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देहरादून के लिए विशेष ध्यानार्थ : कालागढ़ में ध्वस्तीकरण की तैयारी, आवासों पर लगाए गए लाल निशान

एनजीटी के आदेश के बाद कालागढ़ में प्रशासन द्वारा बेदखली तथा ध्वस्तीकरण को लेकर कार्रवाई में तेजी आने के बाद क्षेत्र में हड़कंप मच गया है। ध्वस्तीकरण के लिए चिह्नित आवासों पर लाल निशान लगाने का काम शुरू होने के बाद अफरातफरी का माहौल है। उधर सामाजिक तथा राजनीतिक कार्यकर्ताओं ने ध्वस्तीकरण की कार्रवाई रोके जाने की दिशा में प्रयास शुरू कर दिये हैं।

प्रशासन द्वारा एनजीटी के आदेशों का हवाला देते हुये यहां स्थित कालागढ़ डैम परियोजना की आवासीय कालोनियों को खाली कराकर कार्बेट प्रशासन को सौंपे जाने की कवायद शुरू कर दी गई है। प्रशासन के निर्देश पर गुरुवार को राजस्व विभाग ने बेदखली के लिए चिह्नित कर आवासों पर लाल निशान लगाने का काम शुरू कर दिया है। इस संबंध में कोटद्वार के तहसीलदार एचएम खंडूरी का कहना है कि विधानसभा चुनावों के मद्देनजर प्रशासन द्वारा यह कार्रवाई स्थगित कर दी गई थी, जिसको दोबारा शुरू किया गया है।उन्होंने कहा कि दो दिन पहले जिलाधिकारी की अध्यक्षता में आयोजित आला अधिकारियों की बैठक में लिये गये निर्णय के मुताबिक यहां स्थित आवासों को चिह्नित करने के बाद बेदखल करके वन विभाग को सौंपे जाने संबंधी कार्यावाही के तहत आवासों को चिह्नित किया जा रहा है। उधर राजस्वकर्मियों की टीम द्वारा आवासों पर लाल निशान लगाने का काम शुरू होने से यहां हड़कं मच गया है। भाजपा के नगरमंडल अध्यक्ष राजकुमार का कहना है कि जनता के हितों के लिए पार्टी कार्य कर रही है। लोगों के सामने सर छिपाने की समस्या है। जनता की समस्या को लेकर प्रतिनिधिमंडल क्षेत्रीय विधायक तथा उत्तराखंड के वन मंत्री डॉ. हरक सिंह रावत से मिलने के लिये देहरादून रवाना हो गया है। जबकि दूसरा दल नैनीताल हाईकोर्ट के लिए प्रस्थान कर चुका है।यह है मामला साठ के दशक में उत्तर प्रदेश सरकार द्वारा यहां एशिया के सबसे बड़े मिट्टी के बहुउद्देश्यीय कच्चे डैम का निर्माण किया गया था। डैम के निर्माण के लिए वन विभाग से सशर्त भूमि अधिग्रहीत की गयी थी। सत्तर के दशक में निर्माण कार्य पूरा होने के बाद डैम का राष्ट्र को समर्पित कर दिया गया। इसी बीच डैम निर्माण के दौरान कार्यरत कर्मचारियों को छटनी करके नौकरी से बाहर कर दिया गया तथा कुछ को सिंचाई विभाग की अन्य परियोजनाओं में स्थानांतरित कर दिया गया।इसके बाद 1978 में राज्य सरकार द्वारा कालागढ़ को नोटिफाईड एरिया घोषित कर दिया गया। इसके कारण छटनीशुदा कर्मचारियों सहित अन्य लोगों ने आजीवन यहीं पर रहने की उम्मीद करते हुए पैतृक स्थानों की जमीन तथा मकान बेचकर यहीं पर कारोबार अथवा अन्य रोजगार शुरू कर दिए।लेकिन नोटिफाईड एरिया घोषित होने के बाद परियोजना भत्ता समाप्त होने की आशंका के चलते कर्मचारी संगठनों के भारी विरोध के कारण सरकार द्वारा 1981 में नोटिफाईड एरिया को बिखंडित कर दिया गया। इसके बाद 1999 के दौरान किसी बात को लेकर विभागीय अधिकारियों के आपसी विवाद के चलते वनाधिकारियों द्वारा एनजीओ के माध्यम से कालागढ़ की आवासीय कालोनियों को कार्बेट के भीतर बताते हुये खाली कराकर वन विभाग को सौंपे जाने की मांग कर न्यायालय में रिट याचिका दाखिल कर दी गई। यह मामला बीते दो दशक से हाईकोर्ट तथा सुप्रीम कोर्ट के अलावा सीईसी सहित एनजीटी में विचाराधीन है। हांलाकि इस बीच 1993 तथा 2003 के दौरानं यहां से भारी संख्या में लोगों को बेदखल किया गया तथा फिलवक्त भी लोगों के सिर पर बेदखली की तलवार लटकी नजर आ रही है।

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  • Web Title:Preparations for demolition in Kalagad, Red marks placed on houses