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PHOTO उत्तराखंडः इन 5 जगहों पर मना सकते हैं गर्मियों की छुट्टियां

PHOTO उत्तराखंडः इन 5 जगहों पर मना सकते हैं गर्मियों की छुट्टियां

गर्मियों की छुट्टियां होने वाली हैं और अब आप प्लान बनाएंगे पहाडों पर घूमने का, चलिए हम आपको उत्तराखंड की उन 5 जगहों के बारे में बताते हैं जो ना तो आपकी जेब पर भारी हैं और इन वादियों में मजा भी भरपूर आता है। तो लीजिए जान लीजिए इन जगहों के बारे में बेहद खास बातें- 

1. सैर-सपाटे और मंदिरों के दर्शन के लिए अल्मोड़ा-रानीखेत आपको बुला रहा है
उत्तराखंड के कुमाऊं रीजन का राजनीतिक और सांस्कृतिक केन्द्र रहा अल्मोड़ा के नजारे दर्शनीय हैं और इसके आसपास भी सैर-सपाटे की कई जगहें पर्यटकों को यहां खींचे ले आती हैं। 

अल्मोड़ा से कुछ दूरी में ही चितई मंदिर है जिसके दर्शन कर वापिस अल्मोड़ा लौटा जा सकता है। इस मंदिर में भक्तों द्वारा चढ़ाई गई छोटी-बड़ी हजारों पीतल की घंटियां है। चितई मंदिर से सूर्योदय और सूर्यास्त का नजारा बहुत खास दिखता है।

 

अल्मोड़ा से करीब 35 किलोमीटर की दूरी है जागेश्वर मंदिर है। यहां के मुख्य मंदिर का निर्माण 8वीं और 9वीं सदी में हुआ था। जागेश्वर मंदिर की मान्यता है कि शिव के 12 ज्योतिर्लिंगों में से एक यहां पर है। महाभारत में भी इस जगह का उल्‍लेख है। जागेश्‍वर मंदिर खूबसूरत घाटी में बसा है।

इसके अलावा अल्मोड़ा का बाजार यहां की शान है। कसार देवी की सुंदरता से मोहित होकर आपको घर लौटने का मन ही नहीं करेगा। नंदा देवी मंदिर भी अल्‍मोड़ा का सांस्कृतिक और धार्मिक केंद्र है।

अल्मोड़ा से करीब 50 किलोमीटर की दूरी पर चीड़ और बांज के पेड़ों के बीच बसा रानीखेत मनमोहक नजारों के जाना जाता है। रानीखेत में भारतीय सेना की कुमाऊं रेजीमेंट का हेडक्‍वार्टर है। यहां कुमाऊं रेजीमेंट का म्‍यूजियम और खूबसूरत गोल्‍फ कोर्स भी देखने लायक हैं। 

हिमालय की चोटियों को नजदीक से देखने के लिए आप अल्मोड़ा से 30 किमी की दूरी पर बिनसर जा सकते हैं। बिनसर में बांज और बुरांश के पेड़ों के घने जंगल में आप फोटोग्राफी का भी मजा ले सकते हैं। बिनसर का मंदिर भी बहुत प्रसिद्व है। 

अल्मोड़ा और रानीखेत के बीच बसा शीतला खेत फलों के बगीचों के लिए मशहूर है। शीतला खेत रानीखेत से करीब 31 किमी और अल्‍मोड़ा से करीब 42 किमी दूर है। शीतला खेत से करीब 3 किमी दूर पहाड़ी रास्‍ते पर स्‍याही देवी का खूबसूरत मंदिर है। स्‍वतंत्रता सेनानी और उत्तर प्रदेश के पहले मुख्‍यमंत्री गोविंद बल्‍लभ पंत का जन्‍म स्‍थान खूंट यहां से बेहद करीब है।

2. बागेश्वर और कौसानी के ये नजारे भी यादगार रहेंगे
बागेश्‍वर में धार्मिक पर्यटन के लिए तो देश-विदेश से लोग आते ही हैं, इसके साथ ही यहां एडवेंचर टूरिज्‍म के शौकीन भी डेरा डाले रहते हैं। कोई कौसानी और बागेश्‍वर की खूबसूरती से मोहित होकर यहां आता है तो किसी को पिंडारी ग्‍लेशियर का रोमांच बुला लाता है। इनके अलावा भी बागेश्‍वर में कई ऐसी सैर-सपाटे की जगहें हैं जिनकी तरफ पर्यटक चले आते हैं।

