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20 अक्तूबर, 2020|7:25|IST

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इन्होंने खुद लिखा अपने जीवन का संविधान

इन्होंने खुद लिखा अपने जीवन का संविधान

आज गणतंत्र दिवस है। आज ही के दिन 60 साल पहले देश का संविधान लागू हुआ था। हमारा संविधान देश के सभी नागरिकों को शिक्षा, जीने के अधिकार और तरक्की के समान अवसर मुहैया कराने का वादा करता है, लेकिन किन्हीं भी कारणों से देश की आधी आबादी यानी महिलाओं को ये अवसर सुलभ नहीं हो पाए थे। ऐसे में कुछ महिलाओं ने अपना संविधान खुद तैयार किया। इन महिलाओं ने अपने रास्ते खुद तय किये, रास्ते में मिलने वाली मुश्किलों का डट कर सामना किया और बुलंदियों पर पहुंचीं। इन महिलाओं को देख कर आज सारे देशवासियों को नाज होता है। यूं तो ऐसी लाखों महिलाएं हैं, लेकिन हम यहां कुछ ऐसी महिलाओं के बारे में आपको बता रहे हैं, जिनकी कहानी आपको भी आगे बढ़ने के लिए प्रेरित करेगी।

दिल्ली हाई कोर्ट की पहली जज लीला सेठ

लीला सेठ भारत में हाई कोर्ट की मुख्य न्यायाधीश बनने वाली पहली महिला थीं। दिल्ली हाई कोर्ट की पहली महिला जज बनने का श्रेय भी लीला सेठ को ही जाता है। लीला सेठ देश की पहली ऐसी महिला भी थीं, जिन्होंने लंदन बार एग्जामिनेशन में टॉप किया। लीला सेठ का जन्म 1930 में लखनऊ में हुआ। स्कूली शिक्षा के बाद उन्होंने लॉ किया और अशोक कुमार सेन की जूनियर के रूप में काम करना शुरू किया। उन्होंने इनकम टैक्स, सेल्स टैक्स, एक्साइज और कस्टम्स, सिविल, कंपनी और क्रिमिनल केसेस के साथ-साथ मैट्रिमोनियल मामलों को भी बखूबी देखा। अनेक जांच आयोग की सदस्य रह चुकीं लीला सेठ सन 2000 तक लॉ कमीशन में भी रहीं और उन्हें हिंदू सक्सेशन एक्ट में संशोधन का श्रेय भी जाता है। इसी संशोधन के तहत संयुक्त परिवारों में रह रही बेटियों को भी पिता की संपत्ति में समान अधिकार मिलता है। करियर वुमन के रूप में लीला सेठ ने पुरुष प्रधान माने जाने वाली न्यायप्रणाली में अपनी एक अलग पहचान बनाई और कई पुरानी मान्यताओं को तोड़ा। साथ ही लीला सेठ ने परिवार और करियर के बीच गजब का संतुलन बनाए रखा। पिछले दिनों उनकी ऑटोबायोग्राफी प्रकाशित हुई- ऑन बैलेंस। इसमें लीला सेठ के संघर्ष और बुलंदियों तक पहुंचने की पूरा कथा है, जो हर किसी के लिए प्रेरणा का स्नोत बन सकती है।

एमबीए सरपंच छवि राजावत

जयपुर से 65 किलोमीटर दूर टोंक जिले का एक छोटा गांव है- सोडा। यह गांव पिछले कुछ समय से यहां की सरपंच छवि राजावत की वजह से चर्चा में रहा है। छवि ने ऋषि वैली बैंगलुरू से स्कूली पढ़ाई के बाद लेडी श्रीराम कॉलेज, दिल्ली से स्नातक की डिग्री ली। इसके बाद पुणे से एमबीए किया। उन्होंने कॉरपोरेट सेक्टर में नौकरियां कीं और उसके बाद अपने गांव से सरपंच का चुनाव जीता। जींस और टी शर्ट पहने जब वह नरेगा (एनआरईजीए) मीटिंग्स लेती हैं तो लोग उन्हें चकित भाव से देखते हैं। लेकिन छवि कहती हैं- मैं अपने गांव का चेहरा बदल देना चाहती हूं। यहां करने के लिए बहुत कुछ है। छवि आगे कहती हैं, दरअसल मेरी एमबीए की डिग्री अपने गांव वालों की बेहतर तरीके से देखभाल करने में मेरी मदद ही कर रही है। वह कहती हैं, मैं यहां किसानों के बच्चों के साथ खेल कर बड़ी हुई हूं और मैं यहां ज्यादा कम्फर्टेबल महसूस करती हूं। छवि वास्तव में ग्रामीण लोगों का माइंडसैट बदलना चाहती हैं। वह कहती हैं, मेरा फोकस गांव के लोगों को पीने का साफ पानी मुहैया कराना और लोगों के लिए नौकरियों के अवसर बढ़ाने पर है।

