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हिन्दी दिवस 14 सितंबर को : राधेश्याम कथावाचक

बरेली, वरिष्ठ संवाददाता। सुगम और सरल जनभाषा हिन्दी में राधेश्याम रामायण लिखने वाले पंडित राधेश्याम कथावाचक अपने शहर के थे। यह बताना इसलिए जरूरी है कि आने वाली पीढ़ी पंडित जी के अवदान को विस्मृत न कर दे। एक समय पूरे उत्तर भारत की शहरी और देहाती जनता को तर्ज रामायण बड़ी सुहाती थी।

बरेली को हिन्दी रंगमंच का जीवंत केंद्र बनाने में उनका ही योगदान रहा।हिंदी नाटक को अभिजात्य वर्ग से आम जनता के बीच लाने का काम पंडित जी ने किया। कभी फिल्म अभिनेता नसीरुद्दीन शाह ने बरेली की पहचान के रूप में प्रियंका चोपड़ा नहीं,बल्कि पंडित राधेश्याम कथावाचक का नाम लिया था।

उनके नाटकों ने पेशावर, लाहौर, अमृतसर, दिल्ली जोधपुर, बंबई, मद्रास और ढाका तक धूम मचाई थी। उनके नाटकों के दर्शकों में मोतीलाल नेहरू, जवाहर लाल नेहरु, विजयलक्ष्मी पंडित, सरोजिनी नायडू, चक्रवर्ती राजगोपालाचार्य जैसे लोग शामिल थे। महात्मा गांधी भी उनके नाटक देखना चाहते थे लेकिन अस्वस्थता की वजह से नहीं देख सके।साम्राज्यवाद से संघर्षपौराणिक आख्यानों पर रचे नाटकों में उनके सामाजिक सरोकार अलग झलकते थे।

भक्त प्रहलाद नाटक में भगवान की भक्ति न करने के पिता के आदेश का उल्लंघन करने के बहाने जहां उन्होंने अंग्रेजों के शासन के विरुद्ध गांधी जी के सविनय अवज्ञा आंदोलन के संदेश को सफलतापूर्वक प्रचारित किया, वहीं अपरोक्ष रूप से हिरणाकश्यप के दमन और अत्याचार की तुलना ब्रिटिश शासकों से की। उनके नाटकों को रोकने का कोई आधार अंग्रेजों को भी नहीं मिल सका।

तांगे पर घूमे मालवीय जी के साथमहामना मदनमोहन मालवीय दरभंगा नरेश के साथ काशी हिन्दू विश्वविद्यालय के लिए धन इकट्ठा करने आए। पंडित जी ने तांगे पर मालवीय जी के साथ बरेली के बाजारों और गलियों में घूम घूम कर हरमोनियम पर तुरंत की लिखी पंक्तियां सुनाकर लोगों से दान देने की अपील की। रामकथा के अमर गायकपंडित राधेश्याम ने रामायण के माध्यम से हिंदी को गांव गांव तक पहुंचाया। राधेश्याम रामायण को लोग गा गाकर सुनाते थे। सुभाष नगर में होने वाली रामलीला में राधेश्याम रामायण के दोहे ही संवाद के रूप में प्रयोग किए जाते हैं। इनकी अनूठी गायन शैली वाकई अद्भुत है।

कैलिफोर्निया के विश्वविद्यालय में हिन्दी की प्रोफेसर पामेला राधेश्याम कथा वाचक को हिन्दी का ऐसा पुरोधा मानती हैं, जिन्होंने रामायण लिखकर इसे समृद्ध किया। पामेला ने बरेली आकर राधेश्याम साहित्य पर गंभीर शोध किया है।पीठ स्थापनाहिन्दी को समृद्ध करने वाले पंडित राधेश्याम कथावाचक की स्मृति में रुहेलखंड विश्वविद्यालय में पीठ स्थापना का मुद्दा कुछ समय पहले प्रबुद्ध लोगों ने उठाया था लेकिन सरकारी हीलाहवाली में उनके इस योगदान को कौन पूछता।

यह प्रयास भी सिमटकर रह गया।वरिष्ठ रंगकर्मी राजेंद्र मोहन शुक्ल कहतें हैं - युगों तक बरेली की मिट्टी अपनी इस विलक्षण रचना पर गर्व करती रहेगी। लेकिन अफसोस है कि पूरे भारत ने जिसे पूजा, सराहा उसे बरेली की संतानों ने भुला दिया।

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