आधे टिकट के सफर का खत्म होना

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सरकार ने आधे टिकट की कहानी पर पूर्ण विराम लगा दिया है। बच्चों को अंग्रेजों के जमाने से मिलने वाला आधा टिकट अब रेलवे की टिकट खिड़की पर नहीं मिलेगा। क्या इससे रेलवे की आर्थिक स्थिति सुधारने में मदद...

आधे टिकट के सफर का खत्म होना

सरकार ने आधे टिकट की कहानी पर पूर्ण विराम लगा दिया है। बच्चों को अंग्रेजों के जमाने से मिलने वाला आधा टिकट अब रेलवे की टिकट खिड़की पर नहीं मिलेगा। क्या इससे रेलवे की आर्थिक स्थिति सुधारने में मदद मिलेगी? कितने बच्चे रेलवे की इस सुविधा का लाभ उठाते हैं? अपने देश में लगभग 60 प्रतिशत बच्चे तो शायद ही रेल से यात्रा करते हों। हो सकता है, बहुत से उन बच्चों ने तो रेल देखी भी न हो, जो आदिवासी हैं या जो बहुत अंदर उन गांवों में रहते हैं, जहां से रेल गुजरती ही नहीं। झुग्गी-झोपड़ी में रहने वाले परिवार तो बच्चों को लेकर या स्वयं रेल से यात्रा करते ही नहीं। मध्य वर्ग के लोग भले ही दो-चार साल में ब्याह शादी में सपरिवार चले जाते हों। बंगाल, महाराष्ट्र और गुजरात में तो फिर भी अवकाश के दिनों में सपरिवार यात्रा पर निकलते हैं। हिंदी पट्टी में तो देशाटन की मानसिकता नहीं के बराबर है।

इसलिए मालूम नहीं कि कितना राजस्व इन बच्चों के टिकट निरस्त करके मिलेगा? सरकार कुछ बच्चों के इस अधिकार को क्यों समाप्त करना चाहती है, जिनके माता-पिता अपने बच्चों को देश की सांस्कृतिक, ऐतिहासिक और धार्मिक पृष्ठभूमि से अवगत कराने के लिए इन स्थलों पर ले जाते हैं। मैं कई वर्ष पहले मंदाकिनी के किनारे एक केरलवासी से मिला। वह अपने दो बच्चों के साथ वहां बैठा उन्हें दिखा बता रहा था। उसकी गांव में साइकिल बनाने की दुकान थी। मैंने उससे पूछा, आप इतना पैसा खर्च करके इतनी दूर क्यों आए? वह बोला, हर तीन साल में अपने बच्चों को अलग-अलग दिशा में ले जाता हूं, जिससे बच्चे अपने देश के मुख्य स्थलों के बारे में सामान्य ज्ञान अर्जित करें। आज वह घटना शिद्दत से याद आ रही है।

रेलवे इन बच्चों के जीवन की इस एक संभावना को भी क्यों समाप्त करना चाहती है। आजादी के बाद से कितने सांसद और राज्यों में कितने विधायक अवकाश ग्रहण कर चुके हैं। उन सब को जीवन भर के लिए मुफ्त पास मिले हुए हैं। रेलवे के अवकाश प्राप्त छोटे-बड़े कर्मचारियों को आजीवन पास दिए जाते हैं। क्या बच्चों का महत्व उन अवकाशित सांसदों और विधायकों जितना भी नहीं? अंग्रेज ने सोचा होगा कि देश के लोग घर घुसरू हैं, बाहर निकलने की आदत डालो।

शायद तभी बच्चों के लिए आधे टिकट का प्रावधान किया था। उस समय 12 साल तक के बच्चों का आधा टिकट लगता था। सरकार ने उम्र की इस सीमा को घटाते-घटाते आठ साल पर पहले ही पंहुचा दिया था, अब इसे पूरी तरह बंद किया जा रहा है। अंग्रेज सरकार ने इसे शुरू किया था और यह सरकार, जो अपनी है और विकासोन्मुखी है, उसने बच्चों की यात्रा के अवसर को समाप्त कर दिया। विकास क्या भौतिक क्षेत्र का ही होता है? क्या इस आर्थिक विकास का अर्थ यह है कि बच्चों का आंतरिक और मानसिक विकास बंद हो जाए? बुलेट ट्रेन के युग की नई सोच शायद यही है।
 (ये लेखक के अपने विचार हैं)

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