ब्यूटी मेरा पैशन है भारती तनेजा

भारती तनेजा का नाम ब्यूटी इंडस्ट्री में एक पहचाना हुआ नाम है। आज उनके देश में 9 इंस्टीट्यूट और 9 सेंटर काम कर रहे हैं। उनके यहां कई सौ कर्मचारी काम करते हैं और उनका टर्न ओवर अच्छा खासा है। लेकिन आज उनकी सफलता की जो इबारत हमें दिखाई पड़ती है, उसके पीछे एक लंबा संघर्ष, सफल होने की जिद, कड़ी मेहनत और दृढ़निश्चय साफ तौर पर देखा जा सकता है। 1955 में एक सिख परिवार में भारती का जन्म हुआ। सामान्य शिक्षा दीक्षा के बाद भारती एक स्कूल में साइंस की अध्यापिका बन गयीं। स्कूल में भी वह अपनी सहयोगियों का मेकअप शौकिया ही किया करती थीं। इस शौक को वह उद्योग का दर्जा देंगी, ऐसा उन्होंने तब तक नहीं सोचा था। समय अपनी गति से बढ़ता चला जा रहा था। 1978 में भारती की शादी भी हो गयी। उनकी एक बेटी का भी जन्म हो गया, लेकिन भारती के अवचेतन में कहीं ब्यूटीशियन बनने का सपना तैरता रहा। 1988 में उन्होंने अपनी स्कूल की नौकरी इसलिए छोड़ दी, क्योंकि उन्हें अपने घर-परिवार को देखना था। इसके बाद जब उनकी सास रिटायर हो गयीं तो उन्होंने अपने फ्लैट में ही ब्यूटी पार्लर की शुरुआत, विकास पुरी, दिल्ली में की। भारती बताती हैं, उस समय मैंने अपने ड्रेसिंग टेबल और दीवान का इस्तेमाल ब्यूटी पार्लर के लिए किया था। अड़ोस-पड़ोस के लोग उनके पास आने लगे। दिलचस्प रूप से उस समय भारती प्रेग्नेंट थीं। भारती बताती हैं, ब्यूटी पार्लर खोलने के बाद जो पहला करवाचौथ पड़ा, उसमें मैंने एक दिन में तीन हजार रुपये कमाए और पहली बार मुङो लगा कि यदि मैं तीन हजार रुपये रोज कमा पाती तो कितना अच्छा होता। इसके बाद भारती ने बीएएमएस और अरोमा थैरेपी की पढ़ाई की। इसमें साइंस की उनकी बैकग्राउंड काम आई। और 1988 से शुरू हुआ ब्यूटीशियन का उनका काफिला महज दो दशकों में एक उद्योग  का रूप ले चुका है। अपनी सफलता पर भारती को नाज है, लेकिन वे अभी और भी आगे जाना चाहती हैं। उनका सपना है कि वे एल्प्स ब्यूटी क्लिनिक की शाखाएं विदेशों में भी खोलें। उनके चाहने वालों में आम मध्य वर्गीय लड़कियों से लेकर माधुरी दीक्षित, सुष्मिता सेन, जया प्रदा, नफीसा अली, रिया सेन, मुनमुन सेन जैसी शख्सियतें शामिल हैं। ब्यूटी केयर के कॉन्सेप्ट को आम लोगों तक पहुंचाने का श्रेय भारती तनेजा को ही जाता है।

