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गोरखपुर...तो इसलिए षष्ठी से होती है दुर्गा की विशेष पूजा

गोरखपुर। कार्यालय संवाददाता शारदीय नवरात्र नौ दिन का है फिर षष्ठी के दिन से विशेष पूजा और महोत्सव क्यों शुरू होता है? यह सवाल कौंधता तो बहुतों के मन में होगा मगर जवाब आसानी से नहीं मिल पाता होगा। पूजा परम्परा के अच्छे जानकार एवं बंगाली समिति के पूर्व अध्यक्ष पीके लाहिड़ी कहते हैं जवाब के लिए कीर्तिवास रामायण पढ़नी होगी और इसका इतिहास जानने के लिए अतीत में जाना होगा।

बकौल श्री लाहिड़ी, मर्यादा पुरुषोत्तम श्रीराम ने लंका पर आक्रमण से पहले रामेश्वरम में शिवलिंग की स्थापना की। उसी समय ब्रह्मा ने ब्राह्मण वेष में प्रकट हो कर कहा कि रावण, आदि शक्ति दुर्गा का महान भक्त है। दुर्गा को प्रसन्न किए बिना रावण पर विजय सम्भव नहीं है। उन्होंने उसी दिन से दुर्गा पूजा शुरू करने को कहा।

श्रीराम ने उत्तर दिया कि शरदकाल में पूजा का विधान नहीं है। तब ब्रह्मा ने अपने वास्तविक रूप में प्रकट हो कर उन्हें षष्ठी के दिन से दुर्गा पूजा का विधान दिया और माँ का ‘अकाल बोधन’ करने को कहा। आगे की कथा यह है कि षष्ठी को देवी की मृणमयी प्रतिमा स्थापित कर पूजा शुरू की गई। अष्टमी तिथि बीतने लगी मगर देवी के दर्शन नहीं हुए।

श्रीराम कुछ विचलित होने लगे। उन्होंने 108 दीप जला कर और 108 नील कमल चढ़ाते हुए संधि पूजा का संकल्प लिया। देवी ने परीक्षा लेने के लिए एक नीलकमल अदृश्य कर दिया। तब श्रीराम ने नीलकमल समान अपने एक नेत्र को ही अर्पित करने का निश्चय किया। तीर निकालते ही देवी प्रकट हो गईं। उन्होंने आशीर्वाद स्वरूप दैवीय शक्ति प्रदान की। नवमी के दिन रावण का वध हुआ।

दशमी को श्रीराम ने पूजा के बाद मृणमयी मूर्ति का विसर्जन किया।श्री लाहिड़ी बताते हैं कि कीर्तिवास रामायण के इस प्रसंग से प्रेरित हो सन् 1420 में पूर्व बंगाल (अब बांगलादेश) में राजा कंस नारायण ने सबसे पहले दुर्गा पूजा प्रारम्भ की। नि:संतान कंस नारायण को पुत्र रत्न की प्राप्ति हुई तो बंगाल के राजाओं और जमींदारों में यह पूजा लोकप्रिय होने लगी।

1885 में कांग्रेस के संस्थापक अध्यक्ष उमेश चन्द्र बनर्जी ने वालंटियरों को एकजुट कर उनमें राष्ट्रभक्ति की भावना का संचार करने के लिए मोहल्लों में दुर्गा पूजा का शुभारम्भ कराया। उन्होंने उसे ‘श्री श्री दुर्गा पूजा एवं शारदीय उत्सव’ नाम दिया। उस दौरान दिन में पूजा और शाम को शारदीय उत्सव के नाम पर देश को अंग्रेजों की दासता से मुक्ति दिलाने के लिए सांस्कृतिक कार्यक्रम किए जाने लगे। धीरे-धीरे पूरे उत्तर भारत में लोग दुर्गा पूजा करने लगे।

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