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मेरे करियर की मां है कोलकाता

नौ साल की उम्र तक मेरी जिंदगी सही पटरी पर चल रही थी। नाचना-गाना और पतंगें उड़ाना। घुंघरुओं में ही मेरा जीवन बस चुका था। यह उस दौर की बात है, जब नाचने-गाने वालों को अच्छी निगाहों से नहीं देखा जाता था। मुझे याद है कि उन दिनों लोग कहते थे कि लड़के को नचनिया बनाओगे? मेरे लिए राहत की बात यह थी कि घर में दरबार के ही लोग थे। रामपुर, लखनऊ के नवाबों के यहां से जुड़े हुए कलाकार थे। हमारे बाबा भी दरबार के नर्तक ही थे। इसलिए मेरे कथक से जुड़ने को लेकर कोई ऐसी सामाजिक अड़चन नहीं थी। बाद में जब थोड़े और बड़े हुए, तो पता चला कि लोग अपने बच्चों से कहते हैं कि गाने-बजाने वालों के यहां मत बैठो- खराब हो जाओगे। उनको यह लगता था कि गाने-बजाने वालों के यहां अच्छे लोग नहीं होते। यह अलग बात है कि हमारे यहां की तालीम में हमेशा गुरु के लिए अदब-लिहाज जैसी बातें खूब सिखाई गईं। मैं तो कहता था कि भगवान कृष्ण भी तो पुरुष थे। भगवान शंकर भी तो पुरुष थे। नर्तक तो सभी हैं। ऐसे में, शुरुआती स्तर पर कथक सीखने को लेकर ऐसी कोई मारामारी मुझे नहीं करनी पड़ी। मेरी साधना शुरू हो चुकी थी।

फिर जीवन के संघर्ष की शुरुआत का वक्त भी आ गया। करीब नौ साल का था, जब पिताजी का निधन हो गया। अचानक मुसीबतों का पहाड़ टूट पड़ा। कुछ समझ में ही नहीं आया कि अब जीवन आगे कैसे बढ़ेगा? गर्दिश के दिन शुरू हुए। पैसे-रुपये से लेकर हर तरह की परेशानियां सामने आईं। ऐसे मुश्किल वक्त में अम्मा ने हिम्मत दिखाई। अम्मा मुझे यहां-वहां लेकर जाती थीं, कभी बांस बरेली, तो कभी जयपुर। हम लोग नेपाल तक गए। तब नेपाल जाने में तीन दिन का पैदल सफर करना होता था, लेकिन उन्होंने हार नहीं मानी, मुझे साथ ले गईं। उस वक्त बस यही लगता था कि हमारा नृत्य देखकर राजा साहब खुश हो जाएं। कहीं से पचास रुपये भी मिल जाएं, तो बहुत है। उस पैसे से कुछ दिनों तक खाना-पीना तो चलेगा ही। फिर हम लोग कानपुर गए। कानपुर में हमारी बड़ी बहन थीं। मैं वहां अपने जीजाजी के साथ करीब साढ़े चार साल तक रहा। 11-12 साल की उम्र में ही मैंने दो ट्यूशन भी किए। उस उम्र में क्या ट्यूशन किया होगा, लेकिन काम की शुरुआत हो गई।

इसके बाद कपिला वात्स्यायन लखनऊ  गईं, तो उन्होंने अम्मा से पूछा कि बेटा कुछ करता है क्या? कपिला जी हमारे पिताजी की शार्गिद थीं, वह हमको अपने साथ ले आईं। उनका गीत-संगीत से गहरा लगाव रहा है। मेरी जिंदगी के सफर में उनकी बड़ी अहमियत है। कला और संगीत के क्षेत्र में उन्होंने बहुत काम किया है, उन्होंने देश में न जाने कितने संगीत संस्थानों की नींव रखने में सहयोग दिया। बाद में उन्हें संगीत कला अकादमी, ललित कला अकादमी से फेलोशिप भी मिली थी। उन्हें पद्म विभूषण भी मिला। उन्होंने ही मुझे भी हिन्दुस्तानी म्यूजिक ऐंड डांस स्कूल में डाला था, मुझे आज भी याद है कि वह अम्मा से यह कहकर मुझे साथ लाई थीं कि बिरजू को छह महीने के लिए ले जाते हैं, ईश्वर ने कामयाब किया तो बहुत अच्छा, वरना देखी जाएगी। मैंने वहीं पर काम शुरू किया, और मेरे काम से सब लोग खुश हो गए। फिर चार-पांच साल वहीं रहे, अच्छी तरह काम किया। कला को जिस हद तक डूबकर सीख सकते थे, सीखा। जितना सिखा सकते थे, सिखाया भी। उसके बाद जीवन में ईश्वर की कृपा रही।

मैं वहां से भारतीय कला केंद्र आया, फिर कथक केंद्र पहुंचा और ऐसे ही धीरे-धीरे सफर आगे बढ़ता रहा। दिन-प्रतिदिन सोच और विचार बढ़ते गए। मैंने अनेक नृत्य रचनाएं कीं। वहीं से नाम मिला, वहीं से इज्जत मिली। इस बीच कोलकाता और मुंबई आना-जाना भी लगा रहा। कोलकाता को अक्सर मैं अपने करियर की मां कहता हूं और महाराष्ट्र को पिता। महाराष्ट्र माने मुंबई। आज भी मैं पूरी मेहनत और ईमानदारी से काम करता हूं, बच्चों को सिखाता हूं। मेरे पास देश-विदेश के लोग आते हैं। देश के अंदर भी बहुत-सी वर्कशॉप करता रहता हूं; कोलकाता, दिल्ली, पटना, लखनऊ, मुंबई। ऐसे ही जीवन चलता रहता है। मुझे याद है कि संघर्ष के दिनों में, यानी पिताजी के जाने के बाद अम्मा हमारी मददगार और मैं अम्मा का सहायक रहा। अम्मा ने हमेशा ही मुझसे कहा कि बेटा चाहे खाने को थोड़ा कम मिले, लेकिन जो पिताजी और चाचा ने सिखाया है, उसको ईमानदारी से करना। फिर मैंने भी पूरे मन से काम किया। उसके बाद ईश्वर की कृपा से सब कुछ ठीक होता चला गया। पहले बस से चलते थे, फिर साइकिल आई, अब गाड़ी भी आ गई है। आज सब कुछ है।...
(जारी)

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