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6 अगस्त, 2020|12:23|IST

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भाषायी राजनीति के लिए सबक

तो तेलंगाना बनेगा। लोकसभा ने इससे संबंधित विधेयक पारित कर दिया है। उम्मीद है, राज्यसभा भी इसे अपनी मंजूरी दे देगी। राजनीतिक बहस का केंद्र अब नए राज्य के लोकसभा चुनाव पर असर की ओर जाएगा। संसद में मिर्च की फुहार छोड़ने वाले सांसद राजगोपाल राजनीति छोड़ने का बयान दे चुके हैं। राजनीति उन्हें छोड़ेगी या नहीं, यह ठीक से कहा नहीं जा सकता। कई अन्य विषयों की तरह अलग तेलंगाना राज्य पर भी कांग्रेस और भारतीय जनता पाटी में सहमति है। भाजपा के लिए यह मौका है कांग्रेस सांसदों के दुर्व्यवहार और संसद की गरिमा पर चोट होने की नैतिकटिप्पणी करने का, क्योंकि सीमांध्र में भाजपा की कोई मौजूदगी नहीं है। ऐसे में भाजपा को यह याद नहीं रहता कि इस संसद के कितने ही दिन उसके शोर-शराबे की बलि चढ़े हैं। मुश्किल तो कांग्रेस की है। उसके सांसद सीमांध्र से भी हैं  और तेलंगाना से भी। पार्टी ने कई साल पहले तेलंगाना बनाने का वायदा किया था। पर उसी के सदस्यों में आपसी टकराव की वजह से मामला अब तक अटका हुआ था।

इसके संसद से अब पारित होने के पीछे 2014 के लोकसभा चुनाव के लिए कांग्रेस की तिकड़म है। आंध्र प्रदेश की राजनीति जानने वाले बताते हैं कि सीमांध्र के सांसद के विरोध के पीछे केवल हैदराबाद शहर का तेलंगाना में चले जाना है। सीमांध्र के उद्योगपतियों का हजारों करोड़ रुपये का निवेश हैदराबाद में है। तेलंगाना के लोग सीमांध्र की दादागिरी की दुहाई देते हैं और अपनी बदहाली की वजह सीमांध्र के लोगों की मौकापरस्ती बताते हैं। तेलंगाना के आंदोलन में कई लोगों ने खुदकुशी की है और कई तरह की हिंसा दोनों तरफ से हुई है। ऐसी उथल-पुथल और इतने शोर के बीच एक बार पीछे झांककर देखना चाहिए। भाषा पर आधारित राज्य बनाने का रिवाज हमारे यहां अंग्रेज हुकूमत में ही शुरू हो चुका था। यूरोप में भाषायी राष्ट्रवाद की जिस लहर ने आज से ठीक सौ साल पूर्व पहला विश्व युद्ध शुरू किया था, वह भारत भी पहुंच गई थी। भाषा के आधार पर ओडिशा को अलग प्रांत बनाया गया। अंग्रेज शासन से आजादी के बाद के दशक में नए राज्य बनाने का आधार था भाषा।

देश के कुछ हिस्सों में भाषायी राज्य बनाने पर दंगे तक हुए। कई प्रांतों में एक भाषा के लोग दूसरी भाषा पर आधारित राज्य में रहना ही नहीं चाहते थे। तेलुगू बोलने वाले मद्रास प्रेसिडेंसी के उत्तरी भागों को हैदराबाद की रियासत से जोड़कर आंध्र प्रदेश बना। तेलुगू भाषा का नाम तेलंगाना की ओर इशारा करता है और राज्य का नाम पड़ा तटवर्ती आंध्र प्रदेश के नाम पर। तेलंगाना का बनना भाषायी राजनीति के लिए सबक है। लेकिन यह सबक सीखेगा कौन? मुंबई में शिवसेना का उदय मराठीभाषी लोगों को गुजरातीभाषी और दक्षिण भारत से आए लोगों के खिलाफ खड़ा करने से हुआ था। आज यह भाषायी राजनीति उत्तर भारत से आए लोगों को निशाने पर रखे हुए है। अगर मुंबई में केवल मराठीभाषी लोग ही बचे, तो यह भाषायी राजनीति लड़खड़ाकर ढेर हो जाए। वैसे भी मराठी बोलने वाले विदर्भ क्षेत्र में अलग राज्य की मांग चल ही रही है। वहां भी लोग महाराष्ट्र से अलग होने के लिए कुछ वैसे ही तर्क देते हैं, जैसे तेलंगाना के लोग देते हैं सीमांध्र के लोगों के बारे में।

