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बेचारा हरा कोट

बेचारा हरा कोट

बाहर हल्की बूंदा-बांदी शुरू हो चुकी थी। कबीर और काव्या चिल्लाए, ‘पापा, जल्दी करो, बारिश तेज हो जाएगी तो हम बस स्टैंड तक कैसे पहुंचेंगे?’
कबीर और काव्या हर साल गर्मी की छुट्टियों में इस दिन का इंतजार करते थे, जब पापा उन दोनों को शहर लेकर जाएंगे। शहर का मतलब था होटल में खाना-पीना, खरीदारी, कभी सर्कस तो कभी कोई फिल्म।
कबीर जीन्स पहन कर तैयार था। ऊपर से उसने अपना हरा चैक वाला कोट भी पहन लिया। उसकी छोटी बहन काव्या हंसने लगी, ‘भैया, तुम ये कोट पहन कर शहर चलोगे? देख नहीं रहे, कितने बादल
घिर आए हैं।’
कबीर ने परवाह नहीं की। उसे अपना यह कोट इतना पसंद था कि वह हर कहीं यह पहन कर जाना चाहता था।
पापा को निकलते-निकलते दस मिनट लग गए। इतने में बारिश तेज होने लगी। छाते के नीचे भी कबीर बुरी तरह भीग गया। बस में बैठते ही उसे लगा कि कोट की जेबों में पानी भर गया है। ठंडे कोट में उसे कंपकंपी सी छूटने लगी। पर उसने उतारा नहीं।
उनके गांव से शहर पहुंचने में डेढ़ घंटे लगे। शहर आ गया। काव्या ने देखा, कबीर सो रहा है। उसने भाई को झकझाेर कर जगाया, ‘भैया, उठो, शहर आ गया है।’
कबीर ने आंखें खोलीं, उसका पूरा शरीर गर्म हो रहा था। पापा ने माथा छुआ तो चौंक कर बोले, ‘अरे, तुम्हें तो बुखार हो गया है।’
कहां शहर जाने के बाद तुरंत पापा उन दोनों को होटल खाना खिलाने ले जाते थे और कहां इस बार पापा को डॉक्टर का क्लीनिक ढूंढ़ना पड़ा।
कबीर को डॉक्टर ने इंजेक्शन दिया, दवाइयां दीं और वहीं लिटा दिया। डॉक्टर अंकल ने उसे डांटा भी, ‘जब तुम्हारा कोट भीग गया था, तो उतार देना था? अब देखो, क्या हाल कर लिया तुमने अपना?’
शाम तक कबीर की हालत थोड़ी ठीक हो गई। शहर में बिना कुछ किए वे लोग बस स्टॉप आ गए। बस में बैठने के बाद कबीर को याद आया कि उसका कोट तो डॉक्टर अंकल की क्लीनिक में छूट गया। वह दुखी हो गया। पापा ने कहा, ‘कोई बात नहीं कबीर, अगली बार कोई शहर आएगा तो मैं उससे तुम्हारा कोट मंगवा लूंगा।’
काव्या अलग दुखी थी कि भैया के कोट की वजह से ही उनका प्रोग्राम चौपट हो गया। वह कुछ जोर से बोली, ‘भैया का कोट खो जाए तो अच्छा है। मैंने कितना कहा था भैया से कि कोट मत पहनो, पर इसने मेरी बात ही नहीं सुनी।’
बस में वो दोनों झगड़ने लगे। इसके बाद भी कई दिन तक दोनों भाई-बहनों में कुट्टी रही। कबीर हर दिन पापा को याद दिलाता—पापा, मेरा कोट। आप मंगवा रहे हैं ना? पापा हां कहते और भूल जाते। कबीर दुखी हो गया। उसे अकसर अपना चैक वाला कोट याद आता। देखते-देखते ठंड के दिन आ गए। कबीर के पापा शहर जाने वाले थे किसी काम से। उसने कहा, ‘मेरा कोट लाना मत भूल जाना।’
पापा लौटे खाली हाथ। उनके हाथ में एक चिट्ठी थी डॉक्टर अंकल की लिखी— बेटे, जब बहुत दिनों तक कोई तुम्हारा कोट लेने नहीं आया, तो मैंने वह कोट अपने माली के बेटे रिजवान को दे दिया। उसके पास ठंड में पहनने के लिए कपड़े नहीं थे। वह रोज तुम्हें याद करता है और थैंक्यू कहता है।
कबीर बहुत दुखी हो गया। दूसरे कोट के लिए उसे सालों इंतजार करना पड़ा। देखते ही देखते कबीर आगे की पढ़ाई के लिए शहर चला गया और एक डॉक्टर बन गया।
अस्पताल के काम से उसे लंदन जाना पड़ा। दिन भर मीटिंग के बाद शाम को कबीर घूमने निकला तो एक कपड़े के शो रूम पर उसकी नजर पड़ी। एकदम वैसा ही चैक वाला हरा कोट, जो उसके बचपन का साथी था। वह एकदम से शो रूम के अंदर गया।
उसने सेल्समैन से कहा— मुङो वो हरा चैकवाला कोट चाहिए।
सेल्समैन ने कुछ शर्मिदगी से कहा— सर, हमारे पास बस एक ही पीस है और अभी-अभी वो बिक गया।
कबीर मायूस हो गया। वह चैक वाले कोट पर हाथ फिरा ही रहा था कि सामने एक लंबा सा युवक आ खड़ा हुआ, ‘आपको यह कोट बहुत पसंद आया क्या? दरअसल इस कोट का रंग और डिजाइन बचपन के एक कोट से ना जुड़ा होता, तो मैं आपको जरूर दे देता।’
कबीर की तरफ देख कर वह बोला, ‘मेरा बचपन बहुत गरीबी में बीता। मैं तब दस साल का था, ठंड के दिन थे, पहनने के लिए कुछ नहीं था। तब एक डॉक्टर अंकल ने मुङो कोट देते हुए कहा कि यह दूसरे बच्चाे का है, वह कभी भी आकर यह कोट मांग सकता है। मुङो पता था कि वह कोट मेरा नहीं, पर पहन कर मैं अपने आपको राजा की तरह महसूस करता था। आप क्यों खरीदना चाहते हैं यह कोट?’
कबीर ने धीरे से कहा, ‘डॉक्टर अंकल ने आपसे जिस बच्चाे का जिक्र किया था, वो मैं हूं। मैं भी उस कोट को पहन कर राजा की तरह महसूस करता था।’
रिजवान कबीर के गले लग गया और उसने जबरदस्ती वह कोट उसे दिलवा दिया, ‘मैंने तुम्हारे बचपन को इस कोट से दूर रखा, अब इस पर सिर्फ तुम्हारा हक है।’ जब दोनों शो रूम से बाहर निकले तो जिंदगी भर के लिए अच्छे दोस्त बन चुके थे।

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  • Web Title:Poor green coat