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कैराना की हकीकत तनाव का फसाना

उत्तर प्रदेश के कैराना में सियासी घमासान जारी है। इसकी तुलना कश्मीर से की जा रही है। कहा जा रहा है कि यहां से कर्ई हिंदू परिवार विस्थापित होने को मजबूर किए गए हैं। आखिर इन आरोपों में कितनी सच्चाई है? विस्थापित परिवारों का सच क्या है? कैराना की जमीनी हकीकत की पड़ताल करती पुष्पेंद्र शर्मा की रिपोर्ट:

बातें दबी जुबान से की जाती थीं, अचानक ही वे अखबारों की सुर्खियां बन गईं। भारतीय जनता पार्टी के सांसद हुकुम सिंह ने 29 मई को एक प्रेस वार्ता में खुलासा किया कि पश्चिमी उत्तर प्रदेश का अमूमन खबरों से दूर रहने वाला कस्बा कैराना कश्मीर बन रहा है। यहां रहने वाले हिंदू परिवार असुरक्षा के कारण पलायन को मजबूर हैं। इस खुलासे के साथ ही मीडिया और सरकारी खुफिया एजेंसियों ने पड़ताल शुरू कर दी तो पलायन पर सवाल उठने लगे। इसके बाद हुकुम सिंह ने नौ जून को कैराना से पलायन करने वाले 346 परिवारों की सूची जारीकर दी तो यह हल्ला और तेज हो गया। यह वह समय था, जब संगम तट पर भारतीय जनता पार्टी की बड़ी पंचायत होने वाली थी। तब उनके पास उत्तर प्रदेश की समाजवादी सरकार को लानत भेजने के लिए मथुरा का जवाहरबाग कांड तो था ही, अचानक कैराना का एक ज्यादा ज्वलनशील सा दिखने वाला मुद्दा भी हाथ लग गया। इतने बड़े मंच से कैराना की गूंज देशभर में फैल गई। सोते हुए नेता जाग गए।

मशहूर संगीत घराना कैराना घराना की बजाए लोग कैराना का नाम बदनाम कस्बे के रूप में लेने लगे। दिल्ली से लगभग 100 किलोमीटर दूर उत्तर प्रदेश के पश्चिमी छोर पर स्थित यह कस्बा हरियाणा को छूता है। कृषि आधारित अर्थव्यवस्था वाले इस कस्बे और आसपास के इलाके में सांप्रदायिक सद्भाव का आलम यह था कि वहां चुनाव के समय वोट हिंदू-मुस्लिम के आधार पर नहीं गिने जाते, मुस्लिम गुर्जर भी गुर्जर वोटों के रूप में गिने जाते रहे हैं। ज्यादा हुआ तो एक शब्द प्रयोग होता था रांगड़। रांगड़ असल में हिंदू धर्म से परिवर्तित वो मुस्लिम हैं, जिन्हें मुसलमानों ने पहली पंक्ति का स्वधर्मी कभी नहीं माना। पलायन की पड़ताल हिन्दुस्तान की टीम ने भी की तो पाया कि ताले तो लटके हैं और कहीं-कहीं यह भी लिखा है कि मकान बिकाऊ  है। पर गहराई से पड़ताल की तो कारण कई निकले। कुछ लोग कारोबारी कारण से तो कुछ सामाजिक या शिक्षा जैसे कारणों से कैराना छोड़ गए हैं। यदि सपा के शासनकाल को कालखंड मानें तो पलायन एक फसाना जैसा है, हकीकत से दूर। हां, अगर हम दो दशकों की बात करें तो कैराना से पलायन कड़वी हकीकत है।

इसकी सच्चाई जानने के लिए कुछ और तथ्यों को समझना जरूरी है। कैराना एक मुस्लिम बाहुल्य कस्बा है। 2011 की जनसंख्या गणना के अनुसार यहां मुस्लिमों की आबादी 53 प्रतिशत थी, जबकि 2001 में यह उलट थी। तब हिंदू 52 प्रतिशत और मुस्लिम 48 प्रतिशत थे। पर यह कहानी अकेले कैराना की नहीं है। पश्चिमी उत्तर प्रदेश में कई ऐसे कस्बे और शहर हैं, जहां जनसंख्या का आंकड़ा ऐसे ही बदला है। भारतीय किसान यूनियन से जुड़े चौधरी वीरेंद्र सिंह ने बताया कि मुजफ्फरनगर के मीरापुर कस्बे में भी नौ परिवारों ने पलायन किया है। कवाल कांड के बाद बहू-बेटी सम्मान बचाओ रैली के आयोजन से चर्चा में आए वीरेंद्र सिंह कहते हैं कि पश्चिमी उत्तर प्रदेश के सभी मुख्य मार्गों पर मस्जिदें और मदरसे बन गए हैं। वहीं सरकारी पड़ताल हुकुम सिंह के बैरभाव के आरोपों को झुठलाती है, पर खराब कानून-व्यवस्था और तरक्की के अवसर न होने की बात उजागर करती है।

