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टीकाकरण में छिपी है नौनिहालों की मुस्कान

मध्य प्रदेश के बरईपुरा गांव की सहरिया जनजाति (मुंडा भाषा बोलने वाले आदिवासी) के बच्चे शायद ही स्कूल जाते हैं। जाहिर है, आमतौर पर उनका टीकाकरण भी नहीं होता। यहां सरकारी अस्पतालों और क्लिनिकों में पैदा होने वाले मुट्ठी भर बच्चों को ही टीबी से बचाने वाला बीसीजी का टीका लग पाया है और वे ही पोलियो वैक्सीन की खुराक भी पा सके हैं। कुछ अन्य बच्चों को डिप्थीरिया, टिटनेस और काली खांसी से बचाने के लिए दिया जाने वाला डीटीपी का एक टीका जरूर लगा है, मगर यहां शायद ही कोई बच्चा मिले, जिसे डीटीपी के दो से ज्यादा टीके लग पाए हों, जबकि बचाव के लिए डीटीपी के पांच टीकों की दरकार होती है।

विश्व स्वास्थ्य संगठन के रूटीन इम्युनाइजेशन परफॉरमेंस यानी नियमित टीकाकरण सूचकांक का एक वैश्विक संकेतक कहता है- हर बच्चे को डीटीपी का तीन टीका लगना चाहिए। भारत में यह आंकड़ा 72 फीसदी ही है, जबकि वैश्विक लक्ष्य 90 फीसदी का है। बरईपुरा गांव की ज्यादातर महिलाएंतीन से पांच बच्चों की मां हैं, लेकिन इनमें से कई के बच्चों की जान कुपोषण और संक्रमण के कारण जन्म से पांच वर्ष के अंदर ही चली गई। दुर्भाग्य यह है कि इन्हें यह तक नहीं पता कि इनके बच्चों को आखिर मौत की नींद सुला कौन रहा है?

भारत में हर तीन मिनट में एक बच्चे की मौत निमोनिया से होती है और सालाना 1.8 लाख से ज्यादा बच्चे इसके कारण दम तोड़ते हैं। पांच वर्ष से कम उम्र के बच्चों की मौत की यह बड़ी वजह है। अपने देश में एचआईवी, मलेरिया, टीवी, जिका और इबोला से भी एक साथ इतनी मौतें नहीं होतीं, जितने बच्चे हर साल निमोनिया से मर जाते हैं। डायरिया से भी हर साल 1.2 लाख बच्चे मर जाते हैं।

आलम यह है कि हमारे यहां इन दोनों बीमारियों से मरने वाले बच्चों की संख्या दुनिया भर में सबसे ज्यादा है। और यह स्थिति तब है, जब इन दोनों बीमारियों से न सिर्फ बचाव संभव है, बल्कि इनका इलाज भी है। टीकाकरण ऐसा ही उपाय है, जिसे लेकर भारत में प्रयास तेज हुए हैं। केंद्रीय स्वास्थ्य मंत्री जेपी नड्डा ने पिछले हफ्ते ही यह घोषणा की है कि निमोनिया कंजुगेट वैक्सीन यानी पीसीवी- 13 को चरणबद्ध तरीके से 2017 से लागू किया जाएगा। निमोनिया की वजह बनने वाले 13 तरह के बैक्टीरिया के खिलाफ कारगर यह टीका शुरुआत में हिमाचल, बिहार, उत्तर प्रदेश, राजस्थान व मध्य प्रदेश में उपलब्ध होगा।

बहरहाल, कोई भी पहल अपने आप में पूर्ण नहीं होती। टीकाकरण से इतर बच्चों में प्रतिरोधक क्षमता बढ़ाने के लिए जरूरी यह भी है कि शुरुआती छह महीने तक उसे मां का दूध दिया जाए और उसे साफ पानी व पर्याप्त पोषण मिले। भारत में सालाना करीब 30 फीसदी बच्चों को जीवनरक्षक वैक्सीन नहीं मिल पाता। अगर उनका टीकाकरण संभव हो और तमाम सुरक्षा उपाय उन्हें दिए जाएं, तो निश्चय ही हम अपने हजारों नौनिहालों की जान बचा सकते हैं।
 

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  • Web Title:vaccination is hidden in the smile of new born baby