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देश की तीसरी सबसे ऊंची चोटी: ‘कामेट पीक’

देश की तीसरी सबसे ऊंची चोटी: ‘कामेट पीक’

दोस्तो, चलो एक बार फिर तुम्हें हिमालय के ऊंचे-ऊंचे पर्वतों की दुनिया में ले चलते हैं।  हर मौसम में पर्वत शिखरों की दुग्ध धवल छवि नजर आती है। इन पर्वतों का हिमाच्छादित स्वरूप तुम्हारे अंदर बहादुरी का जज्बा पैदा कर देता है, क्योंकि जब यह तुम्हें आकर्षित करेंगे तो तुम्हें याद आएगा कि इन शिखरों पर तो बस हिम्मत वाले लोग ही जाते हैं। आओ हम तुम्हें अपने देश की तीसरी सबसे ऊंची पहाड़ की चोटी के विषय में बताते हैं। इसका नाम ‘कामेट पीक’ है, लेकिन दुनिया भर के ऊंचे पहाड़ों में इसका 29वां स्थान है। कामेट पीक जंस्कार पर्वत श्रृंखला की चोटी है। उत्तरी हिमालय का यह हिस्सा उत्तराखंड के गढ़वाल क्षेत्र में आता है। यह राज्य के अंदरूनी भाग में तिब्बत सीमा के पास स्थित है, इसीलिए पर्वतारोहियों को इसके आधार शिविर तक पहुंचने में ज्यादा समय लगता है। कामेट पीक का नाम अंग्रेजी भाषा का नहीं, बल्कि तिब्बती भाषा के शब्द ‘कांग्मेद’ शब्द के आधार पर रखा गया है।

तिब्बती लोग इसे कांग्मेद पहाड़ कहते थे। कामेट पर्वत तीन प्रमुख हिमशिखरों से घिरा है। इनके नाम अबी गामिन पीक, माना पर्वत तथा मुकुट पर्वत हैं। कामेट पीक के पूर्व में स्थित विशाल ग्लेशियर को पूर्वी कामेट ग्लेशियर कहते हैं और पश्चिम में पश्चिमी कामेट ग्लेशियर है। पर्वतारोहियों को इन ग्लेशियर से होकर ही शिखर की ओर चढ़ना होता है। इस मार्ग में कई जगह ऐसे पहाड़ हैं, जैसे बहुत ऊंची चट्टानी दीवार हो, जबकि कई जगह बहुत संकरा और काफी तिरछा मार्ग है। वहां बर्फ पर बहुत फिसलन होती है, लेकिन रस्सियों की सहायता से पर्वतारोही आगे बढ़ते हैं। तुम्हें शायद पता न हो कि पर्वतारोहण में प्रयोग होने वाली रस्सी इतनी मजबूत होती है कि हाथी के खींचने से भी नहीं टूटती। अब तुम यह भी जानना चाहोगे कि कामेट पीक पर पहली बार इंसान ने कब कदम रखा था। हम बताते हैं। इस पीक पर चढ़ने के प्रयास 1855 में आरम्भ हुए थे, किन्तु 1931 में पहली बार इस शिखर पर एक ब्रिटिश टीम ने सफलता प्राप्त की थी। उस अभियान का नेतृत्व फ्रेंक स्मिथ ने किया था। टीम में शिखर तक पहुंचने वाले अन्य लोग एरिक शिप्टन, होल्सवर्थ और लेवा शेरपा थे। कामेट पीक पर दूसरी फतह दार्जिलिंग में स्थित हिमालय पर्वतारोहण संस्थान के अभियान को मिली थी। यह अभियान मेजर नरेन्द्र जुयाल के नेतृत्व में 1955 में सफल हुआ था। जानते हो दार्जिलिंग का हिमालय पर्वतारोहण संस्थान पर्वतारोहण का प्रशिक्षण केन्द्र है। जिन लोगों में हिमालय के पहाड़ों पर जाने का जोश होता है, वह पहले ऐसे किसी संस्थान से बेसिक और एडवांस कोर्स करते हैं। तुम्हें ध्यान होगा, आजकल पूरा संसार धरती के पर्यावरण के प्रति काफी चिंतित है। पता है, पर्वतों में भी पर्यावरण असंतुलन बढ़ता जा रहा है। जो लोग इन पर्वतों को छूने के उत्साह में ऊंचे रास्तों पर जाते हैं, वे लोग अपना बहुत सा बचा सामान, आक्सीजन सिलेंडर और कूड़ाकचरा वहीं छोड़ आते हैं। वर्षो तक पड़ा वह कूड़ा पहाड़ों के पर्यावरण को दूषित करता है, लेकिन अब पर्वतारोहियों को इस विषय में जागरूक किया जा रहा है। अब ऐसे अभियानों पर जाने वाले लोग अपना कचरा साथ लाने के अलावा वहां पहले से पड़ा कचरा भी वापस लाते हैं, जिसे यहां लाकर नष्ट किया जाता है। इस वर्ष जुलाई माह में हरियाणा के माउंटेनियरिंग एवं एलाइड स्पोर्ट्स एसोसिएशन के अभियान के सदस्यों ने कामेट पीक पर विजय पाई। इस सफलता के साथ उन्होंने एक अच्छा कार्य यह किया कि वह अपने साथ वहां से 12 बैग भर कर पुराना कचरा भी लाये। यह उस क्षेत्र के पर्यावरण की रक्षा की ओर एक कदम था। इस बात से तुम्हें भी सीख लेनी होगी। जहां कहीं घूमने जाओ, वहां के पर्यावरण को अपने किसी कार्य से क्षति न पहुंचाओ। यह कार्य तुम्हारे माता-पिता से अधिक तुम्हारी जिम्मदारी है। 

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