शामली के 2011 में जिला बनने के पहले भी वहां सात थाने थे। आज भी वहां सात ही थाने हैं। यह दीगर बात है कि जहां सीओ बैठते थे, वहां अब पुलिस अधीक्षक बैठते हैं। कैराना कोतवाली कस्बे में एकमात्र थाना है, जबकि आबादी कितनी बढ़ गई है। फास्ट ट्रैक कोर्ट की स्थापना  के समय राजनीतिक इच्छाशक्ति के चलते मुजफ्फरनगर को मिली पांच अदालतों में से दो यहां स्थापित हुईं। एडीजे कोर्ट की स्थापना के प्रस्ताव को हाईकोर्ट ने यह कह कर ठुकरा दिया कि वहां मूलभूत ढांचा नहीं है। बाद में क्षेत्र के एक निवासी जब सुप्रीम कोर्ट के जज बने तो उनके प्रयास से एडीजे कोर्ट बनी। इस व्यवस्था और संसाधनों से कानून व्यवस्था की बेहतरी की उम्मीद कैसे कर सकते हैं? वो भी वहां, जहां आतंकियों  के शरण लेने, हथियारों की तस्करी की खबरें आम हों। इस कस्बे में कानून व्यवस्था की स्थिति कितनी खराब है, इसके कई उदाहरण हैं।

जैसे इलाके में मुकीम काला जैसे गैंग पर काबू न पाना, 2014 में तीन कारोबारियों की हत्या और राजनीतिक दबाव में पुलिस कप्तान का तबादला। सरकारी पड़ताल के साथ ही हिन्दुस्तान की पड़ताल में भी कुछ लोग मिले, जिन्होंने स्वीकारा कि माहौल खराब होने से ही उन्होंने घर छोड़ा। कुछ रिपोट्र्स में यह बात भी सामने आई कि घर छोड़ कर जाने वालों में हिंदू ही नहीं, मुस्लिम परिवार भी हैं। भारतीय जनता पार्टी ने जो फेहरिस्त जारी की थी, उस पर अब हर तरफ से सवाल उठने लगे हैं। इसमें कई नाम ऐसे हैं, जो अब इस दुनिया में नहीं हैं। कुछ लोगों ने कहा कि बच्चों के लिए अच्छी शिक्षा उपलब्ध न होने या कारोबार के अच्छे अवसर न मिलने से वे कस्बे को छोड़ गए। खुद हुकुम सिंह ने अब अपने बयान के तेवर बदल दिए हैं। अब वे कह रहे हैं कि यहां कानून-व्यवस्था की स्थिति बहुत खराब है।

कारण कोई भी हो, सच यही है कि यहां से कुछ लोग पलायन कर रहे हैं। यह सच यहां लगातार गिर रही जमीन की कीमतों में भी देखा जा सकता है। कुछ लोग इस पलायन को सांप्रदायिक रंग दे रहे हैं, क्योंकि चुनाव के लिए यह फायदे की रणनीति है। उत्तर प्रदेश में चुनाव करीब हैं। राजनीति के मुजफ्फरनगर मॉड्यूल के वोट आसानी से झोली भरते हैं। मुजफ्फरनगर मॉड्यूल वह है, जिसने दंगों के वाद वोटरों को हिंदू मुसलमान में साफ-साफ बांट दिया। एक दूसरा मॉड्यूल है कैराना का।  

‘पहले भी उठा चुका हूं मुद्दा ’
कैराना से भारतीय जनता पार्टी के सांसद हुकुम सिंह ने ही सबसे पहले कैराना से हिंदुओं के पलायन का मुद्दा उठाया था। उन्होंने इसे कश्मीर में पंडितों के विस्थापन जैसा कहा था। इस पूरे मुद्दे पर उन्होंने हमसे खास बातचीत की:

