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थोड़ा और अक्खड़ होना चाहता हूं

एक फिल्मकार के तौर पर हजारों ख्वाहिशें ऐसी मेरी अहम फिल्मों में गिनी जाती है। वह मेरे लिए ‘पर्सनल’ फिल्म की तरह है। दिलचस्प बात यह है कि हजारों ख्वाहिशें ऐसी का काम मैंने कलकत्ता मेल के शूट के दौरान ही पूरा कर लिया था। उस फिल्म को रिलीज बाद में किया। हजारों ख्वाहिशें ऐसी 2003 में ही तैयार हो गई थी, लेकिन हम लोगों ने उसे 2005 में रिलीज किया था। मैं जब अपनी जिंदगी के बारे में यह कहा करता हूं कि मैं बहुत सोच-समझकर कोई काम नहीं करता, तो हजारों ख्वाहिशें ऐसी इस बात का सबसे बड़ा सबूत है। मैं ‘कांशस्ली’ फिल्म नहीं बनाता। फिल्म का ‘टाइटिल’ मिर्जा गालिब के शेर से लिया था। फिल्म ‘इमरजेंसी’ के वक्त तीन युवाओं की कहानी थी, जब देश में तेजी से बहुत कुछ बदल रहा था। केके, शाइनी आहूजा और चित्रांगदा सिंह तीनों को इस फिल्म से अलग पहचान मिली। फिल्म का संगीत लोगों को बहुत पसंद आया। स्वानंद किरकिरे ने ज्यादातर गीत लिखे थे। शुभा मुद्गल की आवाज थी। फिल्म के सारे पहलू एक-दूसरे को ‘कॉम्पलीमेंट’ कर रहे थे। हालांकि ऐसा कुछ भी नहीं था कि हजारों ख्वाहिशें ऐसी में मैंने कुछ बहुत सोच-समझकर किया हो। वह मेरी जिंदगी का एक दौर था। सुधांशु और रेणु के जाने के बाद मैं बहुत गुस्से में था। उस समय मुझे इस बात की बिल्कुल परवाह नहीं थी कि इस फिल्म को लेकर लोग क्या कहेंगे? खैर, फिल्म लोगों को बहुत पसंद आई। हालांकि शाइनी को बेस्ट डेब्यू एक्टर के लिए मिले फिल्मफेयर को छोड़ दें, तो इसे कोई अवॉर्ड नहीं मिला।

बाद में मुझे बताया गया कि उस वक्त सरकार की तरफ से यह आदेश था कि हजारों ख्वाहिशें ऐसी  को किसी भी नेशनल अवॉर्ड के लिए ‘कंसीडर’ नहीं किया जाना चाहिए। उस वक्त नई दिल्ली में जो सरकार थी, शायद कहानी का प्लॉट उसकी पसंद का नहीं था। वैसे, इस बात से मुझे कोई फर्क नहीं पड़ता। जरा सोचकर देखिए कि जाने भी दो यारो  को कोई बड़ा अवॉर्ड नहीं मिला था, क्या इससे कोई फर्क पड़ता है? अच्छा सिनेमा अपने वक्त को दिखाता है। वही सिनेमा असली दर्शकों को पसंद आता है। जाने भी दो यारो  आज भी हिंदी फिल्म इंडस्ट्री में एक ‘रेफरेन्स’ फिल्म की तरह देखी जाती है। मुझे याद है कि हजारों ख्वाहिशें ऐसी  वाले साल जो फिल्में ऑस्कर के लिए भेजी गई थीं, उनसे कई गुना बेहतर थी वह फिल्म। दरअसल, सब कुछ इस बात से तय होता है कि ज्यूरी में कौन है? अगर आजाद ख्याल लोग होते हैं, तो वे सही फैसला करते हैं, वरना सब कुछ निरर्थक है। फिर तो किसी भी फिल्म को कहीं भी भेज दीजिए। सोचकर देखिए, हजारों ख्वाहिशें ऐसी  सिर्फ छह महीने के भीतर 10 से ज्यादा बड़े फिल्म-महोत्सवों में भेजी गई थी, लेकिन उसे हमारे यहां वैसी पहचान नहीं मिली।

मैं आज भी इन बातों से बेपरवाह होकर फिल्में बनाता हूं। अभी मेहरुन्निसा और दासदेव पर काम चल रहा है। मेहरुन्निसा की कहानी बहुत अच्छी है, हालांकि यह फिलहाल रुकी हुई है। इसमें अमिताभ बच्चन और ऋषि कपूर हैं। देखते हैं कि यह फिल्म कब तक बनती है, लेकिन इसे मैं बनाऊंगा जरूर। दासदेव तैयार है। देखते हैं कि इन दोनों फिल्मों में से पहले कौन-सी रिलीज होती है।
दासदेव देवदास की ‘रिवर्स जर्नी’ है। पात्र वही हैं, बस फर्क यह है कि यह फिल्म देव के दास बनने की नहीं, बल्कि दास के देव बनने का सफर है। मेरी फिल्म का किरदार सब कुछ खोने वाला नहीं है। दरअसल, यह एक ‘पॉलिटिकल’ दुश्मनी की कहानी है। इसमें पारो का परिवार भी छोटे-मोटे राजनीतिक बैकग्राउंड से है। आज के मौजूदा माहौल में यह कहानी चंद्रमुखी की है। फिल्म में अदिति राव हैदरी, ऋचा चड्ढा, राहुल भट्ट, सौरभ शुक्ल और अनुराग खोटे हैं।

इस जिंदगी का सच यह है कि तमाम अच्छी और बड़ी फिल्में बनाने के बाद भी हर फिल्म एक चुनौती होती है। अगर आप आजाद ख्याल की फिल्में बनाना चाहते हैं, तो परेशानियां और भी ज्यादा हैं। पैसों की कमी, स्टार कास्ट से लेकर फिल्म के रिलीज होने तक सब कुछ एक बड़ी चुनौती की तरह है। वह चुनौती आज भी मेरे सामने है। हां, यह अलग बात है कि इन सारी बातों से मुझे कोई फर्क नहीं पड़ता है। अलबत्ता, इस बात का अफसोस होता है कि मैंने फिल्मों में अपनी काबिलीयत का पूरा इस्तेमाल नहीं किया। मुझे ऐसी फिल्मों के लिए और लड़ाई लड़नी चाहिए थी। मुझे और मेहनत करनी चाहिए थी। मेरे अंदर जो फिल्मकार है, वह अभी पूरी तरह बाहर नहीं आया है। मैं अपनी कहानियों के जरिये उस फिल्मकार को बाहर निकालना चाहता हूं। थोड़ा और अक्खड़ होना चाहता हूं। थोड़ा और लड़ना चाहता हूं। मुझे अपने भाई सुधांशु और पत्नी रेणु को भी जवाब देना है।


 

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