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अपनी यादों को खो चुके लोग

अब उन्हें कुछ याद नहीं रहता— कभी-कभी तो अपना नाम भी। देश में डिमेंशिया से पीडि़त बुजुर्गों की संख्या तेजी से बढ़ रही है। सही जानकारी न होना और आरंभिक लक्षणों को नजरअंदाज करना इसके बढ़ने के प्रमुख कारण हैं। पेश है एक रिपोर्ट

वे डमेंशिया से पीडि़त हैं। यानी ऐसी अवस्था, जिसमें लोग असामाजिक, गुमराह और भूल जाने की समस्या से ग्रस्त हो जाते हैं। दिल्ली में गुरु विश्राम वृद्ध आश्रम के संस्थापक व संचालक डॉक्टर जीपी भगत कहते हैं, 'वे हमें सात साल पहले पटरी पर गिरे मिले थे। उनके दाएं हाथ में जख्म था और उसमें कीड़े लग गए थे। हम उन्हें यहां लाए और उनका इलाज किया।' भगत बताते हैं कि उनके आश्रम में रहने वाले करीब 100 लोगों में से अधिकतर डिमेंशिया से पीडि़त हैं और उन्हें अपने घर तक की याद नहीं है।

अल्जाइमर एंड रिलेटिड डिसॉर्डर्स सोसाइटी ऑफ इंडिया के अनुसार, हमारे देश में 60 साल से अधिक उम्र के 41 लाख लोग डिमेंशिया से पीडि़त हैं। वहीं हर 16 में से एक परिवार इस तरह के पीडि़त व्यक्ति की देखभाल में जुटा है।  इंस्टीट्यूट ऑफ ह्यूमन बिहेवियर एंड एलाइड साइंसेज (आईएचबीएएस) के वरिष्ठ मनोचिकित्सक डॉ. निमेश देसाई कहते हैं, 'हमारे देश में तेजी से बदलाव हो रहे हैं। जहां एक ओर परंपरागत पारिवारिक सहयोग खत्म हो रहा है, वहीं दूसरी ओर हमारे पास ऐसे स्थानों की भी बेहद कमी है, जहां वरिष्ठ लोगों की अच्छे से देखभाल और उनकी सुरक्षा व्यवस्था का इंतजाम हो।' वे कहते हैं, 'चूंकि ज्यादातर लोग ऐसे हैं, जो बुजुर्गों की देखभाल के लिए किसी को नियुक्त नहीं कर सकते हैं। वे ऐसे बुजुर्गों का परित्याग कर रहे हैं, जो अल्जाइमर जैसी बीमारी से ग्रसित हैं।'

मुंबई के कल्याण में स्थित मानव न्यूरो साइकेट्रिक हॉस्पिटल के निदेशक और न्यूरो मनोचिकित्सक डॉ. संदीप जाधव कहते हैं, 'डिमेंशिया का पहला लक्षण है याददाश्त में समस्या आना। पर अक्सर इन समस्याओं को बढ़ती उम्र से जोड़कर नजरअंदाज कर दिया जाता है।' वे कहते हैं, 'अगर कोई व्यक्ति हाल ही में घटी किसी घटना के बारे में भूल जाए या ऐसे काम भूलने लगे, जो उसके प्रतिदिन के कार्यों या जीवनयापन के लिए आवश्यक हैं, तो उसे डॉक्टर के पास ले जाएं। ऐसे में डिमेंशिया का चेकअप कराना आवश्यक है।'

डॉक्टर्स यह भी कहते हैं कि डिमेंशिया के मरीजों को कभी बंद करके नहीं रखना चाहिए। ऐसा करने से उनकी बीमारी कई गुना तेजी से बढ़ती जाती है। देसाई कहते हैं, 'ऐसे लोगों को घर के बाहर और पड़ोस में जाने के लिए प्रोत्साहित किया जाना चाहिए। ऐसे स्थान पर उन्हें ले जाएं, जहां लोग उन्हें पहचानते हों। वे जितना ज्यादा लोगों से बात करेंगे, उनके लिए उतना ही बेहतर होगा। इस तरह के मरीजों के लिए प्राकृतिक रोशनी में रहना काफी महत्वपूर्ण होता है।'
मैक्स हेल्थकेयर में मेंटल एंड बिहेवियरल साइंसेज के निदेशक डॉ. समीर मल्होत्रा कहते हैं कि पहचान वाले ब्रेसलेट और रिस्टबैंड से भी ऐसे लोगों को मदद मिलती हैं। वे कहते हैं, 'ऐसे रिस्टबैंड, जिन पर उनका नाम और फोन नंबर लिखा हो या फिर ऐसा कोई कंगन या ब्रेसलेट भी इस सूचना के साथ आप उन्हें पहना सकते हैं। इसके अलावा इन सूचनाओं वाले कपड़े भी पहनाने फायदेमंद रहते हैं।'

डॉक्टर्स यह भी कहते हैं कि इस तरह के मरीजों को आपको मानसिक तौर पर व्यस्त रखने के लिए खेलों और एक्टिविटीज की मदद लेनी चाहिए। मल्होत्रा कहते हैं, 'इस बीमारी के असर को कम करना मुश्किल है, पर मस्तिष्क को व्यस्त रखकर काफी फायदा मिलता है। खेल जैसे सुडोकू, उलटी गिनती, स्किप काउंटिंग, घटाना या जोड़ना, कार्ड खेलने से मरीज की एकाग्रता बढ़ती है।'