- यह सब आपकी नजर में कब आया?
कैराना ऐसा शहर है, जहां पिछले कुछ दशकों में जनसंख्या अनुपात में काफी परिवर्तन आया है। अब यहां मुस्लिम आबादी अधिक है। कई लोग मुझे आकर कानून व्यवस्था से जुड़ी शिकायतें कर रहे थे। उनका कहना था कि स्थानीय गैंग उन्हें डराते-धमकाते हैं। अपराधियों ने कई लोगों की हत्या भी की है। पुलिस इस विषय में उनकी बात नहीं सुन रही। इसी से तंग होकर कई लोगों ने यह स्थान छोड़ दिया। पिछले तीन सालों में लोग तेजी से यहां से निकल गए हैं।

- आपने 346 परिवारों की सूची जारी की। पर विरोधी कह रहे हैं कि आपने ऐसे परिवारों के बारे में नहीं बताया, जो मुस्लिम थे और यहां से चले गए।
मेरी पार्टी के कार्यकर्ताओं ने घर-घर जाकर यह लिस्ट तैयार की है। मुझे यह भी पता चला कि स्थानीय निवासी नौशाद के परिवार ने यह स्थान छोड़ा, क्योंकि उनसे 10 लाख रुपए की मांग की जा रही थी। अगर उनकी तरह और मुस्लिम परिवार हैं तो मैं उनका नाम लिस्ट में जोड़ने को तैयार हूं।

- आरोप है कि आपने यह मुद्दा 2017 के चुनावों के कारण उठाया है।
वे अपने तरीके से सोचते हैं। मैं राजनीति में 40 साल से हूं। सात बार सांसद बन चुका हूं। 12 साल तक मंत्री रहा हूं। जो लोग ऐसा कह रहे हैं, वे ये नहीं जानते कि मैंने ये मुद्दा साल 2013 में भी उठाया था।

- आपके द्वारा दी गई सूची की सत्यता पर प्रश्न उठाए जा रहे हैं।
इसकी सत्यता पर सरकार के आदेशानुसार काम हो रहा है। सरकारी अधिकारी घर-घर जाकर जांच कर रहे हैं। वे सरकारी कर्मचारी हैं और हो सकता है कि उनके परिणाम राज्य सरकार के दबाव में आएं, पर मैं आज भी अपनी लिस्ट पर कायम हूं। 


पिछले दो साल में संपत्ति के भाव गिरे हैं। जो तनाव बना हुआ है, उसे रोकने के लिए पुलिस प्रशासन हो या कस्बा वासी, सभी को पहल करनी चाहिए। 
बीर सैन पंवार, पूर्व अध्यक्ष, बार एसोसिएशन कैराना


यहां के हिन्दू-मुस्लिम सब भाईचारे से रह रहे हैं। कैराना में कभी भी कोई सांप्रदायिक झगड़ा नहीं हुआ। यह पूरे देश में एक मिसाल है। 
सालिम अंसारी, नगर अध्यक्ष, समाजवादी पार्टी

2014 के बाद लोगों में दहशत का माहौल था। जिस सम्पत्ति की कीमत 2013 में एक करोड़ रुपये थी, आज 50 लाख रुपये में भी खरीदार नहीं मिलता।
राशिद खान, अधिवक्ता

हमारे गांव पंजीठ का कस्तूरबा गांधी विद्यालय अब गुंडा तत्वों के आतंक के कारण बंद करवा दिया गया है। इन तत्वों पर लगाम कसनी चाहिए।
पहल सिंह सैनी, ग्रामीण

कब क्या हुआ
29 मई:  हुकुम सिंह ने प्रेसवार्ता की। कैराना बन रहा कश्मीर, यह आरोप लगाया।
09 जून:  सूची जारी की। 346 परिवारों के पलायन का दावा किया।
120 परिवारों का प्रशासन ने सत्यापन किया
09 लोग जो सूची में शामिल थे, मृत पाए गए
06 परिवार जो सूची में थे, वहां रहते मिले
01 व्यक्ति ने भी मुस्लिमों से धमकी की बात नहीं कही

Hindustan times
 

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  • Web Title:realtiy of kairana