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चल भाग चलें साउथ की ओर

पिछले कुछ वर्षों से बॉलीवुड पर दक्षिण भारतीय फिल्म उद्योग से जुड़े लोगों ने अपना दबदबा बना रखा है। दक्षिण की क्षेत्रीय भाषा में बनी फिल्में हिन्दी में रीमेक की जा रही हैं, जो सफलता के झंडे भी गाड़ रही हैं। इन फिल्मों के निर्देशक भी दक्षिण भारतीय फिल्मों के चर्चित निर्देशक ही हैं।

अक्षय कुमार की फिल्म ‘राउडी राठौड़’ (निर्देशक प्रभुदेवा) ने 100 करोड़ से ज्यादा कमा लिए हैं और अभी भी बॉक्स ऑफिस पर डटी हुई है। इसकी कमाई का आंकड़ा हर दिन लगातार बढ़ता ही जा रहा है। यह फिल्म 2006 में आई सफलतम तेलुगू फिल्म ‘विक्रमारकुडु’ का हिन्दी रीमेक है, जिसमें तेजा ने अभिनय किया था। इससे पहले प्रभु देवा ने ही दक्षिण की एक फिल्म का हिन्दी में ‘वांटेड’ नाम से रीमेक किया था।

पिछले कुछ वर्षों से बॉलीवुड पर दक्षिण भारतीय फिल्म उद्योग से जुड़े लोगों ने अपना दबदबा बना रखा है। दक्षिण की क्षेत्रीय भाषा में बनी फिल्में हिन्दी में रीमेक की जा रही हैं और सफलता के झंडे भी गाड़ रही हैं। फिर चाहे वह ‘गजनी’ हो या ‘बॉडीगार्ड’ या ‘वांटेड’ या फिर ‘राउडी राठौड़’। इतना ही नहीं, बॉलीवुड की इन फिल्मों के निर्देशक भी दक्षिण भारतीय फिल्मों के चर्चित निर्देशक ही रहे हैं।

मजेदार बात यह है कि तमाम दक्षिण भारतीय कलाकार, तकनीशियन व फिल्म सर्जक बॉलीवुड में अपने लिए जगह बनाने को लालायित नजर आ रहे हैं। हर कोई बॉलीवुड के माध्यम से हिन्दी भाषी बड़े दर्शक वर्ग तक पहुंचना चाहता है। यूं तो यह सिलसला कोई नया नहीं है। पचास व साठ के दशक में दक्षिण भारत से सिर्फ नायिकाएं ही बॉलीवुड में आती थीं और अपना दबदबा कायम रखती थीं, पर अब ऐसा नहीं रहा। ग्लोबलाइजेशन के बढ़ते प्रभाव व ‘गजनी’ के सुपर-डुपर हिट होते ही पिछले कुछ वर्षो में दक्षिण भारतीय अभिनेत्रियों के साथ-साथ तकनीशियन, फिल्म सर्जक व अन्य कलाकार भी बॉलीवुड में तेजी से कदम रख रहे हैं। आने वाले ज्यादातर फिल्मकारों ने बॉलीवुड में कदम रखते समय दक्षिण की अपनी सफलतम फिल्मों का हिंदी में रीमेक किया या दक्षिण की क्षेत्रीय भाषा की किसी सफलतम फिल्म का हिन्दी में रीमेक किया। कहने का अर्थ यह है कि अब तक बॉलीवुड के निर्माताओं ने दक्षिण की फिल्म का हिन्दी में रीमेक करते समय ही दक्षिण के तकनीशियनों व निर्देशकों को तरजीह दी है।

