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जीवन का हर रंग है दिल्ली में

जाने माने रंगकर्मी अरविंद गौड़ का जन्म दिल्ली में ही हुआ। दिल्ली ने उन्हें बनाया, पहचान दी। दिल्ली को उन्होंने करीब से देखा और पाया कि दिल्ली वक्त के साथ अपना चेहरा तो बदलती है, लेकिन संस्कृति और तहजीब से लबरेज उसका स्थाई चरित्र नहीं बदलता। सत्यसिंधु से उनकी बातचीत

दिल्ली आपको कैसी लगती है?
मेरी जन्मभूमि भी दिल्ली है और कर्मभूमि भी। दुनिया के लगभग तमाम शहरों में घूमा हूं, वहां रहा हूं, काम किया है। उनका एक अपना आकर्षण है, ग्लैमर है, लेकिन दिल्ली में जो अपनापन है, वह दुनिया में कहीं नहीं मिलता। चाहे सांस्कृतिक गतिविधियां हों, राजनीतिक या सामाजिक, यह सबका केन्द्र है। धर्म, संस्कृति, टेक्नोलॉजी (मेट्रो) से लेकर जीवन के विविध रंग हैं दिल्ली में। मुझ जैसे सामाजिक-राजनीतिक पृष्ठभूमि पर आधारित नाटक करने वालों के लिए तो दिल्ली और भी खास है।

आप बचपन से दिल्ली को देख रहे हैं। दिल्ली के साथ रिश्ता कैसा रहा?
मेरे पिताजी अध्यापक थे। उत्तर प्रदेश से दिल्ली आए थे, लेकिन मेरे जीवन की शुरुआत यहीं हुई। शाहदरा के बलबीर नगर में रहता हूं। पहले यमुना पार को उपेक्षित क्षेत्र माना जाता था, जहां ग्रामीण पृष्ठभूमि वालों से लेकर व्यापारी, नौकरीपेशा लोग ज्यादा रहते थे। उसी माहौल में मेरा लालन-पालन हुआ, लेकिन मेरा विकास पुरानी दिल्ली में हुआ। पुस्तकों के लिए दिल्ली पब्लिक लाइब्रेरी (डीपीएल) से जुड़ा, तो चांदनी चौक और पुरानी दिल्ली से रिश्ता जुड़ गया। तब डीपीएल दिल्ली का सांस्कृतिक केन्द्र हुआ करता था, जहां तमाम तरह के सांस्कृतिक कार्यक्रम होते थे।

दिल्ली के सांस्कृतिक विकास में उन कार्यक्रमों की खास भूमिका रही। वहां 70 से 80 के दशक तक काफी गतिविधियां होती रहती थीं। मुझे 80 से 84 तक वहां की गतिविधियों में भाग लेने का मौका मिला। वहीं पढ़ता और नाटक भी करता। फाउंटेन पर चाय पीता और दरीबा कलां से लेकर फतेहपुरी तक काफी समय बिताता था। मेरी जड़ें वहां काफी मजबूत हुईं। 84 में मेरे जीवन में बड़ा बदलाव आया, जब दिल्ली में दंगे हुए। हजारों लोगों को जान गंवानी पड़ी, काफी शरणार्थी हो गए। इस घटना का मेरे दिमाग पर इतना गहरा असर पड़ा कि मेरे नाटक में इंसानियत सबसे महत्वपूर्ण हो गई। उसी घटना के बाद मैं सामाजिक-राजनीतिक नाटक करने लगा। ‘अस्मिता’ बनाया तो काफी सवालों को उठाने का मौका मिला।

दिल्ली की ऐसी बातें जिनका आप अपने मित्रों के बीच अक्सर जिक्र करते हैं?
दिल्ली के अलग-अलग चेहरे इसे खास बनाते हैं। चाहे वह पुरानी दिल्ली की चहल-पहल से भरी रातें हों या दिल्ली के कालेजों के माहौल में आधुनिकता और रचनात्मकता का समावेश या जेएनयू के गंगा ढ़ाबे पर राष्ट्रीय/अन्तरराष्ट्रीय बहस हो। ये सब दिल्ली में संभव हो सकते हैं। यह शहर एक तरफ दुनिया के तमाम बड़े शहरों से होड़ ले रहा है, तो दूसरी तरफ इसका अपनापन और एक-दूसरे कि जिंदगी में ताकझांक करने वाली गर्मजोशी भी है। यहां पंजाब की सोंधी गंध भी है, उत्तर प्रदेश, बिहार हरियाणा और उत्तराखंड का ठेठपन भी है और दिल्ली की संस्कृति को और समृद्ध करने का साउथ इंडियन का योगदान भी है। इन राज्यों की संस्कृतियां दिल्ली को बहुआयामी सांस्कृतिक का केन्द्र बना देती हैं।

खासकर पिछले कुछ अर्से में आप यहां क्या-क्या बदलाव महसूस करते हैं?
दिल्ली में पिछले 10-12 सालों में जो बदलाव आए हैं, वे ढांचागत बदलाव हैं। सड़कें बन गई हैं, फ्लाईओवर्स बन गए हैं, वाहनों की संख्या बढ़ गई, लेकिन रोड पर लोगों में गुस्सा भी खूब बढ़ा है। धैर्य की कमी आयी है। कह सकते हैं कि भौतिक विकास हुआ। नवधनाढ्य़ लोग बढ़े हैं जिनके आने से दिल्ली की संस्कृति पर थोड़ा नकारात्मक प्रभाव पड़ा है। बड़े वाहन में चलने वाले छोटे वाहनों को कुछ नहीं समझते। गाड़ियों की गति बढ़ी है और दुर्घटनाएं भी बढ़ी हैं, आम आदमी की मुश्किलें बढ़ी हैं, जिस पर नियंत्रण की जरूरत है।

