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ग्राहक त्रस्त, कंपनी मस्त: कॉल ड्रॉप की सौ दिन में 100 फीसदी शिकायतें

ग्राहक त्रस्त, कंपनी मस्त: कॉल ड्रॉप की सौ दिन में 100 फीसदी शिकायतें

भारतीय दूरसंचार नियामक प्राधिकरण (ट्राई) को राजधानी में पिछले सौ दिनों में जो शिकायतें मिली हैं, उनमें लगभग 100 फासदी कॉल ड्रॉप की हैं। इससे पहली तिमाही में यह आंकड़ा 20 फीसदी तक था। इसके अलावा, ट्राई की ऑडिट रिपोर्ट में सामने आया है कि देश में कॉल ड्रॉप के मामले करीब पांच गुना बढ़ गए हैं।

ग्राहक त्रस्त, कंपनी मस्त
कॉल ड्रॉप होने से उपभोक्ताओं को नुकसान है मगर कंपनियां चांदी काट रही हैं। कॉल भले ही कुछ सेकंड में कट जाए, मगर वो पैसा पूरे मिनट का लेती हैं। इसी के मद्देनजर केंद्रीय संचार एवं सूचना प्रौद्योगिकी मंत्री रविशंकर प्रसाद ने कंपनियों को कार्रवाई की चेतावनी दी है। इसकी कार्ययोजना तैयार होनी है।

सरकार खोज रही है हल
केंद्रीय संचार मंत्रालय और ट्राई मिलकर कॉल ड्रॉप की समस्या का हल खोज रहे हैं। ट्राई ने दिक्कत की वजह मोबाइल टॉवरों की कमी को बताया है। वहीं, मंत्रालय का मानना है कि निजी कंपनियां पैसा बचाने के चक्कर में तकनीक में सुधार नहीं कर रहीं।

कम मोबाइल टॉवर बन रहे कॉल ड्रॉप का कारण
उपभोक्ताओं को हो रही कॉल ड्रॉप की परेशानी की मुख्य वजह ट्राई की ओर से मोबाइल टॉवरों की कमी बताई जा रही है। उसका कहना है कि कॉल का ट्रैफिक बहुत बढ़ गया है, ऐसे में मोबाइल टॉवरों की कमी कॉल ड्रॉप की समस्या की वजह बन गया है। साथ ही ढांचागत सुविधाओं की कमी को दूसरा कारण नियामक की ओर से बताया गया है।

टॉवर लगाने में तेजी लाएगा संचार मंत्रालय
केंद्रीय मंत्रलय के एक अधिकारी के मुताबिक दूरसंचार विभाग देशभर मे बड़ी तादाद में मोबाइल टॉवर लगाने की योजना का खाका तैयार कर रहा है। ताकि निजी मोबाइल कंपनियों इसे आधार बनाकर अपनी कमी नहीं छिपा सकें। अदालत ने भी टॉवर से रेडिएशन के खतरे के मुद्दे पर सरकार को जिम्मेदारी सौंपी है। दरअसल यह एक तरह का भ्रम फैलाया गया है। जिसके चलते कई क्षेत्र में मोबाइल टॉवर लगवाने पर क्षेत्रीय निकायों को विरोध झेलना पड़ा है। इसके लिए मंत्रलय लोगों को जागरुक और टॉवर स्थापित किए जाएंगे।

सार्वजनिक दूरसंचार कंपनियों को मजबूत करेगी सरकार
सार्वजनिक क्षेत्र की दूरसंचार कंपनी एमटीएनएल और वीएसएनएल को मजबूत करने का खाका तैयार किया जा रहा है। ताकि इस क्षेत्र में निजी कंपनियों को प्रतिस्पर्धा का सामना करना पड़े और उपभोक्ताओं को उनका मनमाना रवैया न भुगतना पड़े। यदि दोनों सार्वजनिक कंपनियां मजबूत होंगी और अच्छा विकल्प मिलेगा तो जाहिर है कि उसे निजी कंपनी का मुंह नहीं ताकना पड़ेगा।

कानून और निगरानी की कमी से कंपनियों के हौंसले बुलंद
संचार मंत्रालय के एक अधिकारी की माने तो निजी मोबाइल कंपनियों के हौंसले कॉल्स के मामले में कानून और निगरानी की कमी के चलते बुलंद हैं। स्पेक्ट्रम और मैन पॉवर पर तो कंपनियां खर्च करती हैं, क्योंकि इनकी निगरानी समुचित तरीके से होती है। लेकिन उपभोक्ता को दी जाने वाली सेवाओं पर महज दिशा-निर्देश हैं। जिनसे बचने के कई रास्ते इन कंपनियों के पास हैं।

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