दक्षिण की फिल्मों के हिन्दी रीमेक के सवाल पर अजय देवगन कहते हैं- ‘यह कोई नयी बात नही है। साठ के दशक में यह सिलसिला जेमिनी स्टूडियो ने शुरू किया था। इतना ही नहीं, मैं आपको याद दिला दूं कि ‘फूल और कांटे’ तथा ‘मुन्ना भाई एमबीबीएस’ जैसी हिन्दी फिल्मों का दक्षिण में रीमेक हो चुका है। दक्षिण व उत्तर भारत में जो कल्चर की भिन्नता है, इसकी वजह से दोनों जगह की कहानी व स्क्रिप्ट में थोड़ा सा फर्क होता है, नहीं तो दोनों जगह के तकनीशियन एक दूसरी जगह काम कर रहे हैं, कलाकार काम कर रहें हैं, हमेशा करते रहेंगे। दक्षिण की कई हीरोइनों ने हिन्दी फिल्मों में सफलता के झंडे गाड़े हैं, तो कुछ हिन्दी भाषी कलाकारों ने भी दक्षिण में पैर जमाए हैं।’

2012 की शुरुआत में दक्षिण के फिल्मकार गौतम मेनन ने काफी लंबे समय बाद एमी जैक्सन व प्रतीक को लेकर दक्षिण की एक फिल्म का हिन्दी में ‘एक दीवाना था’ के नाम से रीमेक करते हुए कदम रखा, पर इस फिल्म को बॉक्स ऑफिस पर सफलता नहीं मिली। जबकि ‘गजनी’ फेम दक्षिण भारतीय निर्देशक ए मुरुगादास और ‘बॉडीगार्ड’ फेम निर्देशक सिद्दीकी अब फिर से दूसरी फिल्म का हिन्दी रीमेक बनाने की तैयारी में हैं।
सिर्फ तकनीशियन ही नहीं, बल्कि बॉलीवुड में आजकल दक्षिण भारतीय फिल्म उद्योग यानी कि ‘टॉलीवुड’ के कलाकारों का आगमन भी तेजी से बढ़ा है। सफलतम फिल्म ‘सिंघम’ में दक्षिण की फिल्मों में नाम कमा चुकी अभिनेत्री काजल अग्रवाल नजर आयी थीं। 2010 में सूर्या, विक्रम, प्रियामणि जैसे दक्षिण के राष्ट्रीय पुरस्कार विजेता कलाकारों ने बॉलीवुड में कदम रखा। दक्षिण भारत के मशहूर कलाकार शिव कुमार के बेटे सूर्या आज की तारीख में दक्षिण के सुपर स्टार बने हुए हैं। उन्होंने राम गोपाल वर्मा के साथ हिन्दी फिल्म रक्तचरित्र में अभिनय किया। फिल्म ‘दम मारो दम’ से राणा दग्गूबाती ने बॉलीवुड में कदम रखा। फिर ‘सिंघम’ से काजल व प्रकाश राज ने पदार्पण किया। ईलीना डिक्रूज ने दक्षिण भारत में ‘पोक्कीरी’ सहित कई फिल्में की हैं। अब वह अनुराग बसु की फिल्म ‘बर्फी’ से बॉलीवुड में करियर शुरू कर रही हैं। मलयालम, तमिल व तेलुगू की कई फिल्मों में अपने अभिनय का जलवा दिखाने के बाद अब पोन्नू, डेविड धवन की फिल्म ‘चश्मेबद्दूर’ में नजर आने वाली हैं। चर्चा गर्म है कि टॉलीवुड की अनुष्का शेट्टी व सामंथा प्रभु भी बॉलीवुड में कदम रख चुकी हैं, लेकिन इनकी फिल्मों के नाम अभी तक गुप्त हैं।

जहां तक कलाकारों का सवाल है, तो प्रतिभाओं का आदान-प्रदान बॉलीवुड से दक्षिण भारतीय फिल्म उद्योग में और दक्षिण भारतीय फिल्म उद्योग से बॉलीवुड में चलता रहता है। इसी तरह हिन्दी फिल्में दक्षिण में और दक्षिण की फिल्मों का हिन्दी में रीमेक होता रहता है। मगर, इतनी बड़ी तादाद में नहीं।