पिंडारी ग्‍लेश‍ियर: यह विश्व प्रसिद्ध ग्लेशियर नंदा देवी और नंदा कोट पहाड़ों के बीच 3,353 मीटर (11,001 फीट) की ऊंचाई पर पिंडर घाटी में स्थित है। ट्रेकिंग के शौकीनों के लिए इसे स्‍वर्ग कहा जा सकता है, क्‍योंकि हिमालय के तमाम ग्‍लेशियरों में यहां पहुंचना और ट्रेकिंग करना सबसे आसान है। पिंडारी ग्‍लेशियर का आधार शिविर (बेस कैंप) जिला मुख्‍यालय बागेश्‍वर से सड़क मार्ग से 36 किमी, अल्‍मोड़ा से 109 किमी है।

सुंदरढूंगा ग्लेशियर: सुंदर पत्‍थरों की घाटी भी पिंडर क्षेत्र में ही स्थित है। पिंडारी और कफिनी ग्‍लेशियर के मुकाबले सुंदरढूंगा की ट्रेकिंग करना कठिन है। सुंदरढूंगा ग्‍लेशियर का आधार शिविर (बेस कैंप) सॉन्‍ग है और यह जिला मुख्‍यालय बागेश्‍वर से सड़क मार्ग से 36 किमी, अल्‍मोड़ा से 109 किमी है।

कौसानी: कौसानी अल्‍मोड़ा से करीब 52 किमी की दूरी पर बसा है जबकि जिला मुख्‍यालय बागेश्वर से 42 किमी. व बैजनाथ से 16 किमी. दूर है। कौसानी हिमालय की चोटियों और ग्‍लेशियर के बेहद नजदीकी नजारों और हरियाली के लिए मशहूर है। कौसानी के सामने मशहूर कत्‍यूर घाटी फैली है और यहां से सूर्योदय और सूर्यास्‍त का अद्भुत नजारा दिखता है।

स्‍वतंत्रता आंदोलन के बीच 1929 में महात्‍मा गांधी ने भी यहां 14 दिन गुजारे थे। गांधी जी के यहां प्रवास की निशानी के रूप में यहां उनका अनाशक्‍ति आश्रम है। राष्‍ट्रपिता ने कौसानी को भारत का मिनी स्वीजरलैंड कहा जाता था। कौसानी मशहूर कवि सुमित्रानंदन पंत की जन्‍मस्‍थली भी है।

3. नैनीताल के इन नजारों को छोड़कर कहां जाओगे
नैनीताल उत्तराखंड और खासकर कुमाऊं क्षेत्र के पर्यटन की रीढ़ है। यहां एक से बढ़कर एक नजारे देखने को मिलते हैं। यहां नैनीताल, भीमताल और मुक्तेश्वर की ठंडी फिजाएं हैं तो कॉर्बेट नेशनल पार्क में बाघों की दहाड़ व हाथियों की चिंघाड़ भी है। यहां सुंदर ताल और उनमें स्वच्छंद विचरण करते हंसों के जोड़ों को देखा जा सकता है तो यहां की हसीन वादियों में अपने जीवन की नई शुरुआत करने (हनीमून मनाने) के लिए आए नए जोड़ों को भी देखा जा सकता है। सैर सपाटे के शौकीनों के लिए नैनीताल जिले में ऐसा बहुत कुछ है, जो उन्हें यहां बार-बार खींच लाता है।

वाटर स्पोर्ट्स के शौकीनों के लिए नैनीताल स्वर्ग से कम नहीं है। यहां का नैनीताल याट क्‍लब नौकायन परंपरा और विरासत को सहेजे हुए है। यहां हर साल राष्ट्रीय और क्षेत्रीय स्तर की नौका दौड़ होती हैं। गर्मी के मौसम में नैनीताल की झील में स्विमिंग कॉम्पटीशन भी होते हैं। इसके अलावा कैनोइंग और कयाकिंग प्रतियोगिता का आयोजन भी इस खूबसूरत झील में होते हैं। अगर आप स्काई एडवेंचर का लुत्फ लेना चाहते हैं तो नौकुचियाताल में पैरासैलिंग की सुविधा उपलब्ध है।

नैनीताल शहर दिल्ली से 320 किमी दूर है. जबकि यह अपने नजदीकी रेलवे स्टेशन काठगोदाम से 34 किमी दूर है।

