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हिन्दुस्तानी जुबान का अपना कवि

नज़ीर अकबराबादी को जीते-जी साहित्य जगत में सम्मान नहीं मिला, लेकिन 19वीं शताब्दी में उर्दू-अंग्रेजी शब्दकोश बनाने वाले डॉ. एस. डब्ल्यू फैलन ने लिखा कि हिन्दुस्तानी ज़ुबान में नज़ीर का महत्व वही है, जो अंग्रेजी में चौसर या शेक्सपियर का है। इस जनकवि की लोकप्रियता और सम्मान वक्त के साथ बढ़ता ही गया है। उनके 275वें जन्म वर्ष पर प्रस्तुत हैं उनकी कुछ कविताएं..



दुनिया में नेकी और बदी

है दुनिया जिस का नाम मियां ये और तरह की बस्ती है
जो महंगों को तो महंगी है और सस्तों को ये सस्ती है
यां हरदम झगड़े उठते हैं, हर आन अदालत कस्ती है
गर मस्त करे तो मस्ती है और पस्त करे तो पस्ती है
कुछ देर नहीं अंधेर नहीं, इंसाफ और अद्ल परस्ती है
इस हाथ करो उस हाथ मिले, यां सौदा दस्त-बदस्ती है

जो और किसी का मान रखे, तो उसको भी अरमान मिले
जो पान खिलावे पान मिले, जो रोटी दे तो नान मिले
नु़कसान करे नु़कसान मिले, एहसान करे एहसान मिले
जो जैसा जिस के साथ करे, फिर वैसा उसको आन मिले
कुछ देर नहीं अंधेर नहीं, इंसाफ और अद्ल परस्ती है
इस हाथ करो उस हाथ मिले, यां सौदा दस्त-बदस्ती है

जो और किसी की जां बख़्शे तो उसको भी ह़क जान रखे
जो और किसी की आन रखे तो, उसकी भी ह़क आन रखे
जो यां का रहने वाला है, ये दिल में अपने जान रखे
ये चरत-फिरत का ऩकशा है, इस ऩकशे को पहचान रखे
कुछ देर नहीं अंधेर नहीं, इंसाफ और अद्ल परस्ती है
इस हाथ करो उस हाथ मिले, यां सौदा दस्त-बदस्ती है

जो पार उतारे औरों को, उसकी भी पार उतरनी है
जो ग़र्क करे फिर उसको भी, डुबकूं-डुबकूं करनी है
शम्शीर तीर बन्दू़क सिना और नश्तर तीर नहरनी है
यां जैसी जैसी करनी है, फिर वैसी वैसी भरनी है
कुछ देर नही अंधेर नहीं, इंसाफ और अद्ल परस्ती है
इस हाथ करो उस हाथ मिले, यां सौदा दस्त-बदस्ती है

जो ऊंचा ऊपर बोल करे तो उसका बोल भी बाला है
और दे पटके तो उसको भी, कोई और पटकने वाला है
बेजुल्म ख़ता जिस ज़ालिम ने मज़लूम ज़िबह कर डाला है
उस ज़ालिम के भी लूहू का फिर बहता नद्दी नाला है
कुछ देर नही अंधेर नहीं, इंसाफ और अद्ल परस्ती है
इस हाथ करो उस हाथ मिले, यां सौदा दस्त-बदस्ती है

जो और किसी को नाह़क में कोई झूटी बात लगाता है
और कोई गरीब और बेचारा नाह़क में लुट जाता है
वो आप भी लूटा जाता है और लाठी-पाठी खाता है
जो जैसा जैसा करता है, वो वैसा वैसा पाता है
कुछ देर नहीं अंधेर नहीं, इंसाफ और अद्ल परस्ती है
इस हाथ करो उस हाथ मिले, यां सौदा दस्त-बदस्ती है

है खटका उसके हाथ लगा, जो और किसी को दे खटका
और ग़ैब से झटका खाता है, जो और किसी को दे झटका
चीरे के बीच में चीरा है, और टपके बीच जो है टपका
क्या कहिए और 'नज़ीर' आगे, है रोज तमाशा झटपट का
कुछ देर नहीं अंधेर नहीं, इंसाफ और अद्ल परस्ती है
इस हाथ करो उस हाथ मिले, यां सौदा दस्त-बदस्ती है

बरसात का तमाशा
अहले सुखन को हैगा एक बात का तमाशा
और आरिफों की खातिर है जात का तमाशा
दुनिया के साहिबों को दिन रात का तमाशा
हम आशिकों को हैगा सब घात का तमाशा
आ यार! चल के देखें, बरसात का तमाशा

सावन के बादलों से फिर आ जो घटा छाई
बिजली ने अपनी सूरत फिर आन कर दिखाई
हो मस्त राद गरजा, कोयल की कूक आई
बदली ने क्या मजे की रिमझिम लड़ी लगाई
आ यार! चल के देखें, बरसात का तमाशा

हर गुलबदन के तन में पोशाक है इकहरी
पगड़ी गुलाबी, हलकी, या गुल अनार गहरी
सहल-ए-चमन में है जो, बारह दरी सुनहरी
उनमें सभों की आकर है बज्म-ए-ऐश ठहरी
आ यार! चल के देखें, बरसात का तमाशा

