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जीवन राग

युवा कवि रमेश प्रजापति का दूसरा कविता संग्रह है- शून्यकाल में बजता झुनझुना। प्रजापति की कविता बौद्धिकता के भार से दबी हुई नहीं है,  बल्कि वह सहज जीवन-अनुभवों से उपजी हुई है। इसके बावजूद इनकी दृष्टि से अपने समय की जटिलताएं छूट नहीं जातीं। बारिश के एक प्रसंग में वह लिखते हैं- कुम्हार के कच्चे दीए/ चाक के पास ही पड़े। जाहिर है यह एक भिन्न दृष्टि है,  जो सहज तो है, पर अबोध नहीं। वह समय की जटिलताओं की परख तो करती ही है, वर्गीय हितों को भी उद्घाटित करती है। उनका यह पक्ष और दृढ़ता से इन पंक्तियों में दिखता है- भूख से कुनमुनाते बच्चे के लिए/ यह दुनिया/ सिर्फ उदासी का अजायबघर। प्रजापति की कविताओं में श्रमशील लोगों की उपस्थिति उल्लेखनीय है। इनका आग्रह है- वहां से देखो मुझे/ जहां सूरज/ अंधेरे की कालकोठरी में लगा रहा है सेंध। संग्रह की कविताओं में गांव और शहर के अंतर्विरोध भी बार-बार उभरते हैं।
शून्यकाल में बजता झुनझुना, रमेश प्रजापति, बोधि प्रकाशन, जयपुर, मू. 100 रु.

जमाने से रू-ब-रू

'पहाड़ों से समंदर तक' सुपरिचित ग़ज़लगो कमलेश भट्ट कमल का नवीनतम ग़ज़ल संग्रह है। कमल हिंदी के उन कवियों में शामिल हैं, जिनके लिए ग़ज़ल अभिव्यक्ति का सशक्त माध्यम है, न कि उन्होंने केवल इसकी लोकप्रियता को देखते हुए इसे अपनाया है। कहना न होगा कि आज हिंदी ग़ज़ल निरी रोमांटिकता से काफी आगे पहुंच चुकी है, और इसमें समकालीन यथार्थ का चित्रण, आम जनजीवन का संघर्ष और भविष्य के प्रति उम्मीद की अभिव्यक्ति प्रमुखता पा चुकी है। वस्तुत: आज हिंदी ग़ज़ल अपने समय की अनदेखी कर सिर्फ कल्पना में खोने वाली चीज नहीं रह गई है। कमल की ग़ज़लें इसका साक्ष्य हैं। मसलन, उन्होंने लिखा है- बहुत दौलत भरी है यूं तो सरकारी खजाने में, गरीबी है मगर हलकान दो रोटी जुटाने में। एक अन्य ग़ज़ल में वह वर्तमान दौर में व्यक्ति की बढ़ती स्वार्थपरता पर कहते हैं- अगर दुनिया में आकर सिर्फ अपनी ही खुशी जी है, समझिए आपने-हमने अधूरी जिंदगी जी है।
पहाड़ों से समंदर तक, कमलेश भट्ट कमल, आधारशिला प्रकाशन, नैनीताल, मू. 200 रु.

सहज भाव

'दिल दूर रहता है' में संकलित कविताएं सहज भावों और अनुभूतियों को लयबद्ध रूप में प्रस्तुत करने का प्रयास है। सादगी इन कविताओं को विश्वसनीयता प्रदान करती है। रचनाकार के लिए कविता का मतलब आत्माभिव्यक्ति के साथ-साथ उपदेश या बोध प्रस्तुत करने की भी है। संग्रह की पहली कविता है मेरा मन। इसमें कवि कहता है- तुमने एक खिड़की खोली है/मैंने एक दरवाजा खोला है। तुम्हारे कोमल हाथ से हाथ/मिलाने मेरा मन डोला है। स्पष्टत: यह भावों की अभिव्यक्ति है। जिन कविताओं में उपदेश की प्रवृत्ति है, उसका उदाहरण हैं ये पंक्तियां- चिरागों को न अंधेरा दिखाओ/ चिराग अकेला ही काफी है। संग्रह की ज्यादातर कविताएं छोटी हैं। कई तो दो-दो पंक्तियों की हैं, दोहों जैसी, जबकि कुछ तो मात्र एक पंक्ति की ही हैं, जैसे 'थकान' शीर्षक कविता- दूर कितना तुम्हारा गांव है।
दिल दूर रहता है, प्रो. जसवंत नेगी, नमन प्रकाशन, नई दिल्ली, मू. 150 रु.

भक्ति आंदोलन पर विमर्श

भक्ति आंदोलन भारतीय इतिहास की अत्यंत विशिष्ट घटना है, जिसके गहरे सामाजिक-सांस्कृतिक निहितार्थ थे। इसका एक अहम पक्ष इसकी अखिल भारतीय व्याप्ति भी है। प्रस्तुत पुस्तक में लेखक ने इस महत्वपूर्ण आंदोलन पर 20वीं सदी में किए गए अध्ययनों-स्थापनाओं का विश्लेषण किया है। यह मुख्य रूप से हिंदी आलोचना पर केंद्रित है, पर इसमें राजनीतिज्ञों, इतिहासकारों, समाजशास्त्रियों, साहित्येतिहास-लेखकों, कवियों, आलोचकों आदि अनुशासनों के विद्वानों की भक्ति आंदोलन की स्थापनाओं पर विचार किया गया है।
भक्ति आंदोलन और हिंदी आलोचना, मनोज कुमार सिंह, अनामिका पब्लिशर्स एंड डिस्ट्रीब्यूटर्स, नई दिल्ली, मू. 495 रु.  

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