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शुरुआत ही तो गड़बड़ाई है

ये साल की क्या शुरुआत हुई! अभी एक सप्ताह भी नहीं हुआ और साल का संकल्प विदा ले गया। वह बुरी तरह परेशान थे। ‘अगर हमारा संकल्प कुछ दिन भी नहीं टिक पाया, तो कोई बात नहीं। हम एक कोशिश और कर सकते हैं।’ यह मानना है मार्टी नेमको का। वह मशहूर करियर कोच हैं। कैलिफोर्निया यूनिवर्सिटी में एजुकेशनल साइकोलॉजी के प्रोफेसर रहे हैं। उनकी बेहतरीन किताब है, हाउ टु डू लाइफ: व्हाट दे डिडनॉट टीच यू इन स्कूल।

हमने कोई संकल्प लिया है। उसके मायने ही हैं कि वह हमारी जरूरत थी। अगर वह हमारे लिए जरूरी था, तो फिर इतनी जल्दी हम उसे कैसे छोड़ सकते हैं? और यह भी क्या जरूरी है कि संकल्प गड़बड़ा गया, तो फिर अगले साल पर ही लिया जाएगा। वह तो कभी भी लिया जा सकता है। हम फिर-फिर संकल्प ले सकते हैं। एक नाकामी से सब खत्म नहीं हो जाता। फिर उस चीज को एक साल तक टाल देना भी कहां की अच्छी बात है। अगर हमसे एक गड़बड़ हो गई है, तो क्या हुआ? उसे हमें ही ठीक करना है। वह जितनी जल्द ठीक हो जाए, उतना ही बेहतर है। हमें संकल्प बहुत सोच-समझकर लेना चाहिए। और एक बार ले लिया है, तो उसे पूरा करने की कोशिश करनी चाहिए। एकाध झटका लग जाए, तब भी हिम्मत नहीं हारनी चाहिए। शुरुआत खराब भी हो जाए, तो कोई बात नहीं। अभी पूरी पारी पड़ी है। सो, पूरा साल पड़ा है। शुरुआत गड़बड़ा गई, तो क्या फर्क पड़ता है? बाद की पारी तो संभाल लो। उसे बर्बाद करने से क्या हासिल? और यह किसने कहा है कि संकल्प साल में एक बार ही लिया जा सकता है।
 


 

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