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मन को शरीर से हटाएं

एक व्यक्ति एक संत  के पास गया और बोला- 'सुना है, ईसा मसीह को जब सूली पर लटकाया जा रहा था, तब भी वे कहते रहे कि लटकाने वाले अनजान हैं, इन्हें क्षमा करना प्रभु। यह बात मेरी समझ से परे है कि कोई मुझे पत्थर मारे, गर्दन काटे और मैं अनदेखा कर दूं, क्षमा कर दूं। संत उठे और उस व्यक्ति को कच्चा नारियल दिया, फिर कहा- 'इसे तोड़ कर लाओ और देखो, ध्यान रखना कि इसकी अंदर की गिरी साबुत निकलनी चाहिए।' व्यक्ति ने नारियल पत्थर पर दे मारा। परिणाम स्पष्ट था, कच्ची गिरी टूटनी ही थी। वह व्यक्ति संत के पास गया और बोला- 'क्षमा करें, मैं गिरी को बचा नहीं पाया, क्योंकि वह ऊपरी खोल से जुड़ी हुई थी।'

तब संत ने दूसरा पका व सूखा नारियल दिया और कहा- 'इसे तोड़ कर लाओ।' व्यक्ति ने देखा कि नारियल सूखा है और उसकी गिरी तो अलग से बज रही है। उसने नारियल तोड़ा तो गिरी साबुत निकली। संत बोले- 'देखो, तुम्हारी ईसा की समझ में कच्ची और पक्की गिरी जितना ही अंतर है, क्योंकि जिनका शरीर और मन इकट्ठा रहता है, उन्हें शरीर के दुख, कष्ट, क्लेश महसूस होते हैं। ऐसे मनस्वियों को, जो मन व शरीर को अलग रखते हैं, उन्हें भौतिक दुखों की पीड़ा कभी नहीं सताती।'   

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