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आखिर कहां चले जाते हैं लापता बच्चे

लापता बच्चों की बढ़ती संख्या हमारे देश की ही नहीं, अब पूरी दुनिया की समस्या बन चुकी है। इसी से जुड़ा हुआ आंकड़ा यह है कि दुनिया में तकरीबन 12 लाख से अधिक बच्चों की सालाना खरीद-फरोख्त होती है, जिनमें बहुत बड़ी तादाद भारतीय बच्चों की है। पूरे देश में इस समय सालाना तकरीबन एक लाख बच्चे गायब होते हैं, जबकि पांच-छह साल पहले 44 से 55 हजार बच्चे गायब होते थे। सरकारी आंकड़ों के अनुसार, जनवरी 2011 से जून 2014 के बीच 3.27 लाख बच्चे गायब हुए। इनमें से 45 फीसदी से ज्यादा बच्चों का आज तक पता नहीं लग सका है। इनमें लड़कियों की संख्या लड़कों से कहीं ज्यादा है और इनमें भी सबसे ज्यादा 12-14 साल की बच्चियां हैं।

ये बच्चे कहां चले जाते हैं? शक की पहली सुई तो आपराधिक गिरोहों की ओर घूमती है। एक बड़ा कारण बाल वेश्यावृत्ति भी है। दोनों ही तरह से यह मामला बच्चों के खोने का ही नहीं, बल्कि अपराध का भी है। लेकिन पुलिस-तंत्र इसको बच्चों के खो जाने का मामला मानकर निपटता है, जबकि यह अपराध नियंत्रण की एक महत्वपूर्ण कड़ी हो सकता है। पुलिस इसे लेकर अक्सर उदासीन दिखती है और ज्यादातर बच्चे, जो गायब होते हैं, कभी वापस नहीं आते। यह उदासीनता सुप्रीम कोर्ट के आदेश के बाद भी खत्म नहीं हुई है। पुलिस के रवैये को लेकर लोग इस कदर हताश हो चुके हैं कि बच्चों की गुमशुदगी के मामले अब पुलिस से ज्यादा चाइल्ड हेल्प लाइन के पास दर्ज कराए जाते हैं।

लापता बच्चों के मामलों पर नजर रखने के लिए संप्रग सरकार के दौरान करीब 32 राज्यों व केंद्र शासित क्षेत्रों ने केंद्र के साथ एक करारनामे पर दस्तखत किए थे, जिसके तहत एक ही सॉफ्टवेयर के जरिये वे गुमशुदा बच्चों के मामलों पर नजर रख सकेंगे और उनकी जानकारी का आदान-प्रदान भी कर सकेंगे। केंद्र की समेकित बाल विकास योजना के तहत गुमशुदा बच्चों के मामलों पर नजर रखने के लिए एक मॉडल भी अपनाया गया। इस मॉडल की प्रायोगिक परियोजना पश्चिम बंगाल में चलाई गई। बाद में इसे लगभग सभी राज्यों में शुरू किया जाना था। इसी योजना के तहत लापता बच्चों के ट्रैकिंग सिस्टम की शुरुआत भी पश्चिम बंगाल से की गई थी। इन सबके बावजूद, लापता बच्चों के मामलों में बेतहाशा बढ़ोतरी समझ से परे है।

जब से न्यायपालिका ने इस मामले में हस्तक्षेप करना शुरू किया है, तब से पुलिस की सक्रियता कुछ  बढ़ी है। मगर न्यायपालिका की भी सीमाएं हैं। असल मुद्दा यह है कि ऐसे मामलो में पुलिस अपने दायित्व का निर्वहन ईमानदारी से करे। एकाध बड़े आदमी के बच्चे की बरामदगी दिखाकर अपनी पीठ थपथपाने का तरीका कहीं नहीं ले जाता। कई तरह के कानूनों से पुलिस पर इन दिनों यह दबाव बना है कि वह महिलाओं के मामले में संवेदनशीलता दिखाए। यही तरीका बच्चों के लिए भी अपनाना होगा।
(ये लेखक के अपने विचार हैं)

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