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10 जुलाई, 2020|1:08|IST

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सीएसए की प्रजातियां बनी देश की अमूल्य धरोहर

चंद्रशेखर आजाद कृषि एवं प्रौद्योगिकी विश्वविद्यालय की चार प्रजातियां अब देश की अमूल्य धरोहर बन गई हैं। इसका उपयोग जेनीटिक ब्रीडिंग में किया जा रहा है। जौ, सरसों, उरद और मूंग की 1980 से पहले विकसित की गई प्रजातियों को भारतीय कृषि अनुसंधान परिषद नई दिल्ली की सर्वोच्च संस्था इंडियन सोसाइटी ऑफ जेनेटिक्स एवं प्लांट ब्रीडिंग के प्लेटिनम जुबली समारोह में सम्मानित किया गया। सीएसए की ओर से डॉ.पी के गुप्ता और डॉ.मनोज कटियार ने सम्मान लिया। कुलपति डा. सुशील सोलोमन और डायरेक्टर रिसर्च डा.एसजी प्रकाश ने सभी चारों प्रजातियां कृषि उत्पादन वृद्धि में मील का पत्थर है।

1. सरसों की वरुणा प्रजाति

सरसों की वरुणा प्रजाति को 1959 में बनारस के कैथी गांव में एक पौधे का चयन करके विकसित किया गया था। यह प्रजाति सिंचित और असिंचित दशा में 125 से 130 दिन में पकती है। इससे 20 से 25 कुंतल प्रति हेक्टेयर उत्पादन होता है। इसमे 43 फीसदी तेल होता है। वर्तमान समय में प्रजातियां विकसित करते वक्त वरुणा का जीन समावेश किया जाता है।

2. जौ की ज्योति

जौ की प्रजाति ज्योति ने पूरे देश में धूम मचाई थी। इससे 30-35 कुंतल प्रति हेक्टेयर पैदावार होती है। यह प्रजाति देश परीक्षणों कार्यक्रमों में चेक प्रजाति के रूप में प्रयोग की जाती है। देश व प्रदेश में जौ की बोई जाने वाली प्रजाति के 1155, के 409 प्रीति, के 551 रितम्भरा आदि के विकास में इस प्रजाति के जीन का समावेश कर विकसित किया गया है।

3. मूंग टाइप-44

1962 में मू्ंग की टाइप-44 प्रजाति विकसित की गई थी। यह कम समय में पकने के साथ ही अधिक उत्पादन भी देती है। इसीलिए इसके बीजों की मांग देश में अधिक है। इस प्रजाति के जीन को कई अन्य में समाहित करके कई नई प्रजाति विकसित की गई है। यह प्रजाति किसानों में काफी लोकप्रिय है।

4.उरद टाइप-09

1948 में बरेली के किसानों के खेतों से एक पौधे का चयन करके टाइप 09 प्रजाति को विकसित किया गया था। यह प्रजाति कम समय में पकने वाली है। काले दाने की चिकनी फली और अधिक उत्पादन होने के चलते दूसरे राज्यों में भी काफी लोकप्रिय है। इसका भी जीन कई नई प्रजाति विकसित करने में मिलाया जा रहा है।