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जब बिना इंजेक्शन के टांके लगे

मुझे भिवानी में बॉक्सिंग सीखने की इजाजत मिल गई, पर सबसे बड़ी परेशानी यह थी कि वहां तक पहुंचा कैसे जाए? स्कूल से बॉक्सिंग सेंटर की दूरी करीब तीन किलोमीटर थी। कभी-कभार बस या वैन मिल जाती थी। कभी कोई लिफ्ट दे देता था। जब कुछ नहीं मिलता, तो पैदल ही चल देते थे। मैंने जिद करके एक साइकिल खरीदवाई। उन दिनों ‘रेंजर’ साइकिल आती थी। मुझे अपने लिए खरीदी गई चीजों की कीमत हमेशा याद रहती है। उस वक्त वह साइकिल 3,800 रुपये की थी। उसके बाद तो हम साइकिल से ही स्कूल जाने लगे, स्कूल के बाद सीधा ट्रेनिंग करने चले जाते। कभी-कभी स्कूल से ‘बंक’ भी मारा करते थे। बॉक्सिंग का शौक पूरा करने में मेरे भाई ने मेरी बड़ी मदद की। उस समय तो हमें यह तक नहीं पता था कि बॉक्सिंग करने के लिए ‘इन्फ्रास्ट्रक्चर’ कैसा होना चाहिए? एसी कमरे क्या होते हैं? मेडिकल रूम क्या होता है? फीजियो क्या होता है? उस समय तो हम मारते थे और हमें मार पड़ती थी। कोच साहब बता देते थे कि यह ‘फाइट’ है तुम्हारी, 10 राउंड की है, छह राउंड की है या चार राउंड की है। बस उसको लड़ना होता था। कभी होंठ कटते, तो कभी गाल। ध्यान सिर्फ एक बात पर रहता था कि रिंग में सामने कौन है और उससे कैसे ‘फाइट’ करनी है।

एक बार मेरी बाईं आंख के पास चोट लग गई। तीन टांके लगे। घर पहुंचा, तो मां बिल्कुल घबरा गईं। उन्होंने खूब गुस्सा किया। कहने लगीं कि जो आंख फूट जाती, तो क्या होता? तुझे नौकरी कौन देता? कौन तुझसे शादी करती? मैं उनको समझाता रहा कि बॉक्सिंग में ऐसा होता रहता है। मैं मां को समझा तो रहा था, मगर सच्चाई यह है कि मुझे जबर्दस्त दर्द हो रहा था। टांके लगाने से पहले आंख के आस-पास की जगह को ‘सुन्न’ करने के लिए जो ‘एनेस्थीसिया’ दिया जाना चाहिए था, मुझे वह नहीं दिया गया था, क्योंकि मेरे टांके सरकारी अस्पताल में लगे थे। जो नर्स मेरे इलाज के लिए आईं, उन्हें लगा कि मुझे ये चोट कहीं मार-पीट करने में लगी है। मुझसे गुस्से में पूछने लगीं कि कहां लड़ाई-झगड़ा करके आए हो? मैंने उनको बताया कि मैंने मारपीट नहीं की, बल्कि ये चोट बॉक्सिंग में लगी है। तब जाकर उनका गुस्सा कुछ कम हुआ। उस वक्त वहां ‘एनेस्थीसिया’ का ‘इंजेक्शन’ नहीं था। उन्होंने कहा कि अगर यहां टांके लगवाने हैं, तो ऐसे ही लगवाने पड़ेंगे या किसी प्राइवेट अस्पताल में जाओ।

उन्होंने यह भी बताया कि बिना इंजेक्शन के टांके लगवाने में दर्द बहुत होगा। मैंने कहा- सिस्टर, आप मुझे सिर्फ अपना हाथ पकड़ा दीजिए, मैं बिना किसी इंजेक्शन के ही टांके लगवा लूंगा। नर्स ने बताया कि पांच टांके लगेंगे, हालांकि जब उन्होंने टांके लगाने शुरू किए, तो तीन में ही काम चल गया। दर्द जमकर हो रहा था, लेकिन मुझे मां को समझाना भी था। आज भी उन टांकों के निशान मौजूद हैं। जब कभी किसी ‘डॉक्यूमेंट’ के लिए अपने शरीर के किसी ‘मार्क’ को बताना होता है, मैं उसी को लिखता हूं। मैं बॉक्सिंग के लिए आज पूरी दुनिया देख चुका हूं, पर आज भी मुझे स्कूल स्टेट चैंपियनशिप के लिए यमुनानगर जाने का पहला वाकया याद आता है। साल 1997-98 की बात है। तब मुझे बॉक्सिंग के नियम-कानून पूरी तरह नहीं मालूम थे। कितने राउंड होते हैं? क्या कैसे होता है? मुझे नहीं पता था कि इस खेल में ‘स्टेप बाई स्टेप’ जीतना होता है। ऐम्च्योर में पहली फाइट, दूसरी-तीसरी-चौथी फाइट जैसा फॉर्मेट होता है। मेरे साथ गए कई बॉक्सर की फाइट पहले आ गई थी। मैं सिर्फ यही सोचता रहता या फिर मुझे बस इस बात का ‘एक्साइटमेंट’ रहता कि जल्दी से ‘फाइट’ शुरू हो, मैं लड़ूं और वापस जाऊं।

खैर, मेरा नंबर तीसरे दिन आया और मैं पहली ही ‘फाइट’ में हार गया। तब पहली बार मैं भिवानी से बाहर बॉक्सिंग करने गया था। पहली बार अपने गांव से बाहर निकला था। इसके बाद  मैं आठवीं में था, तब 1999 के नेशनल चैंपियनशिप के लिए दुर्गापुर (पश्चिम बंगाल) गया था। इस तरह बॉक्सिंग के लिए मैं भिवानी से बाहर निकलने लगा। जीत और हार का सिलसिला चलने लगा। इसी दौरान, धीरे-धीरे वह वक्त भी आ गया, जब मैंने तय कर लिया कि मुझे बॉक्सिंग में ही अपना करियर बनाना है। अगले साल 2000 में नेशनल गेम्स में मुझे पहला गोल्ड मेडल मिला। 2003 में मैं ऑल इंडिया यूथ चैंपियन बना। उसी साल हैदराबाद में एफ्रो एशियम गेम्स होने थे। मैंने ट्रायल्स में हिस्सा लिया, और मेरा सेलेक्शन हो गया। मैंने वहां सिल्वर मेडल जीता। इसके बाद आगे बढ़ता चला गया। अब ओलंपिक खेलने का सपना था, जो  2004 में पूरा हुआ। मुझे एथेंस ओलंपिक में भारतीय दल का हिस्सा बनने का मौका मिला।
(जारी...)

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