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Hindi Newsवो अमेरिकी जिसने हिमाचल को दिए सेब और लड़ी आज़ादी की लड़ाई

वो अमेरिकी जिसने हिमाचल को दिए सेब और लड़ी आज़ादी की लड़ाई

वो आदमी जो भारत के लिए लड़ा भारत के स्वाधीनता संग्राम में हिस्सा लेने वाले बहुत कम विदेशी नाम हैं। एनी बेसेंट को छोड़ दें तो बड़े नेताओं में ऐसे नाम कम ही जेहन में आते हैं। इन्हीं में से एक नाम

लाइव हिन्दुस्तान टीमSun, 14 Aug 2016 02:55 PM

वो आदमी जो भारत के लिए लड़ा

भारत के स्वाधीनता संग्राम में हिस्सा लेने वाले बहुत कम विदेशी नाम हैं। एनी बेसेंट को छोड़ दें तो बड़े नेताओं में ऐसे नाम कम ही जेहन में आते हैं। इन्हीं में से एक नाम है अमेरिकी नागरिक सैमुएल एवान स्टोक्स उर्फ़ सत्याननंद स्टोक्स का। सैमुएल ही वो आदमी हैं जिन्होंने हिमाचल को सेब दिए और भारत के स्वाधीनता संग्राम में महात्मा गांधी को पूरा सहयोग दिया। 

कौन थे सैमुअल
साल 1904 में 22 साल की उम्र में सैमुएल शिमला आए थे। असल में सैम के पिता अमेरिका में एक सफल बिजनेसमैन थे लेकिन सैम का बिजनेस में कोई इंटरेस्ट नहीं था। सैम ने भारत आकर लैप्रोसी से जूझ रहे मरीजों की सेवा करने का रास्ता चुना। वो माता-पिता की मर्जी के खिलाफ शिमला के सूबाथू आ गए। कुछ दिनों तक उनका माता-पिता से कनेक्शन टूट गया लेकिन बाद में उन्हें एहसास हुआ कि बेटा बेहद अच्छा काम कर रहा है और उन्होंने उसकी आर्थिक सहायता शुरू कर दी। इधर सैम ने जब गांव में बसे भारतीयों की गरीबी को देखा तो उनकी मदद करने की ठान ली। गांव वाले भी उन्हें 'ईसाई सन्यासी' कहकर बुलाने लगे। 

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शिमला को ऐसे दिए सेब

सैम को जल्दी ही समझ में आ गया था कि लोगों की दिक्कत सिर्फ बीमारी नहीं बल्कि गरीबी है। इसी गरीबी को देखते हुए सैम ने हिमाचल की जलवायु के अनुकूल सेबों की खेती करने की ठानी। साल 1916 में सैम ने फिलेडेल्फिया से सेब के कुछ पौधे और बीज मंगाए। सैम का ये कदम हिमाचल के लिए एक आर्थिक क्रांति की शुरुआत था। बता दें कि स्टोक्स के लिए ये आसन नहीं था कि किसानों को सेब की खेती के लिए मनाया जाए। असल में सेब का एक पेड़ बोये जाने के छह साल बाद ही फल देना लायक होता है। किसानों का कहना था कि सेब बो देंगे तो छह साल तक खायेंगे क्या। सैम को अपने इस काम की वजह से ही 'Johnny Appleseed of the Himalayas' कहकर भी बुलाया जाता है। 

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ऐसे बने फ्रीडम फाइटर और गांधी के साथी

इसी दौरान सैम को ये भी एहसास हुआ कि भारत की उन्नति के लिए उसकी आज़ादी कितनी ज़रूरी है। उन्होंने भारत की आज़ादी के समर्थन में अख़बारों में लिखना भी शुरू कर दिया था। जब सैम भारत की आज़ादी का समर्थन कर रहे थे उसी दौरान उनकी मुलाक़ात गांधी से हुई। असल में गांधी के दोस्त सीएफ एंड्रयूज और स्टोक्स के दादाजी अच्छे दोस्त थे और इसी के चलते गांधी से सैम की मुलाक़ात हुई। साल 1919 में अप्रैल महीने में जलियावाला बाग़ हत्याकांड हुआ जिससे सैम को गहरा आघात पहुंचा और उन्होंने कांग्रेस ज्वाइन करने का फैसला कर लिया। 

वो कांग्रेस में काफी एक्टिव रहे और उन्हें पंजाब प्रोविंस कमिटी का मेंबर बना दिया गया। गांधी ने भी सैम की सक्रियता देखकर उन्हें सभी मीटिंग्स में बुलाना शुरू कर दिया। सैम इस दौरान कई बार गिरफ्तार भी हुए और महीनों जेल में भी बिताये। जेल में भी भारतीयों और यूरोपीयन को अलग -अलग सेल में रखा जाता था लेकिन उन्होंने इस स्पेशल ट्रीटमेंट के लिए भी मना कर दिया। उन्होंने भारतीय लड़की से शादी की और एंग्लो इंडियन की जगह भारतीय कहलाना पसंद किया। साल 1932 में उन्होंने हिंदू धर्म अपना लिया और अपना नाम भी सैमुएल से बदलकर सत्यानंद रख लिया। वो जीवन भर आज़ादी के लिए लड़ते रहे और साल 1946 में 63 साल की उम्र में बीमार होकर चल बसे। 

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