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अपनों संग हुई वीरा की अरदास

स्टार प्लस के धारावाहिक ‘वीरा: एक वीर की अरदास’ की टीम अपने संघर्षों से आगे बढ़कर इन दिनों जश्न के मूड में दिख रही है। इसी कड़ी में रणविजय के मिल जाने के बाद परिवार के सदस्यों ने अमृतसर स्थित हरमंदिर साहिब स्वर्ण मंदिर में अपनी अरदास पूरी होने पर मंदिर जाकर आशीर्वाद लिया और लंगर छका तथा सेवा भी की।

पिछले कुछ समय से कई उतार-चढ़ावों से गुजर रही धारावाहिक वीरा: एक वीर की अरदास की टीम अपने संघर्षो से आगे बढ़कर इन दिनों जश्न के मूड में है। इसी कड़ी में रणविजय के मिल जाने के बाद परिवार के सदस्यों ने अमृतसर स्थित हरमंदिर साहिब स्वर्ण मंदिर में अपनी अरदास पूरी होने पर मंदिर जाकर आशीर्वाद लिया और लंगर छका।  

शूटिंग के लिए अमृतसर पहुंचे भावेश ने कहा,  ‘मैंने स्वर्ण मंदिर की तस्वीरें अब तक सिर्फ गूगल पर ही देखी थीं। पर धारावाहिक के कारण प्रत्यक्ष रूप से मंदिर देखने का मौका मिला। चूंकि परिवार में एक बार फिर खुशियां लौट आयी हैं और मैं अपनी बीजी, वीरा और निहाल चाचू के पास वापस लौट आया हूं, इसलिए खूब लाड-प्यार और वीरा के साथ खेल-कूद के मौके मिल रहे हैं।’  

वहीं 5 साल की हर्षिता यानी सबकी चहेती वीरा कहती हैं, ‘मैं पहली बार यहां आयी हूं। मुझे यहां के परांदे बड़े अच्छे लगते हैं। मैंने अपने लिए जूतियां भी खरीदी हैं। शूटिंग के दौरान कई बार यहां के लोग हमसे मिलने आते हैं। कई बच्चे मेरे साथ फोटो खिंचवाने के लिए खासतौर पर अपने मम्मी-पापा को लेकर पहुंचे। ये देखकर मुझे बहुत अच्छा लगा।’धारावाहिक की बात आते ही हर्षिता कहती हैं, ‘मैं खुश हूं कि अब रणविजय भैया घर लौट आए हैं। वे घर में मेरा सबसे ज्यादा ध्यान रखते हैं। अब तो बीजी भी मुझे प्यार करने लगी हैं।’ रत्न की भूमिका निभा रही स्नेहा वाघ कहती हैं, ‘मुझे लगता है कि यह सबसे अलग धारावाहिक है। वीरा जरूर  सीरियल में चरित्र का नाम है, पर पंजाबी में वीरा का अर्थ मजबूती और साहस से होता है। ऐसे में यह कहानी न सिर्फ मेरी, वीरा और रणविजय के संघर्ष की है, बल्कि उन औरतों की कहानी भी है जो मेरी ही स्थितियों का असल जिंदगी में सामना कर रही हैं। रत्न का संघर्ष बहुत लंबा है। ज्योति के चरित्र के बाद मैं कुछ नया करने की तलाश में थी, जो मुझे इस स्क्रिप्ट में नजर आया। इस बीच मैं खुद में काफी बदल गयी हूं। एक तरफ मेरा वजन बढ़ा है तो दूसरी ओर इंडस्ट्री में इतना समय बिताने के बाद अब खुद को पहले से ज्यादा मैच्योर भी महसूस करती हूं। मुझे निजी तौर पर लगता है कि मैं इमोशंस से खुद को जल्दी जोड़ कर पाती हूं। बच्चों के साथ काम करने का यह मेरा पहला अनुभव था।’

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