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विमर्शसबके हैं अपने-अपने सूरज

लाइव हिन्दुस्तान टीम
Sun, 10 Jan 2016 09:50 PM
सबके हैं अपने-अपने सूरज

संसार में इकलौता सूरज है, जो झुग्गियों से लेकर कोठी-बंगलों और खेत-खलिहानों तक, सबमें आलोक बांटता है। वह भी मुफ्तिया। न उसे खैरख्वाही की अपेक्षा है, न खुशामद की। वह कुदरत का नुमाइंदा है, इंसानों का नहीं। ऐसे सूर्य को भी अपनी मतलबपरस्ती में हमने नहीं बख्शा है।

बस मौसम की बात है। कभी हमें उसकी तलाश है, तो कभी उससे बचने की। जैसे वह सूरज न होकर, उल्लू सीधा होने के बाद, अफसर का सत्ताच्युत मंत्री हो। ज्यों आदमी का आदमी के प्रति शोषण का नजरिया है, वैसा ही कुदरत के लिए भी है। कहीं शोषण से चूकना उसे इंसानियत से पलायन तो नहीं लगता? हमें यही डर सताता है। वर्षों से हमारे स्वार्थ, लालच और दोहन की शिकार प्रकृति को यदि चैन आ गया, तो हमारा क्या होगा? नींद तो कभी-कभार कुंभकर्ण की  भी खुल ही जाती है।

कुदरत के सूरज से हमें संतोष नहीं है। हमने हर क्षेत्र में अपने-अपने सुविधाजनक इंसानी सूरज ईजाद कर लिए हैं। पीठ पीछे भले कोसें, पर सामने उनकी काबिलियत के कसीदे पढ़ते हैं। ऐसा ही चुना-छांटा सुपात्र अब तक कमाई के सारे कीर्तिमान तोड़ चुका है। उसका निष्ठावान चरित्र गजब का है। डूबते सूरज को वह दूध में पड़ी मक्खी-सा निकाल फेंकता है और तत्काल उगने वाले की खातिर में जुट जाता है। ऐसे कमाऊ पूत सत्ता के हर सूरज के चहेते हैं। सुशासन इनकी जेब में है, जन-कल्याण की कागजी योजनाएं इनकी जुबान पर। दीगर है कि इनमें से अधिकांश योजनाओं की नियति सचिवालय की भूल-भुलैया में अपने वित्तीय आवंटन के साथ गुम हो जाना है।

हर दायरे के इंसानी सूरज यह आभास कराने से नहीं चूकते कि उनके बिना अंधकार का साम्राज्य अनिवार्य है। हर क्षेत्र में कार्यक्षमता की रोशनी केवल उनकी देन है। कई तो यही भ्रम पाले चले भी जाते हैंं। सरकार का कारोबार है। चलता रहता है। कभी-कभार हम सोचते हैं कि स्थायी सूरज की ऐसे अस्थायी नकलचियों के प्रति प्रतिक्रिया क्या होती होगी? वह अपनी किरणों के साथ कहीं इनकी हंसी तो नहीं उड़ा रहा हैै?
गोपाल चतुर्वेदी

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