न्याय के लिए गुलाबी गैंग संपत देवी पाल 

बुंदेलखंड का दिल माने जाने वाले बांदा जिले में रहती हैं संपत देवी पाल। उनके पति आइसक्रीम विक्रेता हैं और वह पांच बच्चों की मां भी हैं। 2006 से पहले तक उनका जीवन आम ग्रामीण महिलाओं की ही तरह था। उन्हें अपने आसपास घरेलू हिंसा का शोर सुनाई देता था, लेकिन वह कुछ कर नहीं पाती थीं। हालांकि वह अपने इलाके में सरकारी स्वास्थ्य कार्यकर्ता के रूप में काम करती थीं। 2006 में उन्होंने इलाके की ही कुछ महिलाओं को लेकर एक गैंग बनाया और इसे नाम दिया गुलाबी गैंग। इस गैंग का काम है बांदा और उसके आसपास के इलाकों में महिलाओं की मदद करना। इस गैंग की महिलाएं अक्सर पिंक कलर की साड़ी में रहती हैं और इनके हाथों में लाठियां होती हैं। किसी भी असहाय महिला के बुलाने पर ये महिलाएं वहां पहुंच जाती हैं और महिला को सुरक्षा देती हैं। इस गैंग में आज हजारों महिलाएं और कुछ पुरुष भी शामिल हैं। दहेज, बाल विवाह और घरेलू हिंसा को रोकने के लिए ये महिलाएं लाठियों का इस्तेमाल करती हैं। संपत का कहना है, हमारा लक्ष्य गलत काम करने वाले के दिलों में डर पैदा करना और यहां के सरकारी अधिकारियों के प्रति सम्मान पैदा करना है। इस गुलाबी गैंग की ख्याति आज देश से बाहर भी फैल चुकी है। और इस पर एक फिल्म भी बन चुकी है पिंक साड़ी। यह फिल्म 2010 में टोरंटो फिल्म फेस्टिवल में दिखाई गयी थी।

पत्नी की राय अहम मनोज तिवारी

‘इंडियन’, ‘अपना सपना मनी-मनी’, ‘जोर’, ‘चैंपियन’, ‘किसना’ जैसी फिल्मों का सह-निर्देशन कर चुके पूर्वाचल के गौरखपुर की छोटी सी जगह में रहने वाले मनोज तिवारी लगभग 11 साल से निर्देशन के क्षेत्र में हैं। हाल ही में फिल्म ‘हैलो डार्लिंग’ का स्वतंत्र निर्देशन कर चुके मनोज तिवारी पहले ऐसे निर्देशक हैं, जिन्होंने सुभाष घई के प्रोडक्शन हाउस मुक्ता आर्ट्स की फिल्म का भी निर्देशन किया है। आगे भी सामाजिक मुद्दों पर फिल्म बनाने वाले मनोज का कहना है कि वह आज जिस भी मुकाम पर हैं, उसका श्रेय अपनी पत्नी लिएश को देते हैं। उनका कहना है कि जब मैं अपने लक्ष्य को पाने के लिए परिवार के साथ मुंबई आया तो उनकी पत्नी ने उन्हें पूरा सहयोग दिया। अपनी पत्नी के सहयोग से ही वह अपने काम पर पूरी तरह फोकस कर पाए। उनकी पत्नी ने घर की भी सभी जिम्मेदारियों से मनोज को मुक्त रखा। मनोज कहते हैं कि जीवन में सही साथी का मिलना बहुत जरूरी है, जो आपके लक्ष्य में आपका साथ देते हुए आपकी बाधाओं को दूर करे। हालांकि मनोज तिवारी की पत्नी घरेलू महिला हैं, लेकिन मनोज की किसी भी स्क्रिप्ट और अन्य कामों में अपनी राय देना नहीं भूलतीं। अपनी आने वाली कुछ फिल्मों में लगे हुए मनोज कहते हैं कि आज अपनी पत्नी के सहयोग से मैं अपनी एक प्रोडक्शन कंपनी लॉन्च करने की तैयारी कर रहा हूं। मुझे मानसिक रूप से तनाव मुक्त रखने में मेरी पत्नी ने पूरा सहयोग दिया है। अगर मेरी पत्नी इतनी सहयोगी न होतीं तो शायद वाकई मैं इस मुकाम पर नहीं होता।

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