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बोस जो जापान में अब भी लोकप्रिय हैं

मैं पिछले दिनों जापान में था और वहां मैंने अपने मेजबानों से पूछा कि इस देश में सुभाष चंद्र बोस को कितना याद किया जाता है? उनका जवाब था कि सुभाष चंद्र बोस को सिर्फ भारतीय इतिहास के विशेषज्ञ जानते हैं, जबकि दूसरे बोस, यानी रास बिहारी बोस जापान, खासकर टोकियो में बहुत प्रसिद्ध हैं। उन्होंने जापानियों को भारतीय करी से परिचित कराया था, जो अब तक शहर के लोकप्रिय होटलों में परोसी जाती है। रास बिहारी बोस का नाम मेरे लिए भी अपरिचित नहीं था। जब मैं कोलकाता में पढ़ता था, तब मैं अक्सर 27 नंबर की धीमी ट्राम से रास बिहारी एवेन्यू तक जाता था। वह सुभाष चंद्र बोस ही नहीं, बल्कि महात्मा गांधी के भी पहले के दौर के क्रांतिकारी थे। अनोखी बात है कि फिलहाल वह भारत की अपेक्षा जापान में ज्यादा जाने जाते हैं।

बेंगलुरु लौटने के बाद मैंने रास बिहारी बोस की एक जीवनी खोज निकाली, जो होक्काईदो विश्वविद्यालय के ताकेशी नाकाजिमा ने लिखी थी और जिसे अंग्रेजी में प्रेम मोटवानी ने अनुवादित किया था। उससे मैंने जाना कि रास बिहारी बोस जापान में जून 1915 में, यानी ठीक सौ साल पहले पहुंचे थे। वह अंग्रेजों से बचकर भागे थे, क्योंकि उन्हें वायसराय को मारने के एक षड्यंत्र की वजह से खोजा जा रहा था। सन 1886 में उनका जन्म बंगाल के एक गांव में हुआ था। वह चंदन नगर में बढ़े-पले थे, जो उस वक्त फ्रांस के कब्जे में था। हाई स्कूल के बाद उन्होंने फौज में भर्ती होने के लिए अर्जी दी, लेकिन उन्हें नहीं चुना गया, क्योंकि अंग्रेज बंगालियों को फौज के उपयुक्त नहीं मानते थे। बोस को कसौली में क्लर्क की नौकरी मिली, उसके बाद वह देहरादून में फॉरेस्ट रिसर्च इंस्टीट्यूट (एफआरआई) पहुंच गए। हालांकि, वह अंग्रेज सरकार की नौकरी में थे, लेकिन उनके विचार घोर सरकार विरोधी थे। उसी दौरान उन्होंने पंजाब और बंगाल के क्रांतिकारियों से मेल-जोल बढ़ा लिया।

एफआरआई में काम करते हुए रास बिहारी बोस को रसायनों का और देशी बम बनाने का ज्ञान प्राप्त हुआ। जब दिसंबर 1912 में अंग्रेजों की राजधानी दिल्ली पहुंची, तो बोस ने उस समारोह में गड़बड़ी पैदा करने का फैसला किया। उनके साथी एक अन्य बंगाली क्रांतिकारी बसंत कुमार विश्वास थे, जिन्होंने रास बिहारी बोस का बनाया बम वायसराय लॉर्ड हार्डिंग के हाथी पर फेंका। उससे बहुत बड़ा धमाका हुआ, लेकिन हार्डिंग मामूली चोटों के साथ बच गए। भगदड़ का फायदा उठाकर बोस और विश्वास वहां से भाग लिए। रास बिहारी ने देहरादून के लिए शाम की ट्रेन पकड़ी और अगले दिन से नौकरी शुरू कर दी। उनकी दोहरी जिंदगी इतनी खूबसूरती से छिपी हुई थी कि जब लॉर्ड हार्डिंग कुछ महीनों के बाद देहरादून आए, तो रास बिहारी ने उनके सम्मान में स्वागत समारोह आयोजित किया। लेकिन धीरे-धीरे उनकी तरफ शक की सुई घूमने लगी। जब उनके कुछ साथी गिरफ्तार हो गए, तब बोस चंदन नगर भाग गए। वह कुछ दिनों तक बनारस और चंदन नगर में छिपते रहे। आखिरकार अप्रैल 1915 में छद्म नाम से वह जापान के लिए रवाना हो गए।

