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बहरूपिए दूसरों को खुश रखने वाले आज खुद दुखी हैं

बहरूपिए दूसरों को खुश रखने वाले आज खुद दुखी हैं

एक जमाना था, जब उन्हें सम्मान से देखा जाता था, लेकिन मनोरंजन के तौर-तरीकों में आ रहे बदलाव के साथ उनकी हालत बद से बदतर हो रही है। बहरूपियों को भिखारियों की जमात में रख दिया गया है। आज गाहे-बगाहे ही कोई बहरूपिया दिखाई देता है। गर दिख भी जाए तो उसकी गरीबी के कारण उससे किसी स्वांग की उम्मीद नहीं की जा सकती। उनसे बात करो तो उनका दर्द साफ महसूस होता है। प्रस्तुत है बहुरूपियों की दुनिया पर एक नजर :

गिरधर से मेरी दूसरी मुलाकात रामप्रताप सिंह वकील साहब के बड़े बेटे की शादी के दो साल बाद उसी की बस्ती में हुई। पहली मुलाकात कभी न भूलने वाली थी। हुआ दरअसल यूं कि शादी वाली रात की भोर बेला में, जबकि भावंरों के आखिरी रांउड ही बचे थे, पंडित जी के मंत्रोच्चार के ऊंचे स्वरों को लांघती चीख पुकार ने सबका ध्यान अपनी ओर खींचा। बाहर पुलिस का एक सब-इंस्पेक्टर खड़ा डांट फटकार रहा था। वह बिजली विभाग में नियुक्त था और उसका आरोप था कि विजयनगर कॉलोनी के उस बारात घर में बिजली अवैध कनेक्शन से जलाई जा रही थी। घराती और बरात पक्ष वाले सुलह-सफाई में जुट गए। तनाव जब अपने चरम पर था तभी दरोगा जी ने एक जोरदार सेल्यूट झाड़कर खुद का परिचय गिरधर बहरूपिए के तौर पर दिया। लोगों के हंसी ठट्ठे के बीच बख्शीश के 100 रुपये लेकर वह तो चला गया लेकिन वहां मौजूद बहुत से लोगों के चेहरों पर उसकी धमक देर तक बनी रही।

आगरा-फतेहपुर सीकरी रोड पर शहर के काफी बाहर नटों की एक बड़ी बस्ती बसी है। ये लोग खुद को ‘नागर’ कहते हैं। गिरधर से मेरी दूसरी मुलाकात इसी बस्ती में हुई। इतिहास के मध्यकाल में कभी हिंदुस्तान की दो राजधानियों को जोड़ने वाली इस सड़क से होकर नटों की बस्ती तक पहुंचना एक दु:स्वप्न की तरह था। मानसून की शुरुआती दस्तक ने घुटना-घुटना कीचड़ और पानी में डुबो दी थी समूची बस्ती। गिरधर को पहचानने में मुझे कुछ देर लगी। पहली मुलाकात वाला हट्टा-कट्टा गिरधर कहीं गायब हो चुका था। एक जीर्ण-शीर्ण लड़के ने उसकी जगह ले ली थी। पूछने पर पता चला कि टीबी हो गई है। इन 2 सालों की उसकी आपबीती खा़से रोंगटे खड़े करने वाली थी।

वैसे तो बहरूपिया कला सारे देश में देखने को मिलती है लेकिन उत्तर से धुर दक्षिण तक इसे करने वाले लोग ‘डीनोटीफाइड’ घुमंतू जनजातियों के हैं। राजस्थान, मध्य प्रदेश, हरियाणा और पश्चिमी उत्तर प्रदेश में यह काम नट जनजाति के लोग करते आए हैं, जिनका दूसरा प्रमुख पेशा रस्से पर चलने जैसे करतब दिखाना रहा है। इतिहास के प्राचीन पन्ने इनके होने की गवाही देते हैं। ईसा पूर्व से लेकर 8वीं शताब्दी में लिखे जाने वाले ज्यादातर संस्कृत नाटकों में ‘नट’ और ‘नटी’ सूत्रधार से लेकर विदूषक तक की भूमिका अदा करते आए हैं। अकबर के काल में आगरा मुगलों की राजधानी बना और एक सुव्यवस्थित शहर की स्थापना हुई जिसकी आधारशिला पहले ही इब्राहिम लोधी रख गया था। आगरा बसने के साथ ही राजस्थान और उससे जुड़े दूसरे प्रदेशों से जो कामगार पलायन करके आगरा पहुंचे, उनमें नट भी शामिल थे। कलाबाजी, करतब और बहरूपिया कला- तब भी उनके यही पेशे थे और इसकी एवज में होने वाली छोटी-मोटी कमाई उनकी आजीविका का स्रोत थी। आगरा शहर के बाहरी हिस्सों में स्थित खेरागढ़ की पहाड़ियां, फतेहाबाद, किरावली और टेढ़ी बगिया जैसी जगहों की बंजर जमीनों पर उन्होंने अपने छप्पर छा लिए। आजादी के दूसरे दशक में जैसे-जैसे शहर और गांव के सांस्कृतिक परिदृश्य बदलते गए, मनोरंजन के तौर-तरीके भी बदल गए। आजादी के बाद की इस सांस्कृतिक मंदी के युग में बहरूपिए के करतब और बाजीगर के तमाशे मनोरंजन की सतह से गायब होते चले गए। इक्कीसवीं सदी तक आते-आते यह संकट सुरसा की तरह उनके सामने खड़ा हो गया है।

