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उदारीकरण के दौर में नेहरू की याद

मौजूदा महौल में पंडित जवाहरलाल नेहरू ज्यादा प्रासंगिक हो उठे हैं। वह ऐसे दूरदर्शी राजनेता थे, जिन्होंने देश में लोकतंत्र को खाद-पानी दिया। ऐसे वक्त में, जब देश आजादी की सुकूनदेह हवा महसूस ही कर रहा था, उन्होंने देश में नैतिक, आर्थिक और सामाजिक भवनों की नींव रखी। उनकी गिनती ऐसे नेता में होती रहेगी, जिन्होंने गुटनिरपेक्षता की नीति और पंचशील सिद्धांतों के साथ विश्व समुदाय में भारत की एक भूमिका तय की थी। विज्ञान और प्रोद्योगिकी के विकास में भी उनके योगदान को भूलना मुश्किल है। पंडित नेहरू कहा करते थे कि राजनीति मुझे अर्थशास्त्र की ओर ले गई। उसने मुझे अपरिहार्य रूप से अपनी सभी समस्याओं और जीवन के प्रति वैज्ञानिक दृष्टिकोण अपनाने की ओर उन्मुख किया। 

अपनी आलोचना को लेकर पंडित नेहरू हमेशा सहिष्णु रहे। फिरोज गांधी द्वारा उनकी सरकार पर आरोप लगाने की घटना भला कौन भूल पाएगा? कांग्रेस सांसद होने के बावजूद फिरोज गांधी अपने ससुर यानी पंडित नेहरू की सरकार में ह्विसल ब्लोअर के रूप में उभरे और बीमा क्षेत्र के भ्रष्टाचार को उजागर किया। उस आलोचना को नेहरू सरकार ने सकारात्मक रूप में लिया। इसी तरह, राम मनोहर लोहिया भी नेहरू के आलोचक रहे, मगर पंडित नेहरू ने उन्हें हमेशा पर्याप्त सम्मान दिया। संसद के प्रति भी पंडित नेहरू का दृष्टिकोण अलहदा था। उन्होंने सही अर्थों में संसद को लोकतंत्र का मंदिर माना, बनाया। वह संसद की कार्यवाहियों में अधिक से अधिक वक्त देना पसंद करते थे। अपने मंत्रियों पर भी वह उस तरह नियंत्रण नहीं रखते थे, जैसा दबाव बाद के वर्षों में दिखा।

समाज को लेकर जो सोच पंडित नेहरू की थी, वैसी सोच मौजूदा समय में मुश्किल है। वह कहा करते थे- गांधी जी के नेतृत्व में सत्य और अहिंसा को ताकत बनाकर हमने ब्रिटिश दासता से मुक्ति जरूर पा ली, मगर गरीबी उन्मूलन और आर्थिक आजादी इस राजनीतिक लड़ाई से कहीं ज्यादा चुनौतीपूर्ण है। इसलिए समाज के आखिरी व्यक्ति तक सरकार की नीतियों का लाभ पहंुचाने पर उनका खासा जोर रहा। योजना आयोग का गठन, देश में औद्योगिकीकरण की नींव रखना, कृषि के विकास पर खासा जोर उनकी इन्हीं कोशिशों का फल था।

हो सकता है कि पंडित नेहरू आज होते, तो वह भी उदारीकरण की तरफ कदम बढ़ाते, मगर अर्थव्यवस्था का जो रूप आज है, वह शायद ही होता। आज भी मिश्रित अर्थव्यवस्था होती, जिसमें समाजवादी सोच को तवज्जो दी जाती। चूंकि पंडित जी ग्रामीण अर्थव्यवस्था को मजबूत करने के पक्षधर थे, इसलिए कृषि विकास उनके लिए सर्वोपरि होता। वह शहरीकरण और ग्रामीण अर्थव्यवस्था के बीच संतुलन साधने की हरसंभव कोशिश करते। वह सही मायने में रॉबर्ट फ्रास्ट की कविता माइल्स टु गो बिफोर आई स्लीप  को जीने वाले नेता थे।
 (ये लेखक के अपने विचार हैं)

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