सबसे बड़ा सवाल यह उठता है कि टॉलीवुड में नाम और दाम दोनों पाने के बाद बॉलीवुड का मोह इन्हें क्यों होता है? इस पर राणा दग्गूबाती कहते हैं- ‘एक अभिनेता के तौर पर बॉलीवुड में करियर शुरू करने से पहले मुझे टॉलीवुड में कैमरे के सामने काम करने का भरपूर अनुभव हो चुका था। पर जब मुझे हिन्दी फिल्म ‘दम मारो दम’ का ऑफर मिला तो कंटेंट व किरदार अच्छा होने की वजह से मैंने स्वीकार किया था। इससे अधिक मैंने कुछ सोचा नहीं था।’

दक्षिण के अभिनेताओं की बनिस्बत दक्षिण की अभिनेत्रियां बॉलीवुड में ज्यादा सफल रही हैं। सबसे पहले 1951 में वैजयंती माला ने बॉलीवुड में कदम रखा था। उसके बाद से हेमा मालिनी, श्रीदेवी सहित तमाम अभिनेत्रियां बॉलीवुड में आकर अपना साम्राज्य स्थापित कर यहीं की होकर रह गयीं। इन दिनों बॉलीवुड में दक्षिण से आयी असिन, श्रेया शरण, जेनेलिया डिसूजा, त्रिशा कृष्णन काफी सक्रिय हैं।

इस बारे में ईलीना कहती हैं- ‘विशाल दर्शक वर्ग तक अपनी प्रतिभा को पहुंचाने के लिए मैंने बॉलीवुड से जुड़ने का फैसला किया। बॉलीवुड में करियर शुरू करने के लिए बॉलीवुड के सफल कलाकार रणबीर कपूर के साथ काम करने से बेहतर मौका क्या हो सकता था? सच कह रही हूं मैंने बॉलीवुड से जुड़ने के लिए कभी उतावलापन नहीं दिखाया।’

बॉलीवुड की तरफ दक्षिण की प्रतिभाओं के पलायन को लेकर जब तमाम कलाकारों से लंबी बातचीत हुई, तो एक बात साफ तौर पर उभरकर आयी कि बॉलीवुड की फिल्मों का दर्शक पूरे देश के हर शहर व गांव का नागरिक है, जबकि क्षेत्रीय फिल्मों के दर्शक उस क्षेत्रीय भाषा को जानने वाले लोग ही होते हैं। इसलिए हर रचनात्मक इंसान की तमन्ना बॉलीवुड से जुड़ने की होती है। इतना ही नहीं, बॉलीवुड व क्षेत्रीय फिल्मों के बीच सामंजस्य बैठाना तो कलाकार की सबसे बड़ी खुशकिस्मती ही कही जाएगी, लेकिन दक्षिण में अपना एक स्थान बनाने के बाद उसे छोड़कर बॉलीवुड की तरफ कदम बढ़ाने का निर्णय हमेशा रिस्की होता है। इसी कारण कुछ कलाकार सुरक्षित कदम के तहत उन फिल्मकारों की हिन्दी फिल्मों से करियर की शुरुआत को प्रधानता देते हैं। जब हमने विस्तृत सर्वेक्षण किया तो सबसे बड़ा सच यह नजर आया कि दर्शकों के एक बड़े वर्ग तक पहुंचने की लालसा में ये दक्षिण भारतीय प्रतिभाएं (कलाकार, तकनीशियन व निर्देशक) बॉलीवुड की फिल्मों में दक्षिण की बनिस्बत कम पैसों में काम करने के लिए तैयार नजर आती हैं। तेलुगू फिल्मों के निर्देशक बन्नी वासु की मानें तो ईलीना डिक्रूज को दक्षिण में जो धन मिल रहा है, उससे पचास प्रतिशत कम पर उन्होंने हिन्दी फिल्म में काम करना स्वीकार किया है। पर इस बारे में खुद ईलीना डिक्रूज ने चुप्पी साध रखी है। इस वजह से भी टॉलीवुड के कलाकारों व तकनीशियनों के बॉलीवुड की तरफ मुड़ने पर काफी आश्चर्य व्यक्त किया जाता रहा है।