सांस्कृतिक माहौल में क्या-क्या बदलाव पाते हैं?
जब मैंने काम करना शुरू किया, तो काफी गतिविधियां होती थीं। हमने भी उस बीच रहकर काफी कुछ सीखा, काम किया। हबीब तनवीर, प्रसन्ना, मनोहर सिंह, रघुबीर यादव, उत्तरा बाउकर, बैरी जॉन, एम. के. रैना, भानू भारती, देवेन्द्र राज अंकुर जैसे बड़े नाम उस समय काफी सक्रिय थे। इन्हें काम करते देखा। खासकर तनवीर साहब के साथ मेरा जुड़ाव ज्यादा था। काफी गर्मजोशी का माहौल था। सफदर हाशमी, शमसुल इस्लाम जैसे बड़े नाम काफी संख्या में नुक्कड़ नाटक कर रहे थे। संभव, प्रयोग, अभियान, यात्रिक आदि संस्थाएं सक्रिय थीं। काफी नाटक देखने का और बहस में भी भाग लेने का मौका मिलता था। उस समय कॉलेजों में थिएटर इतना नहीं था। वह केवल अरोड़ा किरोड़ीमल कॉलेज में काम कर रहे थे। मैं कैंपस थिएटर से जब जुड़ा था तब थिएटर में ऐसा ग्लैमर नहीं था, लेकिन देखते ही देखते 20-25 सालों में थिएटर की दुनिया ही बदल गई। काफी गतिविधियां बढ़ी, काफी दर्शक बढ़ गए। पहले गर्मियों की छुट्टियों में थिएटर नहीं होता था, लेकिन अब सबसे ज्यादा थिएटर इन्हीं छुट्टियों में होते है। काफी प्रतिभाएं आती हैं जिन्हें इस क्षेत्र में संतुष्टि के संग-संग अच्छे कॅरियर का भी विश्वास रहता है। 

यहां की कौन-कौन सी बातें बहुत पसंद हैं?
गर्मजोशी, पड़ोसियों से जुड़ाव, सांस्कृतिक-राजनीतिक-सामाजिक गतिविधियां दिल्ली को लगातार सक्रिय रखती हैं। यह सक्रियता मुझे बहुत पसंद है। यहां आम आदमी में जो सकारात्मक गति है, वह खास है। इस शहर ने उतार-चढ़ाव काफी देखे हैं, बड़ी-बड़ी घटनाएं होती रही हैं। उसके बावजूद लोगों में जो जिजीविषा है, वह अद्भुत है। यहां उच्च शिक्षा की भी काफी अच्छी व्यवस्था है। इस शहर में स्वीकारने की गजब की क्षमता है। चाहे देशभर के लोगों को स्वीकारना हो या क्षेत्र का विस्तार, दिल्ली में बड़ी सहजता से सब समा जाते हैं और दिल्ली का अपना चरित्र बरकरार रहता है।

और कौन-कौन सी बातें पसंद नहीं हैं?
धनाढय़ वर्गों में असंवेदनशीलता काफी बढ़ रही है जो सड़कों पर दिखने लगी है। पैसा और सत्ता के बल पर अराजकता फैलाने की उनमें प्रवृत्ति पनप रही है और उसके दुष्परिणाम भी दिख रहे हैं। चाहे जेसिका लाल प्रकरण हो या शिवानी प्रकरण, ऐसी घटनाएं दिल्ली के चरित्र में कहीं भी फिट नहीं बैठती। यहां की पिछड़ी कालोनियों में बुनियादी सुविधाओं का भी बेहद अभाव है। एक तरफ मॉल की कतार है और अपनी कार धोने के लिए लोग 50 लीटर पानी बहा देते हैं, जबकि दूसरी तरफ लोगों को पीने के लिए पानी नहीं मिल पाता। दिल्ली में व्याप्त ऐसी असमानताएं बिल्कुल भी पसंद नहीं है।

यहां खाने-पीने की कौन-कौन सी जगहें पसंद हैं और क्यों?
यहां मुझे चाय के खासकर रात के अड्डों के बारे में ज्यादा मालूम है। दिनभर भागदौड़ के बाद रात को दोस्तों संग बैठने के लिए मुझे इन अड्डों की तलाश रही है। दरियागंज में सब्जी मंडी के बाहर फुटपाथ पर स्थित चाय की दुकान हो या चांदनी चौक में देर रात तक खुलने वाला निर्मल रेस्टोरेंट या आईटीओ पर हिन्दी भवन के पास लक्ष्मण राव की चाय की दुकान हो या फिर मंडी हाउस में एसआरसी में राजू की कैंटीन सब खास हैं। जेएनयू का गंगा ढ़ाबा और हौज खास की पराठों की दुकानें भी मुझे बहुत पसंद हैं। जब वक्त मिलता तो दरीबा की गलियों में जलेबी और दूध खाने भी पहुंच जाता हूं।

यहां की किन किन जगहों को आप समय के अभाव में मिस करते हैं?
डीपीएल हर रोज जाना चाहता हूं, लेकिन व्यस्तता ऐसी हो गई है कि जा नहीं पाता। साहित्य अकादमी पुस्तकालय भी मेरी पसंदीदा जगह रही है, जहां जाकर खूब पढ़ा, खूब सीखा। पुरानी दिल्ली की गलियों और कनॉट प्लेस की विंडो शॉपिंग को भी मिस करता हूं जो पहले जीवन का हिस्सा बन गया था।

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