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जमींदारी प्रथा को समाप्त करना चाहते थे अनुग्रह बाबू

हिन्दुस्तान प्रतिनिधि पटना। राष्ट्रीय आंदोलन व बिहार के निर्माण में अनुग्रह नारायण सिंह के योगदान को इतिहास के अनुशासन में देखने की जरूरत है। कृषि व उद्योग के विकास में उनके योगदान को भुलाया नहीं जा सकता है। वे मुआवजा देकर जमींदारी प्रथा को समाप्त करने के पक्ष में थे। बिहार राज्य अभिलेखागार निदेशालय के सेमिनार हॉल में गुरुवार को बिहार के निर्माण में डा. अनुग्रह नारायण सिंह की भूमिका विषय पर आयोजित सेमिनार में वक्ताओं ने ये विचार रखे। डा. प्रभाकर ने कहा कि आजादी के बाद बिहार के विकास में उनकी अहम भूमिका रही।

वे एक सामाजिक और राजनीतिक कार्यकर्ता भी थे। डा. अखिलेश कुमार ने कहा कि वे आधुनिक बिहार के सृजन और निर्माण के नायकों में शामिल थे। आज इन नायकों की व्यक्तिगत उपलबि्धयों की जगह उनके राजनीतिक व सामाजिक संदर्भों के पुनर्मूल्यांकन की आवश्यक्ता है। डा. प्रमोदानंद दास ने कहा कि अनुग्रह बाबू का मानना था कि बिहार में जमींदारी प्रथा के उन्मूलन के बाद ही शांति स्थापित हो पाएगी। डा. चन्द्रमोहन सिंह ने कहा कि उद्योग व कृषि के विकास में उनके द्वारा किए गए कार्यो की चर्चा की।

अध्यक्षता डा. रत्नेश्वर मिश्र ने की जबकि स्वागत अभिलेखागार के निदेशक डा. विजय कुमार ने किया। इस मौके पर डा. भारती शर्मा, डा. बादशाह चौबे, संजय कुमार खां, उदय कुमार ठाकुर, डा. उर्मिला कुमारी, डा. नागेन्द्र चौधरी, अजय कुमार, सूर्यकांत कुमार, मुकेश कुमार, रतन कुमार, सुधीर कुमार आदि भी मौजूद थे।

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