सूत्र दावा करते हैं कि दक्षिण भारतीय फिल्मों में समीरा रेड्डी को जो पारिश्रमिक मिल रहा है, वह उन्हें बॉलीवुड की हिन्दी फिल्मों में नहीं मिल रहा है। पर इस बात का उन्हें कोई मलाल नही है। वह कहती हैं- ‘दक्षिण भारत में सबसे अधिक पारिश्रमिक मिलने की बात को लेकर में आकाश में नहीं उड़ रही हूं, तो हिन्दी फिल्मों में कम पारिश्रमिक मिलने की शिकायत मैं क्यों करूं? मुझे शोहरत या पैसे की भूख नहीं है। मेरी भूख तो अच्छे चरित्रों को निभाने की है। मेरी भूख अच्छी फिल्मों में अच्छी परफॉर्मेस देने की है। वैसे मैं स्पष्ट रूप से बता दूं कि बॉलीवुड की हिन्दी फिल्मों के मुकाबले दक्षिण भारतीय फिल्मों में ज्यादा अच्छा कंटेंट होता हैं।’ दक्षिण के अभिनेताओं की बनिस्बत दक्षिण की अभिनेत्रियों के बॉलीवुड से जुड़ने की संख्या ज्यादा होने की चर्चा चलने पर तेलुगू फिल्मों के निर्देशक बन्नी कहते हैं- ‘दक्षिण की फिल्मों में अपनी पताका फहराने वाली ज्यादातर अभिनेत्रियां उत्तर भारत से आती हैं। इस वजह से उनकी हिन्दी अच्छी होती है और बॉलीवुड में उन्हे किसी अन्य कलाकार से डबिंग कराने की जरूरत नहीं पड़ती। फिर हर हीरोइन का करियर दस साल से ज्यादा का नहीं होता। इस वजह से ईलीना जैसी अभिनेत्रियां समय हाथ से निकल जाए, उससे पहले ही बॉलीवुड का रुख कर लेती हैं।’

तेलुगू निर्देशक बन्नी के सुर में सुर मिलाते हुए विक्रम कहते हैं- ‘दक्षिण के ज्यादातर अभिनेता बॉलीवुड में लंबे समय तक टिके नहीं रहे, क्योंकि वे बॉलीवुड से जुड़ने के लिए अपनी जमीन को छोड़कर हमेशा के लिए बॉलीवुड यानी कि मुंबई में बसने के लिए तैयार नहीं हुए। दक्षिण का अभिनेता अपने सुपर स्टारडम को छोड़ना नहीं चाहता, जबकि दक्षिण की अभिनेत्रियां मुंबई में बस गयीं।’

विक्रम साफ-साफ कहते हैं- ‘मणि सर ने मेरे अंदर जबरदस्त आत्मविश्वास पैदा  किया है, तो मैंने सोचा कि मैं हिन्दी में राकेश ओमप्रकाश मेहरा और संजय लीला भंसाली जैसे निर्देशकों के साथ काम करूंगा।’ तमिल फिल्म ‘पारुथीवीरन’ के लिए राष्ट्रीय पुरस्कार जीत चुकी दक्षिण भारत की स्टार अदाकारा व विद्या बालन की कजिन प्रियामणि भी बॉलीवुड में अपने पैर पसारने की कोशिश में लगी हुई हैं। मणि रत्नम निर्देशित तमिल, तेलुगू और हिन्दी में बनी फिल्म ‘रा.वन’ के बाद उन्होंने रामगोपाल वर्मा निर्देशित फिल्म ‘रक्तचरित्र’ भी की, पर इन दोनों फिल्में के पिट जाने की वजह से अब तक दूसरी हिन्दी फिल्म उन्हें नहीं मिली है, जबकि वह कहती हैं- ‘माफ करना! मैं मुंबई में बसने या अपना कोई कैम्प बनाने नहीं आयी थी, पर मैं हिन्दी फिल्मों में अभिनय करते रहना चाहती हूं, लेकिन हिन्दी फिल्मों में काम करने के लिए दक्षिण की फिल्मों को हमेशा के लिए अलविदा नहीं कह सकती।’

