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आम लोगों के करीब थी राजा रवि वर्मा की शैली

आम लोगों के करीब थी राजा रवि वर्मा की शैली

आधुनिक भारतीय चित्रकला के दिग्गज चितेरे राजा रवि वर्मा पश्चिमी शैली का प्रयोग कर भारत के मिथकीय चरित्रों पर कृतियां बनाने के लिये जाने जाते थे और यही कारण था कि शुरुआत में बंगाल स्कूल के चित्रकारों ने उनकी कलाकतियों को आसानी से स्वीकार नहीं किया।

भारतीय चित्रकला के आधुनिक दौर में राजा रवि वर्मा का नाम ऐसे चित्रकारों में लिया जाता है जिन्होंने पश्चिमी शैली का प्रयोग कर भारत के मिथकीय चरित्रों में अपनी कल्पना के सुंदर रंग भरे।
 उन्होंने सरस्वती, दुर्गा, नल-दमयंती तथा दुष्यंत-शकुंतला जैसे पौराणिक चरित्रों पर आधारित बेहद खूबसूरत चित्र उकेरे। इन चित्रों की शैली पारंपरिक भारतीय चित्रकला शैली से बिल्कुल हटकर थी।

राजा रवि वर्मा के दौर में कहा गया कि उनकी शैली यथार्थ चित्रण से बिल्कुल परे है और उन्होंने अपनी कला को बेहद सीमित दायरे में रखा। तब यह दलील दी गयी कि राजा रवि वर्मा यदि पश्चिम के साथ भारत की पारंपरिक कला शैलियों का भी प्रयोग करते तो भारतीय चित्रकला को वह कुछ और नायाब कलाकतियां दे सकते थे।

वरिष्ठ कला समीक्षक विनोद भारद्वाज बताते हैं, शुरुआत में बंगाल स्कूल के चित्रकारों ने राजा रवि वर्मा की शैली को स्वीकार नहीं किया। इसके पीछे यही तर्क दिया जाता था कि उनकी तैलीय चित्रों वाली शैली पश्चिमी है और वह सिर्फ भारतीय देवी-देवताओं के चित्र ही उकेरते हैं। भारद्वाज ने कहा कि हालांकि, तब आम जनता राजा रवि वर्मा के चित्रों को पसंद करती थी।

वर्मा ने अपने चित्रों के जरिये चित्रकला को घर-घर पहुंचाने का काम भी किया, लेकिन बंगाल स्कूल उनकी शैली को कैलेंडर आर्ट मानता था। उन्होंने कहा कि बहरहाल बाद में इस नजरिये में बदलाव आया। अब दिग्गज चित्रकार भी यह मानते हैं कि राजा रवि वर्मा भारतीय कला जगत में महत्व रखते हैं और उनकी कलाकृतियां अब भी प्रासंगिक हैं। भारद्वाज ने कहा कि राजा रवि वर्मा की लोकप्रियता हाल ही के वर्षों में और भी बढ़ गयी है। उन पर कई पुस्तकें लिखी जा रही हैं और अध्ययन हो रहे हैं। उन्हें भारत ने वह पूरा सम्मान दिया है, जिसके वह हकदार थे।

रजा फाउंडेशन अवार्ड से सम्मानित अवधेश यादव की राय है कि बड़ौदा शैली पर राजा रवि वर्मा के चित्रों का काफी प्रभाव पड़ा। इस स्कूल के चित्रकार उनकी कलाशैली के पक्षधर हैं। राजा रवि वर्मा ने अपने कई चित्रों में महिलाओं के पौराणिक किरदारों को दक्षिण भारतीय महिलाओं के मॉडल पर चित्रित किया।
 उन्होंने कहा कि पश्चिमी शैली के कारण राजा रवि वर्मा के चित्रों को तत्कालीन ब्रिटिश शासकों से भी काफी प्रोत्साहन मिला। देवी देवताओं के बनाये गये उनके चित्र लिथोग्राफी पर बड़े पैमाने पर छापे गये। परिणामस्वरूप उनकी कलाकतियों की आम जन तक पहुंच हो गयी।

राजा रवि वर्मा का जन्म 29 अप्रैल 1848 में केरल के तत्कालीन त्रावणकोर राज्य के किलीमानोर शाही महल में हुआ। चित्रकला के प्रति उनका रुझान बचपन से ही था। इसीलिए उनके अभिभावकों ने 14 वर्ष के किशोरवय में उन्हें त्रावणकोर महाराज अभिल्यम तिरूनाल के संरक्षण में चित्रकला के अध्ययन के लिए भेज दिया। वर्मा ने चित्रकला के शुरुआती गुर महल के चित्रकार रामा स्वामी नायडू से सीखे। यहीं वह तंजौर शैली से मुखातिब हुए। इसके बाद उन्हें ब्रिटिश चित्रकार थियोडोर जेनसन से सीखने का मौका मिला। इसी के साथ इस चित्रकार के लिए पश्चिम की आधुनिक चित्रकला की एक नयी दुनिया के दरवाजे खुल गये।

पश्चिम में उनकी ख्याति उस समय हुई जब उन्होंने 1873 में वियना कला प्रदर्शनी में प्रथम पुरस्कार जीता। पश्चिमी कला समीक्षकों ने उनकी कलाकतियों को काफी महत्व दिया क्योंकि उनमें पश्चिम की कलाशैली और पूर्व के कल्पना संसार का अदभुत संगम था। समीक्षकों के अनुसार राजा रवि वर्मा ने अपने चित्रों में महिला पात्रों को जिस सुंदर और भव्य तरीके से उतारा, वह उनके व्यापक दृष्टिकोण का ही प्रमाण है।

बहरहाल, राजा रवि वर्मा भारतीय कला क्षेत्र में एक ऐसा नाम हैं जिनकी लोकप्रियता अब भी दिनों दिन बढ़ रही है। इस महान चित्रकार का निधन दो अक्टूबर 1906 में हुआ। भारतीय चित्रकला में उनके योगदान को देखते हुए केरल सरकार ने उनकी याद में राजा रवि वर्मा पुरस्कार शुरू किया जो प्रति वर्ष कला एवं संस्कृति के क्षेत्र की किसी होनहार शख्सियत को दिया जाता है। केरल के मावेलिकारा जिले में राजा रवि वर्मा के नाम पर एक कालेज भी स्थापित किया गया है।

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