पांच जून, 1915 को वह कोबे बंदरगाह पहुंचे और वहां से ट्रेन से टोकियो पहुंच गए। शुरू में वह जिन लोगों से मिले, उनमें महान चीनी राष्ट्रवादी सन यात सेन भी थे, जो तब जापान में सन जोंगसान नाम से रह रहे थे। बोस ने जापानी पत्रकारों और एशियाई एकता के समर्थकों से भी संपर्क स्थापित कर लिया। अंग्रेजों को आखिरकार पता लग गया कि रास बिहारी टोकियो में हैं और उसने जापान सरकार से उनके प्रत्यर्पण की मांग की। उनके मित्र उन्हें नाकामुराया बेकरी के मालिक के पास ले गए, जिन्होंने उन्हें बेकरी में कई महीनों तक छिपाए रखा और बेकरी के कर्मचारियों ने भी अपने मालिक का साथ दिया। इस दौरान रास बिहारी ने वहां काम कर रही जापानी महिलाओं को भारतीय व्यंजन बनाने सिखाए। इस बीच एक अंग्रेज जहाज ने एक जापानी व्यापारिक जहाज पर गोलाबारी कर दी, जिससे दोनों देशों के रिश्ते खराब हो गए और रास बिहारी को इसका फायदा मिला। जब वह छिपे हुए थे, तब नाकामुराया बेकरी के मालिक से उनके बहुत घनिष्ठ संबंध हो गए। जब वह आजादी से घूमने-फिरने लगे, तो उसके मालिक ने अपनी बेटी तोशिको की शादी बोस के साथ कर दी। उन दोनों के दो बच्चे हुए, लेकिन 1925 में तोशिको की निमोनिया से मृत्यु हो गई।

रास बिहारी बोस ने अपने दुख को राजनीतिक व्यस्तता में भुलाने की कोशिश की। वह एशियाई एकता के समर्थकों में सक्रिय हो गए। उन्होंने टोकियो में भारतीय क्लब बनाया और पश्चिमी उपनिवेशवाद के खिलाफ भाषण देना शुरू किया। तब तक वह अच्छी तरह से जापानी लिखने-बोलने लगे थे। लेकिन उनकी राजनीति में उनके पाक कौशल का तड़का लगा हुआ था। सन 1927 में नाकामुराया ने अपने मैन्यु में भारतीय करी को जगह दी। वह उसका सबसे लोकप्रिय व्यंजन साबित हुई। इस बीच वह भारत के स्वतंत्रता संग्राम पर पैनी नजर रखे हुए थे। वह गांधीजी के यंग इंडिया  सहित कई पत्र पढ़ते थे। उन्होंने यह निष्कर्ष निकाला कि गांधी के विचारों या उनके भाषणों से ज्यादा ताकत उनकी त्याग की भावना में है। गांधी की व्यक्तिगत ईमानदारी और सादगी की वजह से ही देश के दूर-दराज के गरीब इलाकों तक आजादी का संदेश पहुंच पाया है। रास बिहारी एक अन्य युवा कांग्रेस नेता सुभाष चंद्र बोस से भी बहुत प्रभावित थे। उन्होंने लिखा कि गांधी का मैं बहुत सम्मान करता हूं, लेकिन वह बीते हुए कल के व्यक्ति हैं, जबकि सुभाष चंद्र बोस आज के नेता हैं।

इस बीच दूसरा विश्व युद्ध शुरू हो गया। फरवरी 1942 में अंग्रेजी सेना को सिंगापुर में जापानियों ने जबर्दस्त शिकस्त दी। अंग्रेजी सेना के जो भारतीय सिपाही पकड़े गए, उन्होंने मोहन सिंह के नेतृत्व में एक आजाद हिंद फौज बनाई और जापानियों के साथ मिलकर अपने देश की आजादी के लिए लड़ने का फैसला किया। इससे उत्साहित होकर रास बिहारी भी टोकियो से दक्षिण-पूर्वी एशिया पहुंच गए। बैंकॉक में हुए एक सम्मेलन में यह तय किया गया कि आजाद हिंद फौज एक इंडिया इंडिपेंडेंस लीग के तहत होगी, जिसके अध्यक्ष खुद रास बिहारी बोस होंगे। जापानियों ने आजाद हिंद फौज के नेतृत्व को मजबूत बनाने के लिए सुभाष चंद्र बोस से संपर्क किया, जो तब बर्लिन में थे। मई 1943 में सुभाष चंद्र बोस एक पनडुब्बी से जापान पहुंचे। एक महीने बाद दोनों बोस मिले।

रास बिहारी ने इंडियन इंडिपेंडेंस लीग का नेतृत्व सुभाष चंद्र बोस को सौंप दिया। रास बिहारी बोस फरवरी 1944 में फेफड़ों की बीमारी से गंभीर रूप से बीमार हो गए। उनकी सेहत खराब होती गई और 21 जनवरी, 1945 को उनकी मृत्यु हो गई। कहा जाता है कि अपने आखिरी दिनों में जब वह अस्पताल में थे, तो डॉक्टरों ने रास बिहारी से उनकी भूख के बारे में पूछा। उन्होंने कहा कि जब नर्सें मुझे मेरा प्रिय खाना खाने ही नहीं देतीं, तो मुझे भूख कैसे लग सकती है? डॉक्टर ने पूछा कि आपको क्या खाना पसंद है, तो उन्होंने कहा था- नाकामुराया की इंडियन करी।
(ये लेखक के अपने विचार हैं)

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