सहनशीलता और सहिष्णुता
अच्छे व्यक्तित्व के लिए जिन तत्वों की आवश्यकता होती है, उनमें सहनशीलता भी एक है। बड़े-बुजुर्गों की वाणी, अबोध बालकों की बोली या मानसिक रूप से विकलांग लोगों के शब्द कर्णप्रिय न हों, तब भी सहने...

अच्छे व्यक्तित्व के लिए जिन तत्वों की आवश्यकता होती है, उनमें सहनशीलता भी एक है। बड़े-बुजुर्गों की वाणी, अबोध बालकों की बोली या मानसिक रूप से विकलांग लोगों के शब्द कर्णप्रिय न हों, तब भी सहने की प्रवृत्ति रखनी चाहिए। सहनशील व्यक्ति अपने आसपास के वातावरण में शांति और सौहार्द्र कायम रखता है। यह हमारे जीवन के सकारात्मक पहलुओं को उजागर करता है। ऐसे लोग हर स्वभाव के लोगों के साथ तालमेल रखते हैं।आधुनिक युग में रिश्तों में दरार उत्पन्न होने और हिंसा में वृद्धि होने के कारकों में सहनशीलता का अभाव ही है। आज की शिक्षा व्यावसायिक होने के साथ केवल किताबी अध्ययन बनकर रह गई है। जीवन के संस्कार वही दे सकता है, जो स्वयं संस्कारी हो। उनमें अपने बुजुर्गों और पड़ोसियों को आदर देने की क्षमता हो। प्राय: देखा जाता है कि जिन्हें हम चाहते हैं, उनके कुकर्म या कठोर वाणी को भी सह जाते हैं, जबकि जिनके साथ संबंध अच्छा नहीं होता, उनकी अच्छी वाणी भी बुरी प्रतीत होती है।
इन्हीं जगहों पर सहनशीलता की आवश्यकता है और यही हमारे आदर्श चरित्र को गढ़ने में सहायक होता है। सत्कर्म के लिए आत्म नियंत्रण और सहनशीलता बेहद आवश्यक है। पुराने समय में ऋषि-मुनि नंगे बदन तपस्या में लीन रहते थे, ताकि वे मौसम के कठोर प्रहार को सह सकें। भीषण गरमी में देह को तपाकर वे अपनी सहनशीलता की परीक्षा देते थे। इसलिए सहिष्णुता का अभ्यास करना चाहिए। किसी के दोषों को देखकर उन पर टीका-टिप्पणी करने के पहले अपने बड़े-बड़े दोषों का अन्वेषण करना चाहिए। अपनी वाणी को नियंत्रित नहीं कर सकते, तो उसे दूसरे के प्रतिकूल नहीं, बल्कि अपने प्रतिकूल उपदेश करने दें। अपने घर को नियमित बनाएं, क्योंकि बिना आचरण के आत्मानुभव नहीं होता। नम्रता, सरलता, साधुता और सहनशीलता ये सभी आत्मानुभव के प्रधान अंग हैं।
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