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उत्तर पूर्व में कई संगठनों के हाथ मिलाने से बिगड़ी स्थिति

उत्तर पूर्व में कई संगठनों के हाथ मिलाने से बिगड़ी स्थिति

उत्तर पूर्व के राज्यों में संघर्ष का सिलसिला इनके बतौर राज्य अस्तित्व में आने के समय से जारी है। राज्यों में आपसी सीमा विवाद के अलावा जनजातीय संघर्ष भी बड़े पैमाने पर रहा है। भारत सरकार के उत्तर पूर्वी राज्यों में जीवन स्तर सुधारने संबंधी प्रयासों के कारण 2013 में स्थिति में कुछ सुधार आया था। हालांकि 2014 में सरकार विरोधी आदिवासी समूहों के खिलाफ केंद्र सरकार के सशक्त अभियान से तनाव फिर बढ़ गया। फलस्वरूप उग्रवादी संगठनों ने सुरक्षा बलों और स्थानीय नागरिकों के खिलाफ हमले शुरू कर दिए।

चार गुटों ने मिलाया हाथ
इसी साल के आरंभ में एनएससीएन(के) मुखिया एस.एस.खपलांग, उल्फा(आई) प्रमुख डॉक्टर अभिजीत असोम, केएलओ प्रमुख जीबन सिंह कोच और एनडीएफबी मुखिया बी.सौराईगरा ने हाथ मिलाने की घोषणा की। इन समूहों ने एक नए गुट यूनाइटेड नेशनल लिबरेशन फ्रंट ऑफ डब्लूईएसईए (यूएनएलएफडब्लू) बनाया। उल्फा(आई) और एनडीएफ(बी) उत्तर पूर्वी राज्यों को उत्तरपूर्व भारत के स्थान पर वेस्टर्न साउथ ईस्ट एशिया (डब्लूईएसईए) कहता है। इसकी योजना निर्वासित सरकार गठन की है।

सुरक्षाकर्मियों पर हमले
4 मई 2015- असम राइफल्स के सात जवान नगालैंड में उग्रवादियों के हमले में मारे गए
6 अक्तूबर 2012- मणिपुर में उग्रवादियों ने घात लगाकर हमला किया, कई जवान घायल
2005 से 31 मई 2015 के बीच 451 जवान उग्रवादियों के हमलों में मारे गए
2015 में अब तक उत्तर पूर्व के छह राज्यों में 23 सुरक्षाकर्मी मारे जा चुके हैं

उत्तर पूर्व में उग्रवाद

मणिपुर
पीपुल्स लिबरेशन आर्मी (पीएलए)
: यह संगठन 1978 से सक्रिय है। इसमें मैती, नगा और कुकी आदिवासी शामिल हैं।
कांगलेई यावोल काना लूप (केवाईकेएल) : यह संगठन मणिपुर में सांस्कृतिक एकता के लिए बना था। लेकिन यह कई उग्रवादी गुटों की मदद भी करता है। 
यूनाइटेड नेशनल लिबरेशन फ्रंट ऑफ मणिपुर : 1964 से मणिपुर में सक्रिय है। यह मणिपुर को सोशलिस्ट देश बनाना चाहता है। म्यामांर और बांग्लादेश में इसके ट्रेनिंग कैंप हैं।
(स्रोत : साउथ एशियन टेरोरिज्म पोर्टल) 

असम  
उल्फा : यूनाइटेड लिबरेशन फ्रंट ऑफ असम (उल्फा) 1979 से सक्रिय है। उल्फा के मुख्य दो लक्ष्य हैं- असम की आजादी और सामाजिक सरकार बनाना। असम में उल्फा ने सेना पर कई आतंकवादी हमले किए। इसके माओवादी, नक्सलवादी और नेशनल सोशलिस्ट काउंसिल ऑफ नगालैंड जैसे उग्रवादी संगठनों से संबंध हैं। हाल के दिनों में इस संगठन के कई बड़े नेताओं को गिरफ्तार किया गया है।
एनडीएफबी : 1989 से अस्तित्व में आया। इसे बोडो सुरक्षा बल भी कहा जाता है। यह असम से अलग बोडोलैंड की मांग कर रहा है।

नगालैंड
एनएससीएन (आईएम)
: नेशनल सोशलिस्ट काउंसिल ऑफ नगालैंड का ही हिस्सा है। एनएससीएन (आईएम) 1980 से सक्रिय है। यह संगठन मणिपुर, नगालैंड और असम की उत्तरी काचार पहाडि़यों पर सक्रिय है। नगा आदिवासी समूह को भारत से आजाद करना चाहता है। इसका प्रभाव पूरे उत्तर-पूर्वी भारत में है। केंद्र सरकार ने इस संगठन के साथ शांति वार्ता की कोशिश भी की थी, लेकिन वह असफल हो गई। यह सुरक्षाबलों के खिलाफ हिंसा करता रहता है।
एनएससीएन (के) : 1988 में नेशनल सोशलिस्ट काउंसिल आॠफ नगालैंड से अलग होकर बना। एस.एस. खपलांग इसका मुखिया है। इसका मुख्य उद्देश्य वृहद नगालैंड की स्थापना है। यह संगठन नगालैंड से जुड़े भारतीय और म्यांमार के राज्यों को नगालैंड में शामिल करना चाहता है। इसके सदस्यों की संख्या 2000 है।

त्रिपुरा 
एटीटीएफ
: ऑल त्रिपुरा टाइगर फोर्स (एटीटीएफ) 1990 में सामने आया। यह संगठन बंगाली भाषी प्रवासियों के खिलाफ अभियान चलाता है।
एनएलएफटी : 1989 से सक्रिय। बांग्लादेश और भारत के अन्य हिस्सों से त्रिपुरा में गए प्रवासियों के खिलाफ अभियान चलाता है।

मेघालय
एएनवीसी : यह मेघालय के गारो हिल्स की स्वतंत्रता के लिए अभियान चलाता है।
जीएनएलए : गारो नेशनल लिबरेशन आर्मी (जीएनएलए) 2009 में अस्तित्व में आया।
मेघालय में इनके अलावा उल्फा, एनडीएफबी जैसे अलगाववादी संगठन काफी सक्रिय हैं।

मिजोरम
एचपीसी (डी) : हमर पीपुल्स कंवेंशन-डेमोक्रेसी 1995 में अस्तित्व में अया। यह उत्तर-पूर्वी भारत में हमर राज्य को अलग करना चाहता है। यह संगठन हमर लोगों के लिए उत्तर-पूर्व के अन्य राज्यों असम, मणिपुर, त्रिपुरा और मेघालय में भी अभियान चलता है।

अरुणाचल प्रदेश
एनएलसीटी
: यह असम-अरुणाचल प्रदेश की सीमा पर सक्रिय है। यह संगठन तनी लोगों ने बनाया है। यह अलग तनीलैंड की मांग कर रहा है।
 

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