पाओगे। तुम चाहो या न चाहो, किन्तु उसका प्रतिकर्म प्राप्त होगा और प्रतिकर्म के फल को 'पुण्य' कहा जाता है। यदि तुमने किसी को क्षति पहुंचाई तो उसके प्रतिकर्म को 'पाप' कहा जाता है। तुम पुण्य कर्म में दिन-रात व्यस्त रहो। अब कोई कह सकता है कि दिन के समय पुण्य कर्म किया जा सकता है, लेकिन रात्रि में सोते समय पुण्य कर्म कैसे किया जा सकता है? इसका उत्तर है कि पुण्य कर्म करने के लिए तुम्हें मानसिक, आध्यात्मिक शक्ति की आवश्यकता होती है। वह शक्ति तुम्हें ध्यान और जप के माध्यम से प्राप्त हो सकती है, अर्थात मानसिक जप द्वारा। 
प्रस्तुति: आचार्य दिव्यचेतनानन्द

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