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4 जून, 2020|7:52|IST

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एक दीप प्यार का न जल रहा, न बुझ रहा

दिवाली की शाम मैं पहला दीया जलाना चाहती हूं उस कूड़े पर, जो इन दिनों ऊपर-ऊपर काफी रंगीन हो गया है। हर घर से जो कूड़ा बटोरकर सफाई कर्मचारी ले जाते हैं- उसमें फेंके गए ब्रांड घर की हैसियत का भांडा फोड़ देते हैं, जो मोहल्ले में सबकी अलग-अलग है।

घूरे के दिन सचमुच फिर गए हैं, ऊपर से ही सही। अब रिक्शा चालक भी रंगीन टीशर्ट पहन सकते हैं, बूढ़ी भिखारन काकी पांच रुपये की आइसक्रीम खा सकती है, चौकीदार काका भी 300 रुपये की मुन्नी मोबाइल पर अपने घर का हाल-चाल ले सकते हैं, और उन्हें झूठे सपने दिखाते हुए छाती ठोक गा सकते हैं- ऑल इज वेल, ऑल इज वेल। उसी मोबाइल पर लोक-गीत भी सुन सकते हैं- आग लगी हमरी झोंपडि़या में हम गावै मल्हार। 

सिक्योरिटी गार्ड के इन मासूम प्राणियों के जीवन में सिक्योरिटी नाम की कोई चीज नहीं। तो दूसरा दीया उनके पांच बाई चार के ठीये पर। तदर्थ रिश्तों और तदर्थ नौकरियों के इस महाचंचल युग में 'ऋणम् कृत्वा घृतम् पीवेत' की सुविधा कुछ इस तरह उपलब्ध है कि अब कर्ज लेना शर्म की बात रही नहीं।

पहले की औरतें दिवाली के एक रोज पहले कूड़े पर 'जमदीया' यानी यम का दीया जलाकर रोग-बीमारी के साथ-साथ यम से घर से कर्ज भगाने की प्रार्थना करती थीं- अब वह परंपरा खोखली नजर आती है, और दिवाली की सुबह सूप पीटकर हम घर-घर गाती घूमती थीं- 'लक्ष्मी पइसे (आए) दरिद्दर भागे' उसका भी कोई अर्थ नहीं।

लक्ष्मी अगर घरों में पैठ भी गई, तो दरिद्रता भागी कहां?- न घरों की, न देश की, और न संबंधों की। तीसरा दीया मैं बारती हूं वर्किंग वीमेंस हॉस्टल की छतों पर। चौथा वृद्धाश्रम की छत पर। पांचवां अनाथालयों की देहरी पर और छठा फ्लाई-ओवर के नीचे, जहां आज भी विस्थापित परिवार अखबार बिछाकर सोते हैं। काश! इस दिवाली इतना हो जाए कि सरकार अध्यादेश जारी करके वृद्धाश्रमों, अनाथालयों, रैन-बसेरों और वर्किंग वीमेंस हॉस्टलों का परिसर एक कर दे, तो सबका अकेलापन मिट जाए।

अंतिम दीया हर उस नाते के नाम, जो युद्ध-विह्वल युग में हजार आंधियों के बीच भी दो दिलों के बीच चुपचाप टिमटिमा रहा है। असली प्रकाश जोत वही है। वही है वह मूल बमदीया, जिससे दूसरे दीये अपना नेह भीगा मुंह सटाकर ज्योति दान लेंगे। बमदीया का कोई रिश्ता किसी विस्फोट, किसी बम से नहीं होता, वह पिछले साल भी जल चुका। वह अनुभवसिद्ध चौमुख दीया होता है, जिसमें कालिख की कुंठा नहीं होती, क्योंकि वह दानी है। अहंमन्यता का घड़ा जिस दिन फूटकर सागर-जल से एक हो जाएगा- लहरों पर गाती दीयरी सच के कान में गीतकार श्यामनंदन किशोर के शब्द उधार लेकर कहेगी- एक दीप प्यार का/ न जल रहा, न बुझ रहा। मगर इस जलने-बुझने के बीच का जो सुभग रसबोध होता है, उससे नहा जाएगी पूरी धरती।
     (ये लेखिका के अपने विचार हैं)

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  • Web Title:एक दीप प्यार का न जल रहा, न बुझ रहा