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बिहार चुनाव में अब होगी सीधी लड़ाई

बिहार चुनाव में अब होगी सीधी लड़ाई

बिहार में आसन्न विधान सभा का चुनाव दो महागठबंधनों के बीच होने के आसार बन रहे हैं। सोमवार को दिल्ली में नीतीश कुमार को राजद-जदयू गठबंधन का नेता घोषित किए जाने के बाद यह तय हो गया कि जदयू, राजद और कांग्रेस में एक बार फिर महागठबंधन होगा। इस ऐलान के बाद अब पूर्व मुख्यमंत्री जीतन राम मांझी और राजद के बागी सांसद राजेश रंजन उर्फ पप्पू यादव पर तो दूसरी तरफ समान रूप से भाजपा पर दबाव बढ़ गया है। इसकी संभावना ज्यादा बढ़ गई है कि मांझी और पप्पू अब भाजपा से गठबंधन करें। भाजपा ने इनके लिए पहले से दरवाजा खोल रखा है। अगर ऐसा होता है तो दो महागठबंध आमने-सामने होंगे। यानी बिहार का चुनाव न केवल दिलचस्प होगा, बल्कि यहां कांटे की टक्कर भी होगी।

लोकसभा सभा चुनाव से ऐन पहले भाजपा ने काफी समझदारी दिखाई थी। उसने दलित आधार वाली लोजपा और एक खास पिछड़ा वर्ग के आधार वाली रालोसपा से गठबंधन कर लिया। बिहार के सामाजिक समीकरण और उस समय के राजनीतिक परिदृश्य की कसौटी पर यह एक मजबूत किलेबंदी थी। दूसरी तरफ जदयू और सीपीआई का गठबंधन था तो कांग्रेस और राजद साथ थे। कांग्रेस के खिलाफ नाराजगी थी तो दिल्ली में नीतीश कुमार की भूमिका को लेकर तस्वीर साफ नहीं थी। ऐसे में समाजवादी और धर्मनिरपेक्ष मतों का बिखराव हुआ।

नरेन्द्र मोदी की लहर के कारण मतदाताओं के बड़े हिस्से को भाजपा गठबंधन के पक्ष में गोलबंद होने में कोई परेशानी नहीं हुई। लेकिन लोकसभा चुनाव के तुरंत बाद हुए बिहार विधान सभा की दस सीटों के उपचुनाव में जदयू, राजद और कांग्रेस महागठबंधन ने आकार लिया और इसने भाजपा को तगड़ा झटका दिया था। महागठबंधन ने न केवल आसानी से छह सीटें जीत ली थी, बल्कि दो सीटों पर करीब की चुनौती भी दी थी। जाहिर, है भाजपा पर समानांतर महागठबंधन को आकार लेने का दबाव है और इस कारण वह कुछ नए साथियों को जोड़ने का प्रयास करेगी।

उधर, जीतन राम मांझी और पप्पू यादव जदयू और राजद के बीच गठबंधन पर फैसले का इंतजार कर रहे थे। राजद अध्यक्ष लालू प्रसाद ने तो कह भी दिया था कि भाजपा के खिलाफ  गठबंधन में मांझी भी शामिल हों। यह बात जदयू को नागवार गुजरी थी। इसके बाद से गठबंधन की डोर कमजोर पड़ने लगी थी। दोनों तरफ से तीखे बयानों के दौर भी चले। उस दौरान मांझी पत्ते नहीं खोल रहे थे। एक तरफ वह कह रहे थे कि अगर लालू उन्हें नेता स्वीकार कर लें तो वह उनके साथ जाने को तैयार हैं, लगे हाथ यह भी दावा कर रहे थे कि गठबंधन के लिए वह बिहार भाजपा के नेताओं से बात नहीं करेंगे।
उनका इशारा सीधे प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी से बात करने की तरफ था। पप्पू यादव भी इसी ताक में थे कि अगर जदयू-राजद गठबंधन नहीं हुआ तो धर्मनिरपेक्षता के नाम पर वह जदयू और कांग्रेस गठबंधन में अपनी जगह तलाशेंगे। लेकिन अब इन दोनों नेताओं के पास भाजपा के अलावा अकेले दम पर चुनाव में जाने का विकल्प बचा है। वैसे भाजपा से बात नहीं बनने पर मांझी और पप्पू साथ हो सकते हैं।

बिहार में महागठबंधन को नीतीश कुमार की छवि, लालू प्रसाद की गवई हुंकार और कांग्रेस के मध्यमार्गी चेहरे का लाभ मिलेगा। लोकसभा चुनावों में इन तीनों दलों के वोट का औसत 45. 42 फीसदी था। भाजपा, लोजपा और रालोसपा को करीब 40 फीसदी वोट पड़े थे। जबकि लोकसभा चुनावों में दो राष्ट्रीय गठबंधनों में लड़ाई में जदयू के वोट बिखर गए थे और मुस्लिम वोट भी बंटे थे। इस आईने में जदयू महागठबंधन का पलड़ा भारी है।

विधानसभा चुनाव में नीतीश कुमार एक बड़ा फैक्टर होंगे। उनकी बराबरी का कोई नेता बिहार भाजपा के पास नहीं है। तीसरा बिहार में बदलाव का श्रेय उनके खाते में है। अभी वाम दलों को साथ लाने का विकल्प भी बचा है। लेकिन इस महागठबंधन के दलों की सबसे बड़ी चुनौती अपने-अपने वोट सहयोगी दलों के उम्मीदवारों के खाते में ट्रांसफर कराना होगा। जदयू और कांग्रेस के लिए यह मुश्किल काम नहीं होगा, लेकिन राजद और जदयू के बीच यह एक चुनौती हो सकती  है। इसके लिए दोनों दलों को कड़ी मशक्कत करनी पड़ सकती है।

भाजपा की मुश्किल ये है कि वह मुख्यमंत्री उम्मीदवार घोषित करने से परहेज कर रही है। किसी एक नाम पर सहमति बनाना मुश्किल भी है। वैसे सुशील कुमार मोदी और नंदकिशोर यादव प्रदेश के बड़े नेताओं में हैं। भाजपा नरेन्द्र मोदी के नाम पर ही चुनाव में जाने का फैसला कर सकती है। इसके अलावा मांझी और पप्पू को साथ लाकर वह जदयू और राजद के वोट में सेंध लगाने की कोशिश कर सकती है, लेकिन इसका नुकसान भी हो सकता है। मांझी का मुख्यमंत्री कार्यकाल और पप्पू का अतीत उसका पीछा कर सकता है।

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