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प्रकृति से जुड़िए निरोगी रहिए

विश्व पर्यावरण दिवस

प्रकृति से दूर होने का ही नतीजा है कि हम असमय रोगों की ओर कदम बढ़ा रहे हैं। प्राकृतिक चिकित्सा पद्धति सुरक्षित है, पर जागरुकता व संसाधनों का अभाव झेल रही है। हालांकि अब सरकार के प्राकृतिक चिकित्सा व योग को बढ़ावा देने के प्रयासों ने इस क्षेत्र में शोध व विकास की संभावना को जन्म दिया है। प्राकृतिक तरीकों से कैसे पा सकते हैं अच्छी सेहत, बता रही हैं सौदामिनी पांडेय

कुदरती तरीकों से सेहतमंद जिंदगी जीने की कला है नेचुरोपैथी यानी प्राकृतिक चिकित्सा। भारत में प्राकृतिक चिकित्सा सदियों से जीवनशैली में शुमार रही है। स्वयं महात्मा गांधी ने न सिर्फ इसे अपनाया, बल्कि इसे अपनाने पर जोर भी दिया। और अब फिर एलोपैथी दवाओं के साइड इफेक्ट और जीवनशैली से जुड़े रोगों से निजात पाने के लिए लोग प्राकृतिक चिकित्सा की ओर रुख कर रहे हैं।

सेवाक्रम नेचुरोपैथी सेंटर से जुड़े रहे नेचुरोपैथ व योग थेरेपिस्ट विजय सिंह गोसाईं के अनुसार, ‘हमारा शरीर सही पर्यावरण और आराम मिलने पर स्वयं ही कई रोगों से उबर जाता है। आहार, नियमित दिनचर्या और योग आधारित व्यायाम इसके प्रमुख अंग हैं। प्राकृतिक  चिकित्सा में पंचतत्वों आकाश, वायु , सूर्य (अग्नि), जल और पृथ्वी को आधार बना कर चिकित्सा की जाती है।’ 

विजय सिंह कहते हैं, ‘गांव में रहने वाले लोगों की जीवनशैली प्रकृति के ज्यादा करीब होती है। ग्रामीण लोग पेट की सफाई, भोजन की पौष्टिकता और नियमितता के मामले में ज्यादा जागरूक होते हैं। शहरों में रहने वाला मध्य आय वर्ग नौकरी व तनाव के बीच सेहत का ध्यान न रखने के कारण रोगों का शिकार हो रहा है। प्राकृतिक चिकित्सा मधुमेह, मोटापा, पेट, त्वचा रोग और जोड़ों के दर्द में खास प्रभावी है। किडनी या लिवर के रोगों में एलोपैथी से निराश लोग भी अब प्राकृतिक चिकित्सा की ओर रुख कर रहे हैं।’

न खाएं भूख से ज्यादा
आकाश और वायु तत्व को नेचुरोपैथी में महत्वपूर्ण स्थान दिया गया है। शरीर में इन दोनों के संतुलन के लिए एक चौथाई पेट खाली रखने की बात कही जाती है। यानी भूख से कम खाने पर जोर दिया जाता है। उपवास इस पद्धति का अभिन्न अंग है। रोग व शरीर की प्रकृति के आधार पर डाइट प्लान तैयार किया जाता है। खान-पान में फल-सब्जियों पर जोर दिया जाता है। प्रोसेस्ड खाद्य पदार्थों की जगह प्राकृतिक उत्पादों को खाने की सलाह दी जाती है। 

चिकित्सा के प्राकृतिक उपाय
हाडड्रो थेरेपी यानी जल चिकित्सा- आधे से एक घंटे तक चलने वाली इस थेरेपी में मरीज को अलग-अलग तापमान वाले पानी के संपर्क में लाया जाता है। ठंडे पानी के संपर्क में आने पर मस्तिष्क चेतन हो जाता है और शरीर में रक्त और ऑक्सीजन की सप्लाई  तेज होती है। इसके विपरीत गर्म पानी के संपर्क में आने पर रक्त धमनियों को आराम मिलता है। गर्म तौलिए की मदद से स्वेदन, रीढ़ व कटि स्नान, कुंजल स्नान, पाद स्नान, वाष्प स्नान, कुंजल व नेति आदि से वात जन्य रोग, शोध, उदर, अम्ल व पित्त रोगों को ठीक किया जाता है। यह त्वचा रोगों में फायदेमंद है।
 
हर्बल मेडिसिन: इसमें जड़ी-बूटियों और उनके रस आदि को विभिन्न रोगों के इलाज के लिए उपयोग में लाया जाता है। ये जड़ी-बूटियां खाना पचाने, मस्तिष्क को शांत रखने, कब्ज दूर करने, ग्रंथियों को ठीक से काम करने और शरीर को संक्रमण से लड़ने में भी मदद करती हैं। इन जड़ी-बूटियों को पुलटिस व टिंचर आदि के रूप में या चाय-काढ़े के रूप में लिया जाता है। बिना डॉक्टरी परामर्श के इनका सेवन नहीं करना चाहिए।
मसाज थेरेपी-मानसिक तनाव और थकान दूर करने के लिए मसाज थेरेपी एक बेहतरीन तरीका है। इसके अंतर्गत अरोमा थेरेपी, आयुर्वेदिक मसाज, स्टोन मसाज, एक्यूप्रेशर मसाज, थाई मसाज, डीप टिशु मसाज जैसी कई तरह की मालिश आती है।