लक्षण
'     याददाश्त खो जाना। कुछ खास बातों या हाल की घटनाओं तक को याद न कर पाना।
'     सही शब्द बोलने में दिक्कत आना या बातचीत करने में दिक्कत होना।
'     योजना बनाने और संचालन में परेशानी आना।
'     समन्वयन में परेशानी।
'     पारिवारिक स्थानों में भटक जाना।
'     सामाजिक कार्यक्रमों में हिस्सा लेने से मना करना।
'     तर्क करने की क्षमता में कमी आना।

उपचार
डिमेंशिया / अल्जाइमर
'     यदि दिमाग को व्यस्त रखा जाए तो इस बीमारी का असर कम होता है। इसके लिए सुडोकू, उलटी गिनती, जोड़ना-घटाना जैसे मानसिक कार्य मदद करते हैं।
'     प्रतिदिन व्यायाम करें, जिससे मस्तिष्क स्वस्थ रहे। तनाव कम हो।
'     ऐसा माहौल हो, जिससे भटकाव कम हो और वे अधिक सचेत रहें।

डिमेंशिया से पीड़ित कुछ नामचीन
मार्गरेट थैचर

ब्रिटेन की पहली महिला प्रधानमंत्री मार्गरेट थैचर देश-दुनिया में लौह महिला के रूप में जानी जाती थीं। वह साल 1979 से 1990 तक ब्रिटेन की प्रधानमंत्री रहीं। उनका जन्म 13 अक्तूबर, 1925 को हुआ था। उनमें इस रोग के लक्षण पहली बार तब दिखे, जब वह 75 वर्ष की थीं। उस वक्त उन्हें हल्के-हल्के मस्तिष्क-आघात आते थे, जिस कारण उनकी याददाश्त कम होने लगी थी। इसका खुलासा उनकी बेटी ने साल 2005 में किया था। साल 2013 में थैचर की मृत्यु 87 वर्ष की उम्र में हो गई।

रीटा हेवर्थ
रीटा हेवर्थ अमेरिका की चर्चित अभिनेत्री और डांसर थीं। उनकी मृत्यु की वजह अल्जाइमर ही थी। उस समय अधिकतर लोग अल्जाइमर से अंजान थे। लव गॉडेस यानी प्यार की देवी के रूप में पुकारी जाने वाली इस अदाकारा का जन्म 17 अक्तूबर, 1918 को हुआ था। साल 1980 में उनकी बीमारी का पता चला। 14 मई, 1987 को जब इनकी मृत्यु हुई, तब अमेरिका के राष्ट्रपति रीगन ही थे। अपने शोक संदेश में उन्होंने कहा था कि अल्जाइमर से लड़ने वाली यौद्धा के रूप में रीटा हमेशा याद रखी जाएंगी।

खाना खाना भी भूल गईं
मुंबई में रहने वाली शिल्पा चंदावरकर ने सर्च इंजन गूगल की मदद से समझा कि उनकी सास मीरा डिमेंशिया से पीडि़त हैं। 45 साल की शिल्पा कहती हैं, 'मेरी सास समय देखना, नोटों की समझ और यहां तक कि शब्दों का उच्चारण तक भूल गई थीं।' इसकी शुरुआत वे चार साल पहले बताती हैं, जब वे अपनी घड़ी को फ्रिज में रखकर भूल गई थीं। वे कहती हैं, 'उस समय हम न्यूरोलॉजिस्ट के पास गए। उसने बताया कि याददाश्त संबंधी ये समस्याएं उम्र के कारण हैं। जब यह समस्या बनी रही तो हम उन्हें दूसरे डॉक्टर के पास ले गए। उसने भी वही बात दोहराई। अंतत: तीसरे डॉक्टर ने एमआरआई कराया और कहा कि इनके ब्रेन सेल्स सिकुड़ रहे हैं। पर किसी ने भी हमें यह नहीं समझाया कि यह सब इस बीमारी के कारण है।' इसके बाद उन्होंने स्वयंसेवी संस्था सिल्वर इनिंग्स फाउंडेशन से संपर्क किया। उन्होंने शिल्पा को बताया कि यह जीवन भर बनी रहने वाली समस्या है। फिर शिल्पा पूरा समय सास की देखभाल करती रहीं। पर पिछले साल मीरा खुद भोजन करना भी भूल गईं। उस समय उनके परिवार ने उन्हें स्नेहांजलि में भर्ती कराया, जो मुंबई के नालासोपारा में ऐसे लोगों की देखभाल करने वाली संस्था है।

15 अक्तूबर से गायब हैं
दत्त पिछले साल 15 अक्तूबर को बिना पर्स और सेलफोन लिए घर से निकले थे और आज तक वापस नहीं लौटे हैं। दो साल पहले, उन्हें अल्जाइमर से पीडि़त पाया गया था। हालांकि इसके लक्षण एक दशक पहले उनके रिटारयरमेंट के बाद ही दिखने लगे थे। वे चीजें भूलने लगे थे। दत्त के पुत्र वैभव बताते हैं, 'हम उन्हें तीन डॉक्टरों के पास ले गए। सभी ने इसे उम्र से संबंधित समस्या बताया। अंत में हमें एक न्यूरोलॉजिस्ट ने बताया कि वे अल्जाइमर से पीडि़त हैं।'  इसके बाद दत्त की पत्नी उनका ध्यान रख रही थीं। अब चार माह से परिवार उन्हें हर जगह तलाश कर रहा है। मंदिर, अस्पताल, रैनबसेरों और यहां तक कि मुर्दाघरों में भी। पुलिस में भी रिपोर्ट दर्ज करा दी गई है।

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