नैनीताल की सात चोटियां नैनीताल की शोभा बढ़ाती हैं। यहां आने वाले सैलानी इनकी सैर करना नहीं भूलते। सात चोटियों में 2611 मीटर ऊंची चाइना पीक यहां की सबसे ऊंची चोटी है। चाइना पीक की दूरी नैनीताल से लगभग 6 किलोमीटर है। इस चोटी से हिमालय की ऊंची-ऊंची चोटियों (बंदर पूंछ, एपीआई और नेपाल की नारी पीक) के दर्शन होते हैं।


नैनीताल से केवल ढाई किलोमीटर और 2270 मीटर की ऊंचाई पर हवाई पर्वत चोटी है। मल्लीताल से रोपवे के माध्यम से यहां आसानी से जाया जा सकता है। यह चोटी ‘शेर का डाण्डा’ पहाड़ पर है। स्नोव्यू से लगी हुई दूसरी चोटी हनी-बनी है, जिसकी ऊंचाई 2179 मीटर है, यहां से भी हिमालय का सुंदर नजारा दिखता है।

नैनीताल का चिड़‍ियाघर बस अड्डे से करीब 1 किमी दूर समुद्र तल से 21 मीटर की ऊंचाई पर है. चिड़ि‍याघर में बंदर से लेकर हिमालय का काला भालू, तेंदुए, साइबेरियाई बाघ, पाम सिवेट बिल्ली, भेड़िया, चमकीले तितर, गुलाबी गर्दन वाले प्रकील पक्षी, पहाड़ी लोमड़ी, घोरल, हिरण और सांभर जैसे जानवर हैं।

नैनीताल आने वाले सैलानियों के लिए हॉर्स राइडिंग एक और आकर्षण है। यहां बारापत्थर से घोड़े किराए पर लेकर सैलानी नैनीताल की अलग-अलग चोटियों की सैर करते हैं।

इंग्लैंड के बकिंघम पैलेस की तर्ज पर बनाए गए राजभवन का निर्माण अंग्रेजों ने उत्तर-पश्चिमी क्षेत्र के गवर्नर के रहने के लिए किया था। अब यहां उत्तराखंड के राज्यपाल का निवास है और राज्य के अतिथ‍ि भी यहां आकर ठहरते हैं।

4. चमोली में ये खूबसूरत नजारे…
चमोली सुदूर उत्तरी जिला है और यहां के नजारे हर किसी को अपनी ओर खींचते हैं। फिर चाहे वह खूबसूरत फूलों की घाटी हो यहां, बद्रीनाथ के शानदार मंदिर। सिखों का धार्मिक स्थल हेमकुंड भी इस जिले में है और भविष्य बद्री, आदि बद्री जैसे मंदर भी यहां हैं। प्राकृतिक सुंदरता के इत‍िहास और आध्यात्म के लिए भी चमोली की यह धरती सैलानियों की लिस्ट में सबसे ऊपर जगह बनाती है।

भारत के चार प्रसिद्ध धामों में बद्रीनाथ सबसे ज्यादा प्रसिद्ध है। माना जाता है कि ब्रदीनाथ की स्थापना सतयुग में हुई थी, इसलिए इस धाम का वर्णन और गुणगान लगभग सभी प्रमुख शास्त्रों में पाया गया है

बद्रीनाथ दिल्ली से करीब 520 किमी, ऋष‍िकेश से 300, हरिद्वार से 325, देहरादून से करीब 346, जोशीमठ से 46 और औली ग्लेश‍ियर से करीब 60 किमी दूर है। बद्रीनाथ ही नीलकंठ जैसे कई पर्वतारोहण अभियानों का प्रवेशद्वार भी है। यह भारत-तिब्बत (चीन) बॉर्डर से सिर्फ 24 किमी दूर है।

हेमकुंड साहिब समुद्र तल से करीब 15000 फीट की ऊंचाई पर हिमालय की ऊंची पर्वत श्रृंखलाओं के बीच है। यह सिख तीर्थयात्रियों का मशहूर धार्मिक स्थल है।

हेमकुंड जाने के लिए यात्रियों को गोविंदघाट पहुंचना पड़ता है जो ऋष‍िकेश से 275 किमी दूर है। गोविंदघाट से 13 किमी की पैदल यात्रा करके श्रृद्धालु घांघरिया गांव पहुंचते हैं। घांघरिया में भी एक गुरुद्वारा है, यहां से 6 किमी लंबे पथरीले रास्ते पर 1100 मीटर की चढ़ाई के बाद हेमकुंड साहिब पहुंचा जा सकता है