मड थेरेपी: इसमें मिट्टी (पृथ्वी तत्व) के जरिए उपचार किया जाता है। इसमें कई तरह की मिट्टी प्रयोग में लायी जाती है। मिट्टी को छान कर 48 घंटों तक सुखा कर कीटाणु मुक्त बनाया जाता है। ग्लूकोमा की स्थिति में मिट्टी के गोले मरीज की आंख पर रखे जाते हैं। त्वचा पर मिट्टी के लेप से बंद रोमछिद्र खुल जाते हैं। पेट के रोग, कमर, पीठ दर्द व पैर दर्द आदि में मिट्टी का लेप प्रभावित हिस्सों पर किया जाता है। इससे टॉक्सिन बाहर निकलते हैं।

उपचार के सरल तरीके
विटामिन डी की कमी : इसके लिए झीने और कम कपड़ों में सूर्य की रोशनी में बैठें। चेहरे और पीठ दोनों तरफ से धूप लें। सिर पर सूरज की गर्मी नहीं आनी चाहिए। सूरज उगने के दो घंटे बाद तक की धूप सही रहती है। 

कैल्शियम की कमी: इसे दूर करने के लिए धूप में सादा पानी रखें। आसपास कोई रंगबिरंगी चीज न रखें। ध्यान रखें कि 1/4 बोतल खाली रहे। 8 घंटे तक इस पानी को धूप में रखें। खाने के बाद सूरज तप्त इस पानी का 20-30 एमएल तक पिएं।  पाचन क्रिया को बेहतर बनाने के लिए बोतल पर पीली पॉलीथिन चढ़ा कर धूप में रखें।

जोड़ों का दर्द:  इसके लिए लाल सेलोफिन पेपर चढ़ायी बोतल में 3/4 तिल या सरसों का तेल लें। उसमें 5-6 लहसुन की कली डाल कर सूरज की रोशनी में 45 दिन रखें। इस तेल को जोड़ों पर लगा कर मालिश करें।

सूजन या मोच: ज्यादा ठंडा या बर्फ मिला पानी सूजन या स्प्रेन वाली जगह पर लगाने की सलाह दी जाती है।

हाई बीपी, तनाव, बेचैनी या चक्कर: इसके लिए रीढ़ स्नान दिया जाता है। गर्म पानी में पाद व कटि स्नान पेट व कमर के रोगों में फायदा देता है।
हाइपरटेंशन या दिल के मरीजों को मसाज थेरेपी दी जाती है। सामान्य रूप से मसाज पैर से सिर की तरफ की जाती है। हाइपरटेंशन या दिल के मरीजों की फेफड़े से नीचे की तरफ मसाज की जाती है।

कहां है अड़चन
विजय सिंह कहते हैं, ‘प्राकृतिक चिकित्सा का असर धीमा होता है। हृदय रोग, हाइपरटेंशन, संक्रमण जैसी समस्याओं में एलोपैथी कारगर है। कई बार दोनों पद्धतियां साथ-साथ चलानी पड़ती हैं। नेचुरोपैथी में इलाज की लंबी प्रक्रिया और लोगों के पास समय की कमी भी एक बड़ी समस्या है। इस क्षेत्र में चिकित्सकीय शोध का अभाव भी एक अड़चन है। यही वजह है कि इसकी प्रामाणिकता के लिए रिसर्च की मांग की जाती है। इस क्षेत्र में शोध के लिए निर्धारित बजट भी न के बराबर है।

नेचुरोपैथी को बनाएं जीवनशैली का हिस्सा
- हफ्ते में एक बार उपवास रखें। नहीं संभव है तो सप्ताह में एक दिन एक या दो समय का भोजन न करें। इससे पेट में आकाश तत्व की पूर्ति होती है। एसिडिटी आदि वायु रोग नहीं होते।
- हर रोज थोड़ी देर सूरज की धूप में बैठें। कुछ देर पैदल चलें। पैदल चलना पाचन क्रिया को दुरुस्त रखता है। मोटापे से दूर करता है।
- 15 दिन में एक बार मड थेरेपी यानी मिट्टी का लेप करें। इससे त्वचा संबंधी समस्याएं दूर होंगी।
- रात में हल्का भोजन खाएं। रोटी और चावल ज्यादा न खाएं। ठंडी चीजें खाने से बचें।  
- शरीर में आकाश तत्व की पूर्ति करने के लिए हल्के और मुलायम कपड़ों में बगीचे में टहलें। नियमित गहरे श्वास लेने का अभ्यास करें।

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