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14 जुलाई, 2020|10:15|IST

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बचपन की कुछ यादें

मशहूर लेखक और फिल्मकार ख्वाजा अहमद अब्बास का जन्मदिन और पुण्यतिथि जून माह में पड़ती है। मिर्जा गालिब के शिष्य और मित्र मशहूर शायर अल्ताफ हुसैन हाली के पौत्र अब्बास के शुरुआती वर्षों का दिलचस्प बखान उनकी आत्मकथा ‘आई एम नॉट एन आईलैंड’ में मिलता है। यहां प्रस्तुत हैं उसके कुछ अंश:


अपनी याद की मद्धम रोशनी में कुछ हस्तियों व घटनाओं की तलाश करना चाहता हूं, जिन्होंने मेरी जिंदगी को प्रभावित किया। सबसे पहले और मेरे बचपन में सबसे अधिक नानाजान ख्वाजा सज्जाद की शख्सियत ने मुझे प्रभावित किया। नाना खानदान में ही नहीं, बल्कि पूरे कस्बे में एक मकबूल शख्सियत थे। मेरे बचपन की पहली यादें आपसे जुड़ी हैं। तीन बरस हुए नानाजान को गुजरे, लेकिन बचपन ही से हम आपको बहुत बूढ़ा समझते रहे, हालांकि उस वक्त आप पचास-पचपन ही के थे। इनकी दाढ़ी पूरी सफेद नहीं थी, ना चेहरे पर झुर्रियों का कोई निशान था। फिर भी हमारे मन में आपको लेकर एक अनुभवी बुजुर्ग की 
छाप थी। पांच बरस की उम्र में घर की चाहरदीवारी से स्कूल की दुनिया में आया। यह स्कूल अलताफ हुसैन हाली के नाम पर हाली स्कूल कहलाता था। ख्वाजा सज्जाद इसके संस्थापक सचिव व देखरेख करने वाले थे। कह सकता हूं कि आपने पूरी जिंदगी स्कूल के नाम कर रखी थी। अब मुझे मालूम पड़ा कि मुसलिम समुदाय में आधुनिक शिक्षा को बढ़ावा देने के लिए आपने अनेक कुर्बानियां दीं।

कलकत्ता विश्वविद्यालय से ग्रेजुएट होने वाले पहले मुस्लिम युवाओं में आप भी शामिल थे। यूपी के गवर्नर ने इनाम के तौर पर इन युवाओं को बेहतरीन नौकरियों का ऑफर दिया। एक ने सिविल सेवा को चुना और दस बरस में कमिश्नर का दर्जा हासिल कर लिया। दूसरे युवा ने पुलिस विभाग को पसंद किया एवं आईजी तक तरक्की कर पहुंचा। तीसरा कानून व अदालत की तरफ गया व सेशन जज होकर रिटायर हुआ। किंतु नानाजान ने वह विभाग चुना, जो सरकारी नौकरियों में सबसे घटिया माना जाता था। आपने शिक्षा विभाग का चयन किया था। नानाजान इस विभाग में बहुत से पदों पर रहे, लेकिन नौकरी बाकी रहते हुए मर्जी का रिटायरमेंट ले लिया। इसके बाद आपने पेंशन व बाकी संपत्ति से कस्बे में स्कूल कायम किया। नाना के बाद मेरी शख्सियत पर दूसरा अहम प्रभाव अब्बाजान ख्वाजा गुलाम का रहा।

यदि बाबा की जिंदगी देश व समाज सेवा को समर्पित रही तो अब्बा के किरदार से मैंने बचपन ही में इनसानियत-दोस्ती तथा प्रजातंत्र के उसूलों को समझा और सीखा। जिस खानदान तथा जिस माहौल में पैदा हुआ, वहां छोटी-मोटी जिम्मेदारियों पर झूठी तारीफ होती थी। वहां भलमनसाहत-कठोरता, ऊंचा खानदान-नीचा खानदान, जातियों में कट्टरता, ब्याह-शादी में फिजूल खर्च, कब्रपरस्ती, उर्स व कव्वालियां, पीरी-मुरीदी, मजलिस व मातम आम था। यदि मैं शुरू से ही इन चीजों के गलत प्रभावों से बचा रहा, उसमें अब्बा का किरदार अहम था। पांच बरस की उम्र तक मैंने लोकतंत्र का नाम भी नहीं सुना था, ना इनसानी बिरादरी का मामला मुझे किसी ने समझाया था। इतना जरूर याद आ रहा कि हमउम्र मुलाजिम को गलत रूप से संबोधित करने की सजा के तौर पर मुझे घंटों अंधेरे कमरे में बंद रखा गया।