औली ग्लेश‍ियर दुनियाभर के एडवेंचर टूरिस्ट के लिए किसी स्वर्ग से कम नहीं है। औली का बुग्याल हर मौसम में पर्यटकों को लुभाता है, लेकिन सर्दियों में औली की ढलानों पर गिरी सफेद बर्फ की चादर मन मोह लेती है। 

औली सड़कमार्ग द्वारा जोशीमठ से 16 जबकि रोपवे से सिर्फ 4 किमी दूर है। दिल्ली से औली 505 किमी, हरिद्वारा से 289, देहरादून से 316 किमी दूर है। 

यहां से हिमालय पर्वत का बेहद खूबसूरत नजारा दिखता है। यहां से नंदा देवी, कामेट और दूनागिरी जैसे पर्वत साफ नजर आते हैं। आम तौर पर जनवरी से मार्च के बीच औली की ढलानों पर बर्फ की 3 मीटर तक मोटी चादर बिछ जाती है। अंतरराष्ट्रीय स्तर के अनुसार यह स्कीइंग के लिए बहुत अच्छी जगह है। यहां विंटर गेम्स फेडरेशन ऑफ इंडिया राष्ट्रीय स्तर की चैंपियंनश‍िप भी आयोजित करता है।

5. टिहरी के इन मनमोहक नजारों में मग्न हो जाएगें आप
टिहरी जिले में खूबसूरत नजारों की कोई कमी नहीं है। यहां मानव निर्मित करीब 53 वर्ग किमी की झील है तो बूढा केदार, देवप्रयाग, चंद्रबदनी और सुरकंडा देवी जैसे तीर्थ स्थान भी हैं। यहां से हिमालय की बर्फ से ढकी ऊंची-ऊंची चोटियों के दर्शन भी होते हैं। दूसरी तरफ इसी सीमाएं भाबर क्षेत्र के मैदानी इलाके के ऋष‍िकेश तक जाती हैं। चम्बा और धनोल्टी में सालभर पर्यटकों का जमावड़ा रहता है।

टिहरी गढ़वाल में दर्शनीय स्थान खूब हैं और यह सैर-सपाटे के शौकीनों के लिए बहुत कुछ पेश करता है। यहां भागीरथी नदी पर बना देश का सबसे ऊंचा टिहरी बांध भी है, जो धीरे-धीरे पर्यटकों के लिए आकर्षण का केंद्र बनता जा रहा है।

पुराने टिहरी शहर के पूरी तरह से बांध की झील में समाने से पहले ही यहां के लोगों को नई टिहरी में बसाया गया है। समुद्र तल से 1550 और 1950 मीटर के बीच बसा यह शहर सुनियोजित तरीके से बसाया गया है।

नई टिहरी चंबा से करीब 11 किमी दूर है। बड़ी ही खूबसूरती से सुनियोजित तरीके से बसाई गई नई टिहरी जिला मुख्यालय भी है। यहां से टिहरी बांध और उसकी मानव निर्मित करीब 53 वर्ग किमी की झील का सुंदर नजारा देखा जा सकता है।

हिमाचल ही नहीं उत्तराखंड में भी चम्बा है। समुद्र तल से चम्बा की ऊंचाई 1676 मीटर है। यहां से कुदरत की कारीगरी का खूबसूरत काम देखा जा सकता है। मसूरी से चम्बा करीब 60 किलोमीटर और नरेन्द्र नगर से करीब 48 किलोमीटर दूर है। चम्बा अपने मीठे सेब के बागानों के लिए भी मशहूर है। अगर आप सीजन में यहां आएं तो रसीले सेब का मजा लेना न भूलें। यहां से बर्फ से ढके हिमालय और भगीरथी घाटी का नजारे का भी आनंद उठाया जा सकता है।

धनोल्टी टिहरी गढ़वाल के सबसे प्रसिद्ध पर्यटक स्थलों में से एक है। यहां की खूबसूरती और सुकून भरे वातावरण का लुत्फ लेने के लिए मैदानी इलाकों से साल भर पर्यटक आते रहते हैं।

यह इलाका बांज, देवदार और सदाबहार पौधों से घिरा हुआ है। शहर की दौड़ती-भागती जिंदगी से से सुकून पाने के लिए यहां आने वाले पर्यटकों की कमी नहीं है। धनोल्टी आपके लिए बेहद सुकून भरा साबित हो सकता है। छुट्टियां बिताने और पिकनिक के लिए यह उत्तम जगह । चारों ओर से जंगलों और बर्फ से ढके पर्वतों को देखकर पर्यटक अपनी सारी चिंताएं भूल जाते हैं।

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