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10 जगहों पर खुद कट जाती है कॉल

10 जगहों पर खुद कट जाती है कॉल

दिल्ली में 10 से अधिक क्षेत्र मोबाइल नेटवर्क के लिए डेड जोन बन गए हैं। यह ऐसे इलाके हैं, जहां पहुंचने पर नेटवर्क गायब हो जाता है और कॉल या तो कट जाती है या कनेक्शन नहीं मिलता। हर कंपनियों के डेड जोन के अलग-अलग नेटवर्क हैं। कुछ जोन ऐसे हैं, जहां अमुक कंपनी का नेटवर्क मिलता है तो दूसरी कंपनी का नेटवर्क गायब हो जाता है।

ट्राई की रजिस्टर्ड संस्था वॉयस के आईटी और टेलीकॉम मामलों के जानकार हेमंत उपाध्याय कहते हैं कि कंपनियों की ओर से ग्राहकों को बेहतर सेवा उपलब्ध कराने के लिए शहरभर में मूलभूत ढांचे के लिए जरूरी निवेश नहीं किया जाता है। ज्यादातर कंपनियां सिर्फ घनी आबादी वाले इलाकों में ही टावर लगाती हैं। ऐसे शहर में कई जगहों से गुजरने पर फोन अपने आप कट जाता है।

जामिया के टेलीकम्युनिकेशन विभाग के प्रोफेसर डां. अनवर अहमद के अनुसार कॉल ड्राप के कुछ प्रमुख कारण होते हैं। इनमें हैंडओवर स्थिति सबसे प्रमुख होती है। बातचीत के दौरान अकसर कॉल एक नेटवर्क से दूसरे नेटवर्क में स्विच कर जाती है। अगर दोनों नेटवर्क की क्षमता समान नहीं होती है या फिर एक नेटवर्क की क्षमता बेहद कमजोर हो जाती है तो कॉल ड्राप हो जाती है। उदाहरण के तौर पर दिल्ली में यमुना के आसपास किसी भी कंपनी ने मोबाइल टावर नहीं लगाया है। ऐसे में यमुना के ज्यादातर ब्रिजों से गुजरने पर फोन कट जाता है। आईटीओ से लक्ष्मी नगर जाते समय, नोएडा से मयूर विहार, निजामुद्दीन ब्रिज, अक्षरधाम आदि के आसपास मोबाइल ग्राहकों का फोन कट जाता है। इसी तरह जमीन के नीचे मेट्रो में किसी मोबाइल कंपनी का टावर मिलता है तो किसी का नहीं मिलता है। इसी तरह कई जगहों पर सात मंजिल ऊपर के मकान में रहने वाले लोगों ने फोन न मिलवे या डाटा कार्ड के अक्सर काम न करने की शिकायत दर्ज कराई है।

बार्डर के इलाकों में रहने वालों को देना होता है ज्यादा बिल: दिल्ली के कुछ इलाकों में रहने वाले ग्राहकों को कई बार टेलीकॉम कंपनियों की तकनीकी खामियों के चलते ज्यादा बिल देना होता है। उदाहरण के तौर पर दिल्ली में रहने वाला कोई टेलीकॉम ग्राहक यदि गाजियाबाद जाता है तो उसे कई बार यूपी ईस्ट सर्कल के सिग्नल मिलने लगते हैं। ऐसे में दिल्ली के बार्डर इलाके में होने के बावजूद दिल्ली में फोन करने पर उसे हर कॉल के लिए एसटीडी कॉल दरें देनी पड़ती हैं। 

डेड जोन में नेटवर्क न मिलने के यह कारण
घर में इस्तेमाल होने वाले मैटीरियल भी कॉल ड्राप का कारण होते हैं। वायर मैश, शीट मेटल, इंसुलेशन आदि की वजह से सिग्नल भी कमजोर होते हैं
मोबाइल फोन का एंटीना खराब होने की वजह से भी नेटवर्क में दिक्कत आती है
जहां पर टावर लगा हो उसको सही तरीके से इंस्टाल यानी लगाया न गया हो। यह भी नेटवर्क परेशानी का कारण बनता है।
मोबाइल ट्रैफिक अधिक होने की वजह से कॉल ड्राप और ब्लॉक होने की समस्या होती है

यह हो सकता है समस्या का समाधान
कंपनियों पर जुर्माना राशि अधिक बढ़ाई जानी चाहिए, रेडियो कवरेज को सुधार, नेटवर्क की क्षमता सुधार कर इस समस्या से निपटा जा सकता है
दिल्ली में टावर बढ़ाने की आवश्यकता है। मौजूदा समय में दिल्ली में 34000 मोबाइल टावर है जबकि 50000 से अधिक की जरूरत है
प्रत्येक मोबाइल ऑपरेटर को बेहतर फ्रीक्वेंसी दी जाए। वर्तमान में भारत में औसत फ्रीक्वेंसी स्पेक्ट्रम 12 से 15 मेगा हर्ट्ज है जबकि 40 से 50 मेगा हर्ट्ज होना चाहिए

चाहिए ज्यादा मोबाइल टावर
टॉवर एंड इंफ्रास्ट्रक्चर्स प्रोवाइडर्स एसोसिएशन के डायरेक्टर जनरल उमंग दास के अनुसार वर्तमान समय में मोबाइल धारकों की संख्या को ध्यान में रखते हुए देश में फिलहाल 625000 मोबाइल टावर होने चाहिए। जबकि देश में अब तक मात्र 425000 टावर लगाए जा सके हैं। बेहतर मोबाइल सेवाओं के लिए देश में अभी कम से कम दो लाख टावर और लगाए जाने की जरूरत है।

क्या कहती हैं कंपनियां
सेल्यूलर ऑपरेटर्स एसोसिएशन ऑफ इंडिया (सीओएआई) के अनुसार मार्च 2009 में जहां देश में मोबाइल धारकों की संख्या जहां लगभग 39 करोड़ थी वहीं इनकी संख्या मार्च 2014 में बढ़ कर 90 करोड़ हो गई। इस दौरान जहां ग्राहकों की संख्या में तीन गुना इजाफा दर्ज किया गया वहीं मोबाइल टावरों की संख्या में वर्ष 2010 से 2014 के बीच मात्र 41 प्रतिशत का इजाफा दर्ज किया गया। संगठन के अनुसार पूरी दुनिया में भारत की मोबाइल ऑपरेटर कंपनियों के पास औसतन सबसे कम स्पेक्ट्रम है। ऑस्ट्रेलिया, साउथ कोरिया, सिंगापुर व मलेशिया जैसे बाजारों की तुलना में तो यह बेहद कम है।

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