बहरूपियों का यह संकट आजादी के बाद पनपा हो, ऐसी बात नहीं है। सन् 1871 के ब्रिटिश उपनिवेश में सरकार ने ‘क्रिमिनल ट्राइब एक्ट’ (जरायमपेशा जनजाति कानून) नामक कानून बनाया। दरअसल ईस्ट इंडिया कंपनी के समूचे शासनकाल में जिन लोगों ने समय-समय पर अंग्रेजों और भारतीय सामंतों से लोहा लिया था, उनमें बड़ी संख्या घुमंतू जनजातियों से जुड़े लोगों की थी। नट भी इनमें शुमार हैं। ये सभी जनजातियां क्योंकि लड़ाकू थीं लिहाजा अंग्रेजों में सबसे ज्यादा खौफ इन्हीं को लेकर था। 1871 में इनके दमन के लिए जो कानून बना उसमें राज्य और पुलिस को असीमित अधिकार दिए गए थे। 1871 से 1944 के बीच बहुत से बदलाव करके इनमें बाकी घुमंतू जनजातियों को भी शामिल कर दिया गया। आजाद भारत की सरकार ने 1952 में इन जनजातियों को ‘डीनोटीफाइड’ तो कर दिया लेकिन 7 साल बाद ‘हैबिच्युअल ऑफेन्डर एक्ट’ (आदतन जरायमपेशा कानून) नाम का कानून बना दिया जो 1871 के ब्रिटिश कानून से जरा भी जुदा नहीं था। 1961 से केन्द्र सरकार घुमंतू जनजातियों की राज्यवार सूची जारी करती आ रही है।

गिरधर की दो साल की दर्दनाक आपबीती 1871 और 1959 की जनजातियों को जरायमपेशा मानने की सरकार की इसी सोच से जुड़ी है। मेरी पहली मुलाका़त के करीब दो महीने बाद अपनी एक रिश्तेदार की शादी में भाग लेने गिरधर रूपवास (राजस्थान) गया था। शादी के दो दिन पहले जबकि गांव की इस नट बस्ती में नाच-गाना और खाना-पीना चल रहा था, पुलिस ने चोरी की वारदात के संदेह में छापा मारा और जिन दर्जन भर युवाओं को गिरफ्तार करके ले गई, उनमें गिरधर भी शामिल था। ढेरों मानमनौवल और सुलह सफाई के बावजूद नटों की एक न चली। सबूत के अभाव में 11 महीने बाद सभी गिरफ्तार युवकों को छोड़ दिया गया। ऐसी घटनाएं अकेले राजस्थान में नहीं घटतीं। उत्तर प्रदेश, मध्य प्रदेश हो या हरियाणा़ नटों को हर जगह आदतन जरायमपेशा माना जाता है। आगरा के इर्द-गिर्द जितने भी गांव या बस्तियों में मैंने इनका पता जानने की कोर्शिश की, प्रत्युत्तर में एक प्रश्न ज़रूर पूछा गया- आपके यहां कोई चोरी वोरी हो गई है क्या?

जेल में ही गिरधर को टीबी ने पकड़ लिया। घर लौटने पर बीमार गिरधर बहरूपिए का अपना पैतृक पेशा भी नहीं जारी रख सका। बीवी की लकड़ी के खिलौने बनाने की कमाई से जैसे-तैसे एक डेढ़ टाइम की नमक रोटी चल रही है, इलाज की कौन पूछे? आगरा के दूसरे छोर, आगरा-हाथरस मार्ग पर स्थित टेढ़ी बगिया में नटों के 40-45 घर हैं। इनमें आधे से ज्यादा से बहरूपिया का अपना पैतृक पेशा छोड़कर ठेला और रिक्शा चलाने लगे हैं। यह पूछने पर कि क्यों नटों के बच्चे स्कूल तक नहीं पहुंचते, उनके समुदाय का नेता शिवप्रसाद नागर दहाड़ कर कहता है, ‘हम जरायमपेशा जातियों के बच्चों को मास्टर स्कूल में घुसने देगा?’ गिरधर की मुश्किल है कि वह कहीं नहीं घुस सकता। अगर वह स्कूल में घुसना सीख गया होता तो सन् 1871 में ही सरकार से पूछता, ‘तुम्हारे यूरोप में जातियां जरायमपेशा होती हैं या लोग?’

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