सीताराम येचुरी बन सकते हैं माकपा के महासचिव
चुनावों में लगातार हार और सिमटते जनाधार के बीच मंगलवार से माकपा की विशाखापट्टनम में शुरू हो रही 12वीं कांग्रेस में पार्टी को नई चुनौतियों से जूझने के लिए एक नया चेहरा देने की कवायद शुरू हो रही है।...

चुनावों में लगातार हार और सिमटते जनाधार के बीच मंगलवार से माकपा की विशाखापट्टनम में शुरू हो रही 12वीं कांग्रेस में पार्टी को नई चुनौतियों से जूझने के लिए एक नया चेहरा देने की कवायद शुरू हो रही है। पार्टी कांग्रेस में नए महासचिव का चुनाव होना है जिसमें वरिष्ठ नेता सीताराम येचुरी दौड़ में सबसे आगे हैं। हालांकि केरल के ही वरिष्ठ नेता एस. रामचंद्रन पिल्लई भी इस पद के प्रबल दावेदार हैं लेकिन अन्य दलों की भांति माकपा में भी अपेक्षाकृत ‘जवान’ नेता की जरूरत महसूस की जा रही है।
पार्टी सूत्रों के अनुसार येचुरी का चुनाव जाने की संभावनाएं हैं। क्योंकि पश्चिम बंगाल, त्रिपुरा यूनिट के अलावा उन्हें हिन्दीभाषी राज्यों के डेलीगेट्स का समर्थन मिल रहा है। इधर, येचुरी केरल यूनिट से भी कुछ हद तक समर्थन लेने में सफल रहे हैं। महासचिव के चुनाव के लिए 749 पार्टी डेलीगेट्स का गुप्त मतदान होता है जिसमें से करीब साढ़े तीन सौ डेलीगेट्स अकेले केरल हैं। येचुरी केरल के डेलीगेट्स में सेंध लगाने में सफल रहे हैं।
माकपा में महासचिव का पद शीर्ष होता है। प्रकाश करात अपने तीन टर्म का कार्यकाल पूरा कर चुके हैं। तीन साल का कार्यकाल भी करात के ही कार्यकाल में तय हुआ था जो महासचिव के लिए ही नहीं बल्कि सभी पदों के लिए है। अब अगले तीन साल येचुरी के माने जा रहे हैं। पिछले चुनावों में पार्टी के हार के कारणों और कामरेड करात की नीतियों पर येचुरी सवाल उठाते रहे हैं। फिर येचुरी का सिर्फ 63 साल का होना, हिन्दी भाषी होना और लंबे समय से संसदीय राजनीति में सक्रिय होना भी उनके काम आ रहा है। जबकि पिल्लई 77 की उम्र पार कर चुके हैं और ज्यादातर राज्य की राजनीति में ही सक्रिय रहे हैं।
पार्टी सूत्रों के अनुसार दो अन्य संभावित उम्मीदवारों में त्रिपुरा के मुख्यमंत्री माणिक सरकार एवं तथा केरल के बी. वी. राघवुलु हो सकते हैं। लेकिन इसके आसार कम हैं, उन्हें डेलीगेट्स का अपेक्षित समर्थन भी नहीं है। बहरहाल, 19 अप्रैल को तय होगा कि माकपा की कमान किसके हाथों होगी।
सीपीएम
पिछले लोकसभा चुनावों में लगातार सीटें घटने और केरल एवं पश्चिम बंगाल के विधानसभा चुनावों में हार के बावजूद पार्टी इन राज्यों में अभी भी मजबूती से सक्रिय है। मजदूर संगठनों के बीच पार्टी का नेतृत्व देश के अन्य हिस्सों में भी कायम है।
जहां-जहां भी बड़े उद्योग धंधे हैं, उनकी यूनियनों में पार्टी डटी हुई है। पार्टी मजदूरों के मुद्दों, नई आर्थिक नीतियों के खिलाफ लगातार आवाज उठा रही है। उसकी कितनी सुनी जा रही है, यह दीगर बात है।
सत्ता
-अभी सिर्फ त्रिपुरा ही इस समय एकमात्र राज्य है जहां पार्टी की सरकार है। त्रिपुरा के मुख्यमंत्री माणिक सरकार अपनी सादगी और ईमानदारी के लिए जाने जाते हैं। पश्चिम बंगाल में करीब 35 साल पार्टी ने शासन किया। जबकि केरल में भी उसकी सरकारें रही हैं। पार्टी को सबसे ज्यादा वोट 2004 के चुनाव में 5.66 मिले थे तब पार्टी ने लोकसभा की सबसे ज्यादा 43 सीटें जीती थीं।
गठन
-कम्युनिस्ट पार्टी ऑफ इंडिया (सीपीआई) से टूटकर 1964 में माक्र्सवादी कम्युनिस्ट पार्टी (सीपीएम) का गठन हुआ।
संगठन
पार्टी का संगठन तीन राज्यों पश्चिम बंगाल, केरल और त्रिपुरा में ही मजबूत है। हालांकि इसके पार्टी और इसके सहयोगी संगठन सभी राज्यों में सक्रिय हैं।
सदस्य
सीपीएम के सदस्य संख्या-1065406 (2013)। देश के हर राज्य में पार्टी के सदस्य हैं। इसलिए चुनाव आयोग में पार्टी को राष्ट्रीय दर्जा है।
मुखपत्र
पीपुल्स डेमोक्रेसी (अंग्रेजी में) लोक लहर (हिन्दी में)
शाखाएं
पार्टी की युवा शाखा-स्टुडेंट फेडरेशन ऑफ इंडिया
युवा शाखा- डेमोक्रेटिक यूथ फेडरेशन ऑफ इंडिया
किसान शाखा-ऑल इंडिया किसान सभा
श्रम शाखा-सेंटर ऑफ इंडियन ट्रेड यूनियन (सीटू)
मजदूर यूनियन-ऑल इंडिया एग्रीकल्चर लेबर यूनियन
महिला शाखा-आल इंडिया डमोक्रेटिक वीमेन्स एसोसिएशन
संसद में नेता
लोकसभा नेता-पी. करुणाकरन
राज्यसभा नेता-सीतराम येचुरी
संसद में संख्याबल
लोकसभा-9
राज्यसभा-9
नेतृत्व
स्थापना के बाद से पार्टी के अब तक चार महासचिव रहे हैं
पी. सुंदरैय्या (1964-78)
ईएमएस नंबूदिरीपाद (1978-92)
हरिकिशन सिंह सुरजीत (1992-2005)
प्रकाश करात (2005-2015)
पार्टी का संविधान
पाटी कांग्रेस की बैठक में केंद्रीय समिति चुनी जाती है और केंद्रीय समिति पोलित ब्यूरो का चुनाव करती है। केंद्रीय समिति के सदस्यों की संख्या 95 और पोलित ब्यूरो की 15 है। इसके नीचे राज्य, जिला, क्षेत्र, लोकल तथा शाखा समितियां होती हैं। पोलित ब्यूरो फैसले लेता है।
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