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संकीर्ण राजनीति के शिकार दो प्रदेश

आंध्र प्रदेश और तेलंगाना के मुख्यमंत्री इन दिनों एक विचित्र जुबानी जंग में जुटे हुए हैं। उदाहरण के लिए, केसीआर के उपनाम से लोकप्रिय तेलंगाना के मुख्यमंत्री के चंद्रशेखर राव ने आंध्र प्रदेश के अपने समकक्ष चंद्रबाबू नायडू को जहां 'चोर' कहा, तो वहीं नायडू ने जवाब देते हुए कहा कि केसीआर अपना 'नाकारापन' छिपाने के लिए कागजी जालसाजी में जुटे हैं और उन पर बेतुके आरोप मढ़ रहे हैं। इस बीच, केसीआर की पुलिस ने तेलुगुदेशम पार्टी (टीडीपी) के वरिष्ठ नेता रेवनाथ रेड्डी को गिरफ्तार कर लिया। उन पर आरोप है कि वह तेलंगाना में एक मनोनीत विधायक को रिश्वत देने की कोशिश कर रहे थे। हैदराबाद में कयास यह लगाया जा रहा है कि रेड्डी के जरिये केसीआर असल में चंद्रबाबू नायडू के बेटे को सलाखों के पीछे भेजना चाहते हैं।

इससे बुरी तरह नाराज चंद्रबाबू नायडू ने केसीआर को चेतावनी दी है कि यदि उन्हें कुछ भी नुकसान पहुंचाने की कोशिश हुई, तो केसीआर की हुकूमत एक दिन भी कायम नहीं रह पाएगी। ये दोनों मुख्यमंत्री राज्यपाल ईएसएल नरसिम्हन के पास हस्तक्षेप की गुहार लेकर पहुंचे। केसीआर ने राज्यपाल से नायडू के खिलाफ मुकदमा चलाने की इजाजत देने की मांग की, तो वहीं चंद्रबाबू नायडू ने राज्यपाल से अपील की कि वह आंध्र प्रदेश पुनर्गठन कानून की धारा-8 के तहत अपने अधिकारों का इस्तेमाल करें। दरअसल, दोनों मुख्यमंत्रियों की मूल लड़ाई हैदराबाद पर नियंत्रण को लेकर है। तेलंगाना आंदोलन की शुरुआत के वक्त से ही दोनों के बीच यह विवाद का मुद्दा रहा है। एक समय केसीआर टीडीपी के सदस्य थे, बल्कि अविभाजित आंध्र प्रदेश के नायडू मंत्रिमंडल में भी शामिल थे। बाद में, वह न सिर्फ नायडू के दोस्त से दुश्मन बन गए, बल्कि टीडीपी छोड़ तेलंगाना राष्ट्र समिति (टीआरएस) नाम से अलग पार्टी बनाई और अलग तेलंगाना राज्य की मांग के साथ आक्रामक आंदोलन चलाया। चंद्रबाबू नायडू ने इसके विरोध में एकजुट आंध्र प्रदेश के लिए आंदोलन चलाया। जाहिर है, नायडू हार गए।

आखिरी बंटवारे में हैदराबाद तेलंगाना के हिस्से में गया। हालांकि, यह भी तय हुआ कि शुरुआती 10 साल तक यह शहर दोनों राज्यों की राजधानी बना रहेगा। अभी राज्य के बंटवारे का एक साल ही पूरा हुआ है और केसीआर का धीरज खोने लगा है। वह चाहते हैं कि चंद्रबाबू नायडू तुरंत शहर खाली करें। जाहिर है, नायडू अभी इस स्थिति में नहीं हैं, क्योंकि अमरावती को नई राजधानी के लायक बनने में कम से कम चार-पांच वर्ष लगेंगे। इसलिए जब नायडू यह दावा करते हैं कि हैदराबाद पर उनका भी बराबर का हक है, तो केसीआर उन पर पलटवार करते हैं कि 'हैदराबाद आपकी बपौती नहीं है।'  आखिर केसीआर इतनी जल्दबाजी में क्यों हैं? इसकी कई व्याख्याएं हैं। एक तो यही कि चुनावों के दौरान उन्होंने मतदाताओं के आगे काफी कुछ परोस दिया था और अब उन वादों को पूरा करना मुश्किल हो रहा है। उन पर इस बात का भी काफी दबाव है कि वह तेलंगाना में नए निवेश लेकर आएं और आईटी हब के उसके पुराने गौरव को फिर से बहाल करें। वह कृषि संकट का भी सामना कर रहे हैं और शासन को प्रभावी बनाने के लिए भी उन्हें संघर्ष करना पड़ रहा है। वह इबोला वायरस को रोकने और गरीबों की भीषण गरमी से मरने से बचाने में भी नाकाम रहे।