इस सुगबुगाहट को तेलंगाना जैसा आंदोलन बन जाने में कितनी देर लगेगी? कोई नहीं जानता, क्योंकि आग अपने फैलने के पहले कोई प्रेस विज्ञप्ति नहीं भेजती है। और आग उनको भी नहीं बख्शती, जो आग से खेलते हैं। जो लोग महाराष्ट्र और मुंबई पर मराठीभाषी सत्ता की मांग करते हैं, उन्हें पहले विदर्भ के मराठीभाषियों का दुख-दर्द टटोलना चाहिए। लेकिन हमारी चुनावी राजनीति में इतना दूर देखकर चलने की गुंजाइश नहीं है। खासकर दसियों खबरिया टीवी चैनलों की मौजूदगी में। इनकी खबरों की होड़ छोटी से छोटी घटना होने पर आग में घी का काम करती है। सबक तो तेलंगाना के बनने में उन आंचलिक पार्टियों के लिए भी है, जिनका उदय गठबंधन की राजनीति का मूल कारण है। इनकी मजबूती अपने-अपने इलाके में केंद्रीय पार्टियों का खौफ खड़ा करने से चलती है। कई सालों तक भारतीय कम्युनिस्ट पार्टी (मार्क्सवादी) पश्चिम बंगाल में केंद्र का हौव्वा खड़ा करके अपने पक्ष में समर्थन खड़ा करती रही और सफल भी रही। लेकिन उत्तरी बंगाल में गोरखालैंड की मांग को लगातार माकपा नकारती रही।

वहां उसका स्वरूप ठीक वही था, जो उसके समर्थकों के बीच केंद्रीय सत्ता का था। कई सालों बाद माकपा पिछला विधानसभा चुनाव हार गई और ममता बनर्जी मुख्यमंत्री बनीं। गोरखालैंड पर माकपा और ममता में सहमति है।
भाषा, पहचान और क्षेत्रीयता की राजनीति की एक मियाद होती है। कुछ समय बाद उसमें सड़ांध आ जाती है। सड़न के बाद ऐसी राजनीति को खाद बनने में देर नहीं लगती। लेकिन इस बनने-बिगड़ने का कालरूप इतना बड़ा होता है कि हम सब आजकल की बात को परमसत्य मान लेते हैं। छोटे राज्यों की मांग करने वालों को तेलंगाना के बनने से संबल मिलेगा। विदर्भ, गोरखालैंड और उत्तर प्रदेश को काटकर पूर्वाचल बनाने की बात शायद जोर भी पकड़े। झारखंड के लिए जब आंदोलन चल रहा था, तब मांग थी एक ऐसे राज्य की, जिसमें ओडिशा और पश्चिम बंगाल के आदिवासी हिस्से भी हों।

आखिर में झारखंड बना तो केवल बिहार के दो हिस्से करके। आंदोलन करने वालों की शिकायत थी कि उन्हें बिहार से कुछ नहीं मिलता था, जबकि बिहार उनके खनिजों को लूट रहा था। कालांतर में झारखंड बना और शिबु सोरेन और मधु कोड़ा जैसे लोग मुख्यमंत्री बने। कोड़ा चार साल जेल में बिताकर पिछले साल जमानत पर रिहा हुए हैं और अब उनकी पत्नी गीता कोड़ा विधानसभा सदस्य हैं। बिहार में इसका उल्टा हुआ है। लालू यादव को जेल हुई है, और ऐसे कई लोग मिलते हैं, जो राज्य को सुधारने का श्रेय नीतीश कुमार को देते हैं। झारखंड का आंदोलन करने वालों से यह सवाल होना चाहिए: क्या नीतीश कुमार बेहतर रहते झारखंड के  लिए? और अगर अजीत जोगी और रमन सिंह जैसे मुख्यमंत्रियों को छत्तीसगढ़ की तरक्की का जिम्मा जाता है, तो उनके कुशल राज से मध्य प्रदेश को क्यों वंचित किया जाए? विनोबा भावे ने कई दशक पहले छोटे राज्यों पर एक प्रश्न का जवाब दिया था: पत्थर को तोड़ने से और छोटे पत्थर ही मिलते हैं, उनका स्वभाव मक्खन जैसा नहीं होता। पत्थर तोड़ती हमारी राजनीति को मक्खन पैदा करने के  लिए केवल छोटे राज्य नहीं, कुछ ताजा राजनीतिक विचार भी चाहिए।
(ये लेखक के अपने विचार हैं)

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