अब्बा को सादगी कट्टरता की हद तक पसंद थी। ना आपको अंग्रेजी फैशन पसंद आए, ना हिन्दुस्तानी टीप-टाप ठीक लगे। अब्बा ने ना बेटियों के लिए आभूषण बनवाए, ना ही बेटों को लंबे अंग्रेजी बाल रखने की आजादी दी। उर्स में जाकर कव्वाली सुनना व सिनेमा को भी खराब मानते थे। चाय पीना व पान खाने के लिए भी बड़ी मनाही थी। आपकी ख्वाहिश रही कि मेरी औलाद सादा व ईमानदार जिंदगी की आदी हों, ताकि बेकार की चीजों से बचते हुए मुस्तकबिल संवार सकें। किसी को पान से होंठ रचाए हुए देखकर गंभीर चेहरा बना लेते, फरमाते- ‘खैरियत तो है? क्या चोट लगी कि मुंह से लहू जारी है?’ चाय को भांग कहते। चाय का शौकीन दोस्त मिलने आता तो कहते- ‘अरे अंदर जाकर कहो एक भंगड आया है, इसके लिए थोड़ी-सी भांग घोल कर भेज दो’। फिर भी अब्बा सभी के मतों का यथोचित सम्मान करते थे। आपने हमें अपनी राय रखने  की आजादी दे रखी थी। वो आखिर में मुस्लिम कांफ्रेंस की ओर झुके, जबकि मैं सेक्युलरिजम का समर्थक था। लेकिन अब्बा ने कभी अपने आदर्श मुझ पर जबरन नहीं डाले। उनका जोर सियासी बहस पर जरूर हुआ करता था। आपके बहुत से दोस्तों ने बार-बार समझाया कि अपने बेटे को क्रांतिकारी तहरीक का साथ देने से रोको, लेकिन एक बार भी आपने मुझसे नहीं कहा कि अब्बास कांग्रेस व सोशलिस्ट पार्टी का साथ छोड़ दे। दरअसल वो इस बात से खुश थे कि उनका बेटा अपने उसूलों पर कायम रहने का हौसला रखता है।

यह तो हमें बचपन से मालूम था कि सभी मां की तरह हमारी अम्मी अपने बच्चों से बेपनाह मुहब्बत करती हैं। वक्त-बेवक्त हम उनकी मुहब्बत का नाजायज फायदा भी उठाया करते, लेकिन उनकी जिंदगी के आखिरी दिनों में मुझे अम्मी के इनसानियत पसंद मजबूत किरदार का एहसास हुआ। सन सैंतालीस में जब देश को बंटवारा देखना पड़ा, अब्बा गुजर चुके थे। मेरी मां व बहनें पानीपत में, जबकि मैं बंबई में था। पश्चिमी पंजाब के पीड़ित हिन्दू-सिख शरणार्थियों के आ जाने के बाद पानीपत में मुसलमानों का रहना ठीक नहीं था। ज्यादातर लोगों के पास पाकिस्तान पलायन का ही विकल्प रह गया था। मेरी मां पर भी दोस्तों व रिश्तेदारों ने दबाव डाला कि वो उनके साथ पाकिस्तान चलें, मुझे भी बंबई से कराची बुलाने के लिए कहा गया। अम्मी ने साफ मना कर दिया कि ‘हम अपना वतन नहीं छोड़ेंगे- मेरे बेटे ने हिन्दुस्तान में रहने का फैसला किया है। इस फैसले में मैं उसके साथ हूं। आपने दंगों के डर से अपना घर-वतन नहीं छोड़ा।

यह फसाद बीस रोज से अधिक कायम रहे, अनेक बार कफ्र्यू लागू हुआ। घर में चटनी-रोटी खाकर गुजारा करना पड़ता और पान- जिसके बिना अम्मी का रहना मुश्किल हो जाता था- वो भी नेमत हो चुका था। पान पत्ते के दस छोटे टुकड़ों पर आप किसी तरह दिन भर गुजारतीं। एक मिलिट्री गाड़ी इन सबको पानीपत से निकाल लाने के लिए दिल्ली से रवाना हुई। रातोंरात मुसलमान औरतों को अपना घर और वतन छोड़ना पड़ा। बीस दिन वो सब दिल्ली में रहे। एक कमरे में तीस आदमियों को रखा गया, इसी बीच खबर आई कि पानीपत में हमारे घर लुट गए। उन हालात में अम्मी हवाई जहाज से मेरे पास बंबई चली आईं। जान बचाने के लिए बुर्का छोड़ना पड़ा आपको।

मैं डरा हुआ था कि बुरे दिनों का अम्मी के दिमाग पर जाने क्या गलत असर पड़ा होगा, मगर पहले लफ्ज जो एयरपोर्ट पर आपसे सुने, वह थे- ‘भई मैं तो अब हमेशा हवाई जहाज में सफर किया करूंगी। बड़े आराम की सवारी है।’ उस रात पानीपत के हालात सुनाते हुए उन्होंने कहा कि ‘ना यह अच्छे, ना वो अच्छे, ना मुसलमानों ने कसर उठा रखी, ना हिन्दुओं और ना ही सिखों ने, सबके सरों पर खून सवार है।’ मगर मुसलमान होने की हैसियत से मैं तो मुसलमानों को ज्यादा इल्जाम दूंगी।
अनुवाद: सैयद एस. तौहीद