एक अन्य तर्क यह है कि  केसीआर दरअसल टीडीपी की तरक्की से घबरा उठे हैं, जो राज्य में मुख्य विपक्षी पार्टी है। वह इस बात से बखूबी वाकिफ हैं कि चंद्रबाबू नायडू तेलंगाना में अपने बेटे एन लोकेश को आगे बढ़ा रहे हैं। लोकेश का जन्म तेलंगाना में ही हुआ है। केसीआर खुद अपने बेटे के टी रामाराव को अपने उत्तराधिकारी के रूप में पेश करते हैं। दोनों मुख्यमंत्रियों के ये दोनों राजनीतिक उत्तराधिकारी मई के महीने में अमेरिका गए थे, ताकि अपने-अपने पिता के सूबे के लिए वे वहां से आर्थिक निवेश ला सकें। नेतृत्वविहीन कांग्रेस इस वक्त तेलंगाना में कहीं दिखाई नहीं पड़ रही, मगर यदि उसने वाईएसआर कांग्रेस से समझौता कर लिया, तो वह एक प्रभावी शक्ति बन सकती है। भाजपा टीडीपी के साथ गठबंधन में होने के कारण बहुत मामूली हैसियत में है।

टीआरएस ने पिछले साल जब अपना सफर शुरू किया था, तब 119 सदस्यों वाली विधानसभा में उसके पास 63 विधायक थे और बाद में दो बसपा विधायक भी उसके समर्थन में आ गए, जिससे उसका संख्या-बल 65 हो गया। लेकिन हाल में विधान परिषद के चुनाव में उसने 85 विधायकों का समर्थन जुटा लिया और यही बात चंद्रबाबू नायडू को चिढ़ा गई। साफ है, कांग्रेस और खुद नायडू के विधायकों ने क्रॉस वोटिंग की। नायडू ने टीआरएस पर खरीद-फरोख्त के आरोप लगाते हुए कहा कि केसीआर की पार्टी अपने संख्या-बल के बूते परिषद की तीन सीटें ही जीत सकती थी, मगर उसने टीडीपी के 'पांच', कांग्रेस के 'चार' और वाईएसआर के 'दो' विधायकों को 'खरीद लिया' और परिषद की दो अतिरिक्त सीटें भी जीत लीं। लेकिन सात जून को सबसे बड़ा हंगामा खड़ा हुआ, जब एक स्थानीय न्यूज चैनल ने, जिसका मालिकाना हक केसीआर के पास है, चंद्रबाबू नायडू का एक ऑडियो प्रसारित किया, जिसमें नायडू मनोनीत विधायक एल्विस स्टीफंस को कथित रूप से अपनी पार्टी के पक्ष में वोट देने के लिए मना रहे हैं।

एक सप्ताह पहले टीडीपी विधायक रेवनाथ रेड्डी को इसी विधायक को रिश्वत देते हुए रंगे हाथ पकड़ा गया था। संकट में फंसे नायडू ने केसीआर के 'पर्दाफाश' की धमकी दी। इसके बाद तो आंध्र प्रदेश के पुलिस थानों में टीडीपी विधायकों ने केसीआर के खिलाफ 50 मुकदमे दर्ज करा दिए, जिनमें केसीआर पर नायडू और दूसरे महत्वपूर्ण टीडीपी मंत्रियों की फोन टैपिंग के आरोप लगाए गए हैं। चंद्रबाबू नायडू ने कहा कि 'हैदराबाद में हमारी भी पुलिस है' यानी वह भी तेलंगाना के मुख्यमंत्री के खिलाफ पुलिस कार्रवाई कर सकते हैं। इस पर केसीआर ने तंज कसा कि 'हैदराबाद तेलंगाना पुलिस के अधिकार क्षेत्र में है।'

राज्य पुनर्गठन कानून की धारा-8 के तहत यह साफ है कि अंतरिम काल तक हैदराबाद की कानून-व्यवस्था की जिम्मेदारी राज्यपाल के पास होगी। राज्यपाल तेलंगाना मंत्रिमंडल की राय मांग सकते हैं, मगर फैसला अपने विवेक से करने को आजाद हैं। नायडू इसी धारा-8 के तहत राज्यपाल से हस्तक्षेप की मांग कर रहे हैं। वह प्रधानमंत्री मोदी से भी मिल चुके हैं। लेकिन गवर्नर नरसिम्हन हड़बड़ी में कदम नहीं उठाना चाहते। सवाल यह है कि नायडू इतने हताश क्यों दिख रहे हैं? दरअसल, उनकी अपनी समस्या है।

उन्होंने अपनी जनता से अमरावती को 'विश्व स्तरीय' राजधानी बनाने का वादा किया है और इतनी धनराशि उनके पास है नहीं। उनकी आलोचना इस बात के लिए भी हो रही है कि उनकी मुआवजा नीति धनी किसानों को फायदा पहुंचाने वाली है, जबकि छोटे किसान, कृषि मजदूर आदि बगैर नौकरी पाए विस्थापित होने को बाध्य होंगे। दोनों मुख्यमंत्रियों के आगे राज्य के निर्माण का विशाल काम पड़ा है, लेकिन दोनों एक-दूसरे से बात तक नहीं कर रहे। उन्हें अपने निजी व राजनीतिक स्वार्थों को परे रखकर सुशासन की दिशा में गंभीर पहल करनी चाहिए।
(ये लेखक के अपने विचार हैं)

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