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विश्व पर्यावरण दिवस: नहीं संभले तो कम पड़ जाएगी धरती...!

विश्व पर्यावरण दिवस: नहीं संभले तो कम पड़ जाएगी धरती...!

इस बार का विश्व पर्यावरण दिवस बड़ी चेतावनी दे रहा है। अगर दुनियाभर में प्राकृतिक संसाधनों का सोच-समझकर और संभलकर उपयोग नहीं किया गया, तो धरती लोगों की जरूरतों को पूरा नहीं कर पाएगी। संयुक्त राष्ट्र ने इस बार विश्व पर्यावरण दिवस की थीम ही प्राकृतिक संसाधनों का प्रबंधन और संभलकर इनका इस्तेमाल करने को बनाया है। क्या है अभी स्थिति और भविष्य में क्या होगा, आइए नजर डालते हैं-

1. जल
- दुनिया में तीन प्रतिशत से भी कम पानी पीने लायक है। इसमें भी 2.5 फीसदी अंटार्टिका, आर्कटिक बर्फ और ग्लेशियरों के रूप में है।
- आज भी एक अरब से ज्यादा लोगों को पीने का पानी नसीब नहीं है।
- 2030 तक वैश्विक स्तर पर पानी की मांग आपूर्ति के मुकाबले 40 फीसदी ज्यादा हो जाएगी।
- 1900 के मुकाबले 2010 में पानी की खपत 600 अरब क्यूबिक मीटर से बढ़कर 4,500 अरब क्यूबिक मीटर हो गई।

2. जमीन
- भूमि की उपलब्धता में कमी, मृदा उर्वरता में कमी, बेहिसाब पानी इस्तेमाल ऐसे कारण हैं जो खाद्य आपूर्ति के लिए जिम्मेदार प्राकृतिक संसाधनों की क्षमता को कम करते हैं।
- खेती-पाती में 50 प्रतिशत वैश्विक भूमि और 70 फीसदी वैश्विक जल उपयोग होता है।
- शहरियों की संख्या 2010 तक 50 प्रतिशत तक थी। यह 2050 में 70 फीसदी हो जाएगी। लिहाजा कृषि भूमि और उर्वर मृदा का क्षेत्रफल घट जाएगा।
- शहरीकरण और आय बढ़ने से खान-पान बदल रहा है। इससे प्रसंस्कृत खाद्य और पशु आधारित खान-पान पर निर्भरता बढ़ रही है। ऐसे में और कृषि भूमि की आवश्यकता होगी। - अनुमान है कि 2050 तक दुनिया में कृषि भूमि में 20 से 55 प्रतिशत वृद्धि की जरूरत होगी।

3. ऊर्जा
- 1.2 अरब से ज्यादा लोग दुनिया में ऐसे हैं जिन्हें बिजली नसीब नहीं है।
- 1990 से 2010 के बीच ऊर्जा दक्षता में प्रगति होने से वैश्विक ऊर्जा मांग में 25 प्रतिशत कमी दर्ज की गई है।
- ऊर्जा दक्षता यंत्रों और उपकरणों को अपनाकर छह शीर्ष उत्पाद क्षेत्रों में बिजली की वैश्विक मांग में 2500 टेरावाट-घंटे की कमी की जा सकती है, जो कि वैश्विक उपयोग का 10 प्रतिशत होगी।
- दक्षता उपकरण और यंत्र कार्यक्रम के जरिये बिजली बचाने की कोशिश 600 बड़े ऊर्जा संयंत्रों के बराबर होने का अनुमान है।
- ऊर्जा दक्षता के बावजूद 2020 तक ओईसीडी देशों में ऊर्जा का 35 प्रतिशत तक बढ़ जाएगा।

4. खाद्य
- 1.3 अरब टन खाद्य प्रतिवर्ष बेकार जाता है। एक अरब लोग अल्पपोषित रह जाते हैं जबकि एक अरब भूखे।
- जरूरत से ज्यादा खाने की आदत के कारण स्वास्थ्य और पर्यावरण पर प्रभाव पड़ता है।
- 1.5 अरब लोग अधिक वजनी हैं या मोटापे का शिकार हैं।
- विश्व की कुल ऊर्जा खपत में खाद्य क्षेत्र की हिस्सेदारी 30 फीसदी है। साथ ही कुल ग्रीनहाउस गैस उत्सर्जन में इसकी हिस्सेदारी 22 प्रतिशत है।

5. खनिज
- प्राकृतिक संसाधनों जैसे खनिज पदार्थों का दोहन बढ़कर 60 अरब टन प्रति वर्ष हो चुका है।
- अगर विकसित देशों की खपत को मानक मान लें तो 2050 तक इनका दोहन 140 अरब टन सालाना पर पहुंच जाएगा।
- विकासशील देशों में आर्थिक विकास और शहरीकरण के कारण एक से तीन अरब मध्य वर्ग के उपभोक्ता विकसित देशों के स्तर पर खपत करने में सक्षम होंगे।
- 2009 में इस्पात का वैश्विक उत्पादन 1.2 अरब टन था। इस मामले में एल्यूमिनियम और तांबा क्रमश: दूसरे और तीसरे स्थान पर यानी इनका उत्पादन 30 मिलियन और 24 मिलियन टन था।

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