आकर कहीं मजे की नन्ही फुहार बरसे
चीरों का रंग टूटकर हुस्न-ओ-निगार बरसे
एक तरफ औलती की बाहम कतार बरसे
छाजों उमड़ के पानी मूसल की धार बरसे
आ यार! चल के देखें, बरसात का तमाशा
सावन की काली रातें और बर्फ के इशारे
जुगनू चमकते फिरते जूं आसमां पे तारे
लिपटे गले से सोते, माशूक माह पारे
गिरती है छत किसी की कोई खड़ा पुकारे
आ यार! चल के देखें, बरसात का तमाशा

है जो नज़ीर, जिसकी धूमें उकस्तियां हैं
सबसे ज्यादा उसको अब ऐश मस्तियां हैं
माशूक है बगल में और मय परस्तियां हैं
शेरों से मोतियों की बूंदें बरस्तियां हैं
आ यार! चल के देखें, बरसात का तमाशा

कुछ अशअर
न गुल अपना, न खार अपना, न जालिम बागबां अपना
बनाया आह किस गुलशन में हमने आशियां अपना
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कल शब-ए-वस्ल में क्या जल्द कटी थी घडि़यां
आज क्या मर गए घडि़याल बजाने वाले
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न जाऊं मैं तो उसके पास, लेकिन क्या करूं यारो!
यका यक कुछ जिगर में आके लग जाता है नश्तर सा
नज़ीर! एक दो गिले करने बहुत होते हैं खूबां से
चलो अब चुप रहो बस, खोल बैठे तुम तो दफ्तर सा
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झमक दिखाते ही उस दिलरुबा ने लूट लिया
हमें तो पहले ही उसकी अदा ने लूट लिया
लुटे हम उसकी गली में, तो यूं पुकारे लोग
कि एक फकीर को एक बादशाह ने लूट लिया
अभी कहें तो किसी को न ऐतिबार आए
कि हमको राह में एक रहनुमा ने लूट लिया
हजारों काफिले जिस शोख ने किए गारत
नज़ीर को भी उसी बेवफा ने लूट लिया


गुरु नानक शाह
हैं कहते नानक शाह जिन्हें वह पूरे हैं आगाह गुरु।
वह कामिल, रहबर, जग में हैं यूं रौशन जैसे माह, गुरु।
मक़्सूद मुराद, उम्मीद सभी, बर लाते हैं दिलख़्वाह गुरु।
नित लुत्फ़ो करम से करते हैं हम लोगों का निरबाह गुरु।
इस बखि़शश के इस अज़मत, के हैं बाबा नानक शाह गुरु।
सब सीस नवा अरदास करो, और हरदम बोलो वाह गुरु॥1॥
हर आन दिलों विच यां अपने जो ध्यान गुरु का लाते हैं।
और सेवक होकर उनके ही हर सूरत बीच कहाते हैं।
गर अपनी लुत्फ़ो इनायत से सुख चैन उन्हें दिखलाते हैं।
ख़ुश रखते हैं हर हाल उन्हें सब तन का काज बनाते हैं।
इस बखि़शश के इस अज़मत, के हैं बाबा नानक शाह गुरु।
सब सीस नवा अरदास करो, और हरदम बोलो वाह गुरु॥2॥
जो आप गुरु ने बख्शिश से इस ख़ूबी का ईशाद किया।
हर बात है वह इस ख़ूबी की तासीर ने जिस पर साद किया।
यां जिस-जिस ने उन बातों को है ध्यान लगाकर याद किया।
हर आन गुरु ने दिल उनका ख़ुश वक़्त किया और शाद किया।
इस बखि़शश के इस अज़मत के हैं बाबा नानक शाह गुरु।
 सब सीस नवा अरदास करो, और हरदम बोलो वाह गुरु ॥3॥
दिन रात जिन्होंने यां दिल बिच है याद गुरु से काम लिया।
सब मनके मक़्सद भर पाए ख़ुश वक़्ती हंगाम लिया।
दुख-दर्द में अपना ध्यान लगा जिस वक़्त गुरु का नाम लिया।
पल बीच गुरु ने आन उन्हें ख़ुश हाल किया और थाम लिया।
इस बखि़शश के इस अज़मत के हैं बाबा नानक शाह गुरु।
सब सीस नवा अरदास करो, और हरदम बोलो वाह गुरु ॥4॥
जो लुत्फ़ इनायत उनमें हैं कब वस्फ़ किसी से उनका हो।
वह लुत्फ़ो करम जो करते हैं हर चार तरफ़ है ज़ाहिर वो।
अल्ताफ़ जिन्हों पर हैं उनके सौ ख़ूबी हासिल हैं उनको।
हर आन 'नज़ीर' अब यां तुम भी बाबा नानक शाह कहो।
इस बखि़शश के इस अज़मत के हैं बाबा नानक शाह गुरु।
सब सीस नवा अरदास करो, और हरदम बोलो वाह गुरु॥5॥

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