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अस्पताल में बच्चों की मौत पर आयोग हुआ सख्त

बीते पांच साल में करीब एक हजार नवजात शिशुओं की मौत के आंकड़ों पर राष्ट्रीय मानवाधिकार आयोग की टीम अटक गई है। बादशाहखान जिला राजकीय अस्पताल में हुई इन नवजात बच्चों की मौत का कारण जानने में आयोग की टीम जुटी है। राष्ट्रीय मानवाधिकार आयोग की टीम मंगलवार को दूसरे दिन भी मौजूद रही और अस्पताल के खिलाफ मिल रही शिकायतों की गहनता से जांच की।

इस बीच आम आदमी पार्टी के जिला संयोजक आभाष चंदीला ने टीम के सदस्यों को अस्पताल की अव्यवस्था से अवगत कराया। कैसे इस अस्पताल में मरीजों की अनदेखी की जाती है। उन्होंने टीम के सदस्यों को टायलेट की गंदगी, पोस्टमार्टम में एसी नहीं चलना और परिजनों से बर्फ मंगवाने की शिकायत।

मरने के बाद जच्चा-बच्चा को मानवीय संवेदना ताक पर रखकर मृतका की साड़ी से ही उसके और उसके बच्चे के शव को बांधना। वार्डो में मरीजों का नंगा लेटना। गंदगी का आलम। जले मरीजों को रैफर करना। मरीजों को खाना नहीं मिलता है। अस्पताल में पीने के पानी के नाम पर खराब कूलर खड़ा है।

वेटिंग हॉल को कबाड़ रूम बनाना जैसी शिकायतों के प्रुफ टीम को दिए। आभाष चंदीला ने यह शिकायतें स्थानीय प्रशासन से लेकर डब्ल्यूएचओ तक की हैं। आयोग की टीम ने सभी शिकायतों को गंभीरता से सुना।

आयोग की टीम अस्पताल के अलग-अलग विभागों की करीब दर्जन भर शिकायतों की जांच में जुटी। ओपीडी में अव्यवस्था आलम, जच्चा-बच्चा वार्ड में जानलेवा व्यवस्था, लैब टेस्ट में लापहरवाही, एक्सरे रूम में कर्मचारियों की दबंगई, अल्ट्रासाउंड केंद्र की अनियमितता, नवजात शिशुओं के लिए चल रही नर्सरी, आपातकालीन विभाग में मरीजों को दूसरे अस्पतालों में रैफर करना और दवा बाहर से मंगवाने आपातकालीन विभाग संबंधी शिकायतें हैं।

टीम ने शिकायतों के बारे में अस्पताल के प्रधान चिकित्सा अधिकारी डॉ. सुरेश चंद से जानकारी ली है। टीम ने शिशुओं की मौत के मामले में उपमुख्य चिकित्सा अधिकारी डॉ. अनूप कुमार से भी बातचीत की। आयोग की टीम ने मंगलवार को अस्पताल के विभिन्न वार्डो में मरीजों से बातचीत की।

टीम के सदस्य शिशुओं की नर्सरी में भी गए और इंतजामों का जायजा लिया। बाद में प्रधान चिकित्सा अधिकारी के कक्ष में डॉ. सुरेश चंद्र, डॉ. वीरेंद्र यादव व डॉ. कृष्ण कुमार से बातचीत की। टीम के सदस्य अस्पताल प्रबंधन से बातचीत के बाद मरीज और उनके तीमारदारों से बातचीत करेंगे।

अस्पताल प्रबंधन ने टीम के सदस्यों को बताया कि अस्पताल में स्टाफ की भारी कमी है, इसलिए व्यवस्था का क्रियांव्यन नहीं हो पाता है। प्रबंधन ने बताया कि अस्पताल में करीब साठ चिकित्सक चाहिए है, लेकिन है करीब पैंतीस। स्टाफ नर्स करीब सौ चाहिए और करीब तीस से ही अस्पताल चल रहा है। अस्पताल में कई टेक्निशियन नहीं है।

बच्चों की मौत पर एक नजर

वर्ष-------संख्या
2010----99
2011----185
2012---205
2013---222
2014---196
2015---75
मई तक

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