आखिर दक्षिण की क्षेत्रीय फिल्में, फिल्मकार, तकनीशियन आदि बॉलीवुड में क्यों छाते जा रहे हैं। इस पर यदि गंभीरता से विचार किया जाए और दक्षिण की जिन फिल्मों के हिन्दी रीमेक ने सफलता के रिकॉर्ड बनाए हैं, उन पर नजर दौड़ाई जाए तो एक बात साफ तौर पर उभरकर आती है कि अब तक दक्षिण की उन्हीं फिल्मों के हिन्दी रीमेक सफल हुए हैं, जो फिल्में ‘लार्जर देन लाइफ’ किरदारों या घटनाक्रमों के साथ दर्शकों को मनोरंजन परोसा है। हमारे बॉलीवुड के फिल्मकारों ने दक्षिण का हिन्दी रीमेक बनाते समय मूल फिल्म के दक्षिण भारतीय निर्देशक को ही हिन्दी वर्जन निर्देशित करने का जिम्मा सौंपा। फिल्म हिट तो फिर एक भेड़चाल शुरू हो गयी।
कुछ समय पहले तक बॉलीवुड और दक्षिण फिल्म इंडस्ट्री के वर्क कल्चर में काफी अंतर था, पर अब धीरे-धीरे यह अंतर भी खत्म हो रहा है। इसके अलावा दक्षिण के फिल्मकार मुंबई की बजाय हैदराबाद या चेन्नई में ही हिन्दी फिल्में शूट करते है। प्रभुदेवा ने ‘राउडी राठौड़’ को हैदराबाद में ही फिल्माया है। प्रभुदेवा कहते हैं- ‘मेरे लिए फिल्म, फिल्म ही होती है। फिर मेरे लिए यह महत्व नहीं रखता कि वह बॉलीवुड फिल्म है या दक्षिण की फिल्म। मेरे लिए सिनेमा में भाषा की कोई सीमा मायने नहीं रखती।एक निर्देशक की हैसियत से मेरे लिए यह कहानी सुनाने के लिए एक दूसरा प्लेटफॉर्म मात्र होता है, जब तक दर्शक मनोरंजन पा रहा है, तब तक दक्षिण या बॉलीवुड में कोई महत्व नहीं रखता।’ इस मसले पर हमने काफी सर्वेक्षण किया। बॉलीवुड के अलावा दक्षिण फिल्म उद्योग से जुड़ी तमाम हस्तियों से बात की, तो कई चीजें उभर कर आयीं। पिछले दो-तीन वर्षों के दौरान दक्षिण की फिल्मों के हिन्दी रीमेक होने व बॉलीवुड के तकनीशियनों व निर्देशकों के बॉलीवुड की तरफ आने की संख्या बढ़ने की कई वजहें रहीं। एक सर्वेक्षण के अनुसार, सबसे बड़ी वजह यह है कि मल्टीप्लेक्स संस्कृति के विकसित होने के बाद बॉलीवुड सिनेमा भटक गया था। बॉलीवुड के फिल्मकार पश्चिमी देशों के सिनेमा व हॉलीवुड सिनेमा की नकल करने की भेड़चाल का हिस्सा मात्र बनकर रह गये थे, जबकि दक्षिण की फिल्में जमीन से